Indore: यादों की पोटली भरकर मुकुंद दा हुए इंदौर से विदा.. अब नागपुर में कटेगा जिंदगी का सफर
बेटी अपने आई-बाबा को शाम की फ्लाइट से नागपुर लेकर चली गई। मुकुंद दा अपने गृहस्थी के सामान के साथ इंदौर से जुड़ी यादों की गठरी भी ले गए। उन्होंने इंदौर को भले ही छोड़ दिया, लेकिन इंदौर उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।
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लोकमान्य नगर के मकान नंबर 225 का पता वही है, लेकिन अब मालिक बदल गया है। बरसों बरस तक इस घर में रहने वाले मुकुंद कुलकर्णी ने सोमवार को इस घर से, इस शहर से विदा ली, वो हमेशा के लिए अब नागपुर में बस रहे हैं। इस पुराने से घर में इंदौर गढ़ने की, उसके आगे बढ़ने की कई योजनाएं बनीं और धरातल पर उतरीं।
शहर की शीर्ष संस्था अभ्यास मंडल के संस्थापक सदस्यों में से एक 92 वर्षीय मुकुंद कुलकर्णी के लिए इंदौर छोड़ने का फैसला लेना आसान नहीं था, लेकिन बढ़ती उम्र के इस दौर में बेटी स्मिता हरकारे उनकी सेवा का मौका नहीं छोड़ना चाहती हैं। बेटी अपने आई-बाबा को शाम की फ्लाइट से नागपुर लेकर चली गईं। मुकुंद दा अपने गृहस्थी के सामान के साथ इंदौर से जुड़ी यादों की गठरी भी ले गए। उन्होंने इंदौर को भले ही छोड़ दिया, लेकिन इंदौर उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा। अभ्यास मंडल के साथियों ने दो दिन पहले उनका जन्मदिन मनाया और पुराने यादगार दिनों को उनके साथ साझा किया। मुकुंद जी ने सोमवार को यादों की भिनी खुशबू के साथ इस शहर को छोड़ा।
इंदौर को कभी नहीं भूल पाऊंगा
इंदौर छोड़ने से पहले मुकुंद कुलकर्णी ने कहा कि मुझे इंदौर ने खूब प्यार दिया। शहर के प्रबुद्धजनों ने मुझे अपना माना। मैंने लोकहित के काम किए। इस इंदौर से मुझे खूब सम्मान मिला। इंदौर को लेकर टीस भी रहेगी। इंदौर जिले के हर गांव के पास तालाब बनना चाहिए थे, लेकिन नहीं बने। इंदौर में 50 सालों में कोई नया तालाब नहीं बना। नर्मदा का अब चौथा चरण लाने की तैयारी हो रही है। हम कब तक नर्मदा पर निर्भर रहेगी। इंदौर के समीप सैटेलाइट टाउन बनना थे, लेकिन इस योजना पर किसी नेता ने ध्यान नहीं दिया। कान्ह नदी के लिए भी हमने कई प्रयास किए, लेकिन वह साफ नहीं हुई। कान्ह नदी में नाव नहीं चल पाई।
इंदौर के युवाओं व बच्चों के चहेते हैं दादा
मुकुंद दादा न केवल शहर के विकास के प्रति लगातार प्रयास करते थे, बल्कि वे इंदौर के युवाओं व बच्चों के प्रति भी अनेक कार्यक्रम आयोजित करते थे। अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष 1985 के वक्त इंदौर में व्यक्तित्व विकास शिविर आयोजित कर अनेक युवाओं को जागृति, अनुशासन व कर्मशीलता का पाठ पढ़ा गए। इससे पहले गर्मियों की छुट्टियों में राजवाड़ा के गणेश हॉल में बच्चों के लिए बालकथा माला का आयोजन करते थे। इसमें शहर के प्रसिद्ध कथा और कहानीकारों को आमंत्रित कर बच्चों को प्रेरक कहानियां सुनाई जाती थीं। कालांतर में वे आंतर भारती के सहयोग से इंदौर के स्कूलों में बाल आनंद मेलों का आयोजन करते थे।
