Ganesh Utsav: क्या सभी तीर्थों का जल और पंचधातु मिलाकर बनी है प्रतिमा? जानें इंदौर के बड़े गणपति का इतिहास
Bada Ganpati Indore History : इसका निर्माण 1895 में शुरू होकर 1901 में पूर्ण हुआ। प्रतिमा के निर्माण में पंचधातु, पवित्र नदियों का जल और धार्मिक स्थलों की मिट्टी का उपयोग किया गया। मंदिर का विस्तार 1952 में हुआ और पहली बार सोने-चांदी के वरक से गणपति का शृंगार किया गया। साल में चार बार गणेश जी को चोला चढ़ाया जाता है, जिसमें 40–50 किलो शुद्ध घी और सिंदूर का उपयोग होता है।
विस्तार
यूं तो सभी देवता बड़े ही होते हैं पर इंदौर के मल्हारगंज क्षेत्र में छोटे गणपति के साथ बड़े गणपति भी हैं। यह प्रदेश का सबसे बड़ा गणेश मंदिर है। इंदौर का यह बड़ा गणपति मंदिर भक्तों के आकर्षण और आस्था का केंद्र है। यहां भगवान गणेश की मूर्ति 25 फीट ऊंची और 16 फीट चौड़ी है। इसे चोला चढ़ाने में सात दिन का वक्त लगता है। आज बड़ा गणपति मंदिर शहर की एक पहचान है। इंदौर के हजारों भक्त शुभ कार्य की शुरुआत यहीं पूजा कर करते हैं।
छठी सदी से शुरू हुई गणेश पूजा
धार्मिक इतिहासकारों का मानना है कि बुद्धि विलास के देवता श्री गणेश की पूजा अर्चना छठी शताब्दी से आरंभी हुई और दो तीन शताब्दियों में गणेशजी को आराध्य मानने वाले भक्त बढ़ते गए। 10वीं शताब्दी तक महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में गाणपत्य संप्रदाय का जन्म हुआ, जो गणपति जी को अपना आराध्य मानता था। जाहिर है गणेश जी हमारी भक्ति और आस्था के केंद्र लंबे समय से हैं।
ऐसे आया बड़े गणपति का विचार
बड़ा गणपति मंदिर के पुजारी परिवार का कहना है कि उनके पुरखे नारायण जी दाधीच राजस्थान से उज्जैन आए थे और चिंतामन गणेश की पूजा अर्चना करने लगे थे। एक दिन उन्हें स्वप्न में ऐसा एहसास हुआ कि साक्षात् चिंतामन गणेश नारायण जी दाधीच से कह रहे हैं कि मुझे और कहीं भी स्थापित कर लो। नारायण जी ने विचार किया कि उज्जैन में तो कई मंदिर हैं, क्यों न गणपति जी का मंदिर और कहीं निर्मित करवा कर मूर्ति स्थापित करवाई जाए। उन्होंने इंदौर आकर गणेश मंदिर के निर्माण का निर्णय लिया। दाधीच ने मंदिर परिसर की यह जमीन होल्कर रियासत से खरीदी और एक छोटी सी टपरी में गणेश जी की पूजा-अर्चना करने लगे। उनकी तपस्या और पूजा भगवान गणेश को पसंद आई और उनके आशीर्वाद से यहां प्रदेश की सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा है।
ये भी पढ़ें: महाकाल के शृंगार में किस नियम का हो रहा उल्लंघन? बन रहा क्षरण की वजह, भांग की नई व्यवस्था लागू
छह साल में बनी प्रतिमा, 1895 में हुई शुरुआत
वर्ष 1895 में इंदौर के बड़ा गणपति मंदिर का कार्य आरंभ हुआ। गणेश की इस भव्य और विशाल प्रतिमा के निर्माण के लिए राजस्थान, ग्वालियर और आगरा से कारीगर बुलवाए गए थे। छह वर्ष की मेहनत और प्रयासों से प्रतिमा का निर्माण कार्य 1901 में पूर्ण हुआ। बड़ा गणपति की प्रतिमा 25 फीट ऊंची और 16 फीट चौड़ी है।
सभी तीर्थों के जल का उपयोग किया
प्रतिमा के निर्माण में धार्मिक मान्यताओं का पूर्ण ध्यान रखा गया था। इस निर्माण में सभी तीर्थ स्थलों की पवित्र नदियों का जल, गौशाला, हाथी शाला और गौशाला की मिट्टी का प्रयोग किया गया। इसी के साथ मूर्ति निर्माण में पंच धातु का विधान के अनुसार उपयोग किया गया। मूर्ति निर्माण में इस बात का ध्यान रखा गया कि गणेश जी के प्रत्येक अंग बाहर की ओर निकले हुए दिखें।
ये भी पढ़ें: IAS अफसरों को देना होगा ऑनलाइन प्रॉपर्टी विवरण, नहीं दी जानकारी तो अटक जाएगा प्रमोशन
मंदिर परिसर का विस्तार 1952 में हुआ
नारायण जी दाधीच के पुत्र मिश्रीलाल दाधीच ने 1952 में मंदिर परिसर का विस्तार कर निर्माण कार्य करवाया था। इसके शिलान्यास के अवसर पर महाराजा तुकोजीराव होल्कर तृतीय और उनकी पत्नी शर्मिष्ठा देवी होल्कर सम्मिलित हुए थे।
सोने-चांदी के वरक से किया पहला शृंगार
1952 में पहली बार सोने चांदी के वरक से बड़ा गणपति का शृंगार में किया गया था। बड़ा गणपति को अभी चोला चढ़ाने में करीब 40 किलो शुद्ध घी और सिंदूर का उपयोग होता है। साल में चार बार ही चोला चढ़ाया जाता है। यह भादव, कार्तिक, माघ और वैशाख की चतुर्दशी को चोला शृंगार किया जाता है। इसमें सात दिन का समय लगता है। इस दौरान सवा मण यानी 50 किलो देशी घी, सिंदूर सहित अन्य सामग्री लगती है। स्व. नारायण दाधीच की तीसरी पीढ़ी पंडित धनेश्वर दाधिच और चौथी पीढ़ी के पंडित राजेश, राकेश, प्रमोद, सचिन, आदित्य नारायण दाधीच गणेश जी के सेवा में लगे हैं।
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
