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MP Vyapam Case: सॉल्वर बैठाकर आरक्षक बने युवक को कोर्ट ने सुनाई 14 साल की सजा, एक दशक से कर रहा था नौकरी

Mon, 18 Nov 2024 06:14 PM IST
अरविंद कुमार न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर Published by: अरविंद कुमार Updated Mon, 18 Nov 2024 06:14 PM IST
सार

मध्यप्रदेश में हुई पुलिस भर्ती परीक्षा 2013 में धर्मेंद्र शर्मा नामक युवक आरक्षक बना था, जबकि उसकी जगह बैठकर परीक्षा फर्जी अभ्यर्थी ने दी थी। एक रिश्तेदार ने शिकायत दर्ज कराई थी, आरोपी धर्मेंद्र ने दो बार यानी अप्रैल 2013 और सितंबर 2013 में सॉल्वर बैठाकर परीक्षा दिलवाई थी।

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MP Vyapam Case Court sentenced 14 years imprisonment to youth who became constable by using solver
ग्वालियर कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ग्वालियर जिला न्यायालय के एसटीएफ विशेष कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए पुलिस में कार्यरत एक आरक्षक को 14 साल की सजा सुनाई है। खास बात ये है कि आरक्षक के खिलाफ आरोप था कि वह पुलिस भर्ती परीक्षा में सॉल्वर को बैठाकर पास हुआ था। यह शिकायत उसके ही एक रिश्तेदार द्वारा 10 साल बाद की गई और अब जब उसे सजा सुनाई गई, तब वह 11 साल की नौकरी कर चुका है। आरक्षक वर्तमान में इंदौर के विजय नगर थाने में पदस्थ था।

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दरअसल, मप्र में हुई पुलिस भर्ती परीक्षा 2013 में धर्मेंद्र शर्मा नामक युवक आरक्षक बना था, जिसके स्थान पर किसी अन्य युवक ने परीक्षा दी थी। तब धर्मेंद्र की उम्र 19 साल थी। 2022 में एसटीएफ मुख्यालय भोपाल में धर्मेंद्र के ही एक रिश्तेदार ने शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपी धर्मेंद्र ने दो बार यानी अप्रैल 2013 और सितंबर 2013 में सॉल्वर बैठाकर परीक्षा दी थी। अप्रैल के एग्जाम में वह सफल नहीं हुआ, लेकिन सितंबर की परीक्षा में पास हो गया और वह बगैर परीक्षा दिए आरक्षक बन गया। 
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साक्ष्य जुटाना बना चुनौती
शिकायत पर केस दर्ज करने के बाद तत्कालीन एडीजी पंकज श्रीवास्तव ने राजेश भदौरिया के नेतृत्व में इसके लिए एक जांच टीम बनाई। नौ साल बाद व्यापम की कॉपियां और अन्य साक्ष्य जुटाना बड़ी चुनौती थी। जब इसके लिए एसटीएफ ने व्यापम से संपर्क किया तो पता चला कि पहले रिकॉर्ड तीन साल बाद नष्ट कर दिया जाता था। लेकिन 2013 में व्यापम फर्जीवाड़ा खुलने के बाद रिकॉर्ड दस साल तक रखा जाने लगा है। एसटीएफ ने आरोपी की कॉपियां व्यापम से लेकर क्यूडी जांच के लिए भेजी। पांच महीने बाद इसकी रिपोर्ट मिली। इसमें कॉपियों में धर्मेंद्र शर्मा की हैंड राइटिंग नहीं पाई गई।  इसके बाद इसका कोर्ट में चालान पेश किया गया और इसकी सुनवाई पर निगरानी के लिए एक नोडल अधिकारी की भी नियुक्ति की गई। महज चार महीने में ही कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई पूरी कर ली।
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ग्वालियर के एसटीएफ कोर्ट के जज नीतिराज सिंह सिसोदिया ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी आरक्षक धर्मेंद्र शर्मा को दो मामलों में सात-सात साल के कारावास की सज़ा सुनाई और 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। खास बात ये भी कि इस मामले में सॉल्वर कौन था? इसका पता लगाने में एसटीएफ असफल रही। न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अयोग्य और बेइमान अभ्यर्थी के शासकीय सेवक के रूप में चयन होने से दुष्परिणामों की कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे अपराधों की पुनरावृत्ति रोकने और व्यवस्था पर लोगों का विश्वास रखने के लिए अभियुक्त को पर्याप्त दंड देना जरूरी है। ऐसे अपराध से पूरा समाज और युवा वर्ग प्रभावित होता है।

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