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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Indore news: From the age of five, I had thought to become a saint, have done penance in Jain worship, five hundred verses are memorized,

Indore news: पांच साल की उम्र से सोच लिया था संत बनना है, जैन उपाश्रयों में कर चुके तप, पांच सौ श्लोक हैं कंठस्थ,

Mon, 16 May 2022 07:03 PM IST
चंद्रप्रकाश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: चंद्रप्रकाश शर्मा Updated Mon, 16 May 2022 07:03 PM IST
सार

दस साल के सिद्धम जैन अब श्रीचंद्रसागर महाराज बन गए। वे मूल रूप से आलीराजपुर के बोरी के निवासी हैं। परिवार के नौ सदस्य भी दीक्षा ले चुके हैं। सिद्धम पांच वर्ष की आयु से ही जैन संत बनने की राह पर चल पड़े थे। 

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Indore news: From the age of five, I had thought to become a saint, have done penance in Jain worship, five hundred verses are memorized,
दीक्षा लेने के बाद बने श्री चंद्रसागर महाराज - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

दस साल का सिद्धम जैन अब श्री चंद्रसागर महाराज के रूप में पहचाना जाएगा। रविवार को सिद्धम की दीक्षा पूरी हो गई और नया नाम मिल गया। अब वह संसार से विरक्त होकर संयम के मार्ग पर चल पड़ा है। आपको बताते हैं कि कौन है सिद्धम जैन और कैसे खेलने-कूदने की उम्र में उसके मन में वैराग्य का भाव जागा।
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सिद्धम जैन मूल रूप से आलीराजपुर के बोरी का निवासी है। पिता का नाम मनीष जैन और माता प्रियंका जैन है। सिद्धम को 500 से ज्यादा श्लोक कंठस्थ हैं। पांच सालों में गुजरात व मप्र के कई शहरों के जैन उपाश्रयों में तप कर चुका है। इसके बाद से ही 15 किमी का पैदल विहार भी किया है। वह बिना पंखे, फ्रिज, मोबाइल, टीवी के रहने आदी हो चुका है। पांच साल की उम्र से ही रात के भोजन का त्याग कर चुका है। सिद्धम के अनुसार मुझे पांच साल की उम्र में ही संत जीवन की समझ आ गई थी। उपधान में सुबह 4.30 बजे उठना, बिना स्नान किए व कच्चे पानी को छुए हर एक दिन छोड़कर उपवास कर रहा हूं। यह क्रम पांच सालों से चल रहा है। मम्मी-पापा कहते हैं आगे जाकर धर्म की इस परम्परा को खूब आगे बढ़ाना, उन्हें शोभायमान करना। मैं उसी संयम की राह पर चल रहा हूं। दीक्षा लेने से मैं अब छह निकायों के जीवों की हिंसा से बच जाऊंगा, मुझे पाप नहीं लगेगा। दीक्षा वह होती है जो आत्मा का कल्याण करने में अपने को सहयोग करती है। मुझे परम पूज्य बंधु बेलेडी व साधु-साध्वियों से दीक्षा की प्रेरणा मिली। मैं जब पांच साल पहले गुरुजी जैन आचार्य श्री जिनचंद्र सागर सुरीश्वरजी महाराज के पास आया तो संत जीवन की समझ आ गई। मैंने उनके साथ सामयिक रूप से कई चीजें की। इसके तहत 15 किमी का पैदल विहार किया। 
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दीक्षा से पहले सिद्धम जैन - फोटो : सोशल मीडिया

इकलौता बेटा है सिद्धम
सिद्धम की मां प्रियंका जैन ने कहा कि सिद्धम इकलौता बेटा है। बेटा अच्छी राह पर जाता है तो इससे खुशी होती है। पति भी यही सोचते हैं कि बेटा अच्छा कर रहा है। मैं भी बचपन से दीक्षा लेना चाहती थी, उसने मेरी प्रेरणा को पूरा किया। मैं उसे बचपन से ही कहती थी कि यह संयम लेने जैसा है। मैं बार-बार उसे आचार्यजी के पास लेकर जाती थी। दीक्षा मुझे लेनी थी लेकिन मैं नहीं ले पाई तो बच्चे को दिला रही हूं। आज वो संयम के मार्ग पर आगे जा रहा है। पिता मनीष जैन का मानना था कि वह थोड़ा बड़े होने पर दीक्षा लें लेकिन उसने मजबूती से प्रयास किया तो परिवार में सभी ने सहमति दे दी। वह संयम मार्ग पर आगे जा रहा है।यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है। 

अब हर प्रकार के कषायों से बच जाउंगा
दीक्षा के बाद मुनि श्रीचंद्रसागर महाराज बने सिद्धम ने कहा कि अब मुझे लोग मुझे नए नाम से पुकारेंगे और कहेंगे स्वाध्याय कर लो। कोई आइस्क्रीम खाने को नहीं कहेगा। नए नाम से पुण्य मिलेगा।  मैं बहुत खुश हूं, अब हर प्रकार से कषायों से बच जाऊंगा। पंखा, फ्रिज, मोबाइल, टीवी तो पहले भी नहीं देखता था। धर्म के साथ ओर भी कई बच्चे जुड़ेंगे। पांच साल की उम्र में गुरुजनों के साथ हूं और रात्रि भोजन त्याग दिया। 

परिवार से यह दसवीं दीक्षा
सिद्धम जैन अकेला नहीं है जिसने दीक्षा ली बल्कि इस परिवार से नौ सदस्य पहले भी दीक्षा ले चुके हैं। कांतिमुनि महाराज, गणिवर्य मेघचंद्रसागर, पदमचंद्र सागर, आनंदचंद्रसागर, प्रियचंदसागर महाराज, साध्वी मेघवर्षा श्रीजी, पदमवर्षा श्रीजी,आनंदवर्षा श्रीजी भी शामिल है। दसवीं दीक्षा सिद्धम ने ली। उनके दीक्षा गुरु गणिवर्य आनंदचंद्रसागर महाराज बने जो उनके सांसारिक जीवन के मामा है।
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