{"_id":"6af006f588e9a528d8014255","slug":"madhya-pradesh-high-court-abortion-petitions-medical-board-guidelines-2026-11-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"दुष्कर्म पीड़ितों की गर्भपात याचिकाओं को प्राथमिकता दें अदालतें: छुट्टी के दिन खुला उच्च न्यायालय, दिए निर्देश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दुष्कर्म पीड़ितों की गर्भपात याचिकाओं को प्राथमिकता दें अदालतें: छुट्टी के दिन खुला उच्च न्यायालय, दिए निर्देश
Sun, 08 Nov 2026 10:53 AM IST
प्रतीक कुमार पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: प्रतीक कुमार पाण्डेय
Updated Sun, 08 Nov 2026 10:53 AM IST
सार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िताओं और अन्य विशेष मामलों में गर्भपात की अनुमति से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के लिए प्रदेश की सभी अदालतों को नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब ऐसी याचिकाओं को आगे भेजने से पहले मेडिकल बोर्ड की विस्तृत रिपोर्ट अनिवार्य होगी।
विज्ञापन
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने दुष्कर्म पीड़िताओं और अन्य विशेष मामलों में गर्भपात की अनुमति से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के लिए पूरे प्रदेश की अदालतों को नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। उच्च न्यायालय ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में हर एक दिन बेहद कीमती होता है। इसी कारण किसी भी प्रकरण को अगली अदालत में भेजने से पहले मेडिकल बोर्ड की स्पष्ट और विस्तृत रिपोर्ट होना पूरी तरह अनिवार्य किया गया है।
छुट्टी के दिन विशेष सुनवाई
दिवाली के सार्वजनिक अवकाश के बावजूद उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई की। शिवपुरी की 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की विशेष पीठ ने सात नवंबर को छुट्टी के दिन विशेष रूप से सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। विशेष पीठ ने त्वरित फैसला देते हुए 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 26 सप्ताह का गर्भ समाप्त करने की अनुमति प्रदान की।
करैरा की विशेष अदालत से उच्च न्यायालय पहुंची इस याचिका में शुरुआत में जीआर मेडिकल कॉलेज और कमलाराजा अस्पताल के संयुक्त मेडिकल बोर्ड द्वारा दी गई पहली रिपोर्ट स्पष्ट नहीं थी। उच्च न्यायालय के दोबारा निर्देश जारी करने के बाद डॉक्टरों की टीम ने खून की पर्याप्त उपलब्धता तथा आवश्यक सावधानियों को ध्यान में रखते हुए इस प्रक्रिया को चिकित्सीय रूप से सुरक्षित करार दिया था।
विज्ञापन
शाम तक प्रक्रिया पूरी करने का आदेश
उच्च न्यायालय ने पीड़िता की कम उम्र और उसकी गंभीर मानसिक पीड़ा को ध्यान में रखते हुए वरिष्ठ डॉक्टरों को 7 नवंबर को ही शाम 4:00 बजे तक गर्भपात की पूरी प्रक्रिया संपन्न करने के स्पष्ट निर्देश दिए। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट मिलने के बाद अदालत ने यह निर्णय सुनाया।
उच्च न्यायालय ने इस महत्त्वपूर्ण आदेश की प्रतियां जबलपुर स्थित मुख्यपीठ, इंदौर तथा ग्वालियर पीठ के साथ-साथ प्रदेश के सभी जिला न्यायालयों को भेजने के निर्देश जारी किए हैं। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में कोई भी याचिका मेडिकल बोर्ड की अधूरी या अस्पष्ट रिपोर्ट की वजह से अदालतों में न अटके।
मेडिकल रिपोर्ट में तीन बिंदु अनिवार्य
उच्च न्यायालय के निर्देशों के मुताबिक, भविष्य में ऐसे संवेदनशील मामलों को आगे भेजते समय निचली अदालतों को मेडिकल बोर्ड की स्पष्ट रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अब से मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन बातें दर्ज होना अनिवार्य है:
पहला, पीड़िता की वर्तमान शारीरिक स्थिति का विस्तृत ब्योरा।
दूसरा, गर्भ की सटीक अवधि यानी गर्भ कितने सप्ताह का है।
तीसरा, चिकित्सीय रूप से गर्भपात संभव और सुरक्षित है या नहीं।
प्राथमिक आधार पर सुनवाई के निर्देश
उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए अत्यंत तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में महज एक दिन की देरी भी पीड़िता के स्वास्थ्य और उसके संपूर्ण जीवन के लिए ऐसे गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है, जिनकी भरपाई भविष्य में कभी भी संभव नहीं हो सकती।
इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने प्रदेश भर की सभी अदालतों को निर्देश दिया कि दुष्कर्म पीड़ितों से जुड़ी ऐसी याचिकाओं को अदालतों में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। उच्च न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि चिकित्सा रिपोर्ट में किसी भी स्तर पर अस्पष्टता न रहे।
विज्ञापन
छुट्टी के दिन विशेष सुनवाई
दिवाली के सार्वजनिक अवकाश के बावजूद उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई की। शिवपुरी की 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की विशेष पीठ ने सात नवंबर को छुट्टी के दिन विशेष रूप से सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। विशेष पीठ ने त्वरित फैसला देते हुए 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 26 सप्ताह का गर्भ समाप्त करने की अनुमति प्रदान की।
विज्ञापन
करैरा की विशेष अदालत से उच्च न्यायालय पहुंची इस याचिका में शुरुआत में जीआर मेडिकल कॉलेज और कमलाराजा अस्पताल के संयुक्त मेडिकल बोर्ड द्वारा दी गई पहली रिपोर्ट स्पष्ट नहीं थी। उच्च न्यायालय के दोबारा निर्देश जारी करने के बाद डॉक्टरों की टीम ने खून की पर्याप्त उपलब्धता तथा आवश्यक सावधानियों को ध्यान में रखते हुए इस प्रक्रिया को चिकित्सीय रूप से सुरक्षित करार दिया था।
विज्ञापन
शाम तक प्रक्रिया पूरी करने का आदेश
उच्च न्यायालय ने पीड़िता की कम उम्र और उसकी गंभीर मानसिक पीड़ा को ध्यान में रखते हुए वरिष्ठ डॉक्टरों को 7 नवंबर को ही शाम 4:00 बजे तक गर्भपात की पूरी प्रक्रिया संपन्न करने के स्पष्ट निर्देश दिए। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट मिलने के बाद अदालत ने यह निर्णय सुनाया।
उच्च न्यायालय ने इस महत्त्वपूर्ण आदेश की प्रतियां जबलपुर स्थित मुख्यपीठ, इंदौर तथा ग्वालियर पीठ के साथ-साथ प्रदेश के सभी जिला न्यायालयों को भेजने के निर्देश जारी किए हैं। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में कोई भी याचिका मेडिकल बोर्ड की अधूरी या अस्पष्ट रिपोर्ट की वजह से अदालतों में न अटके।
मेडिकल रिपोर्ट में तीन बिंदु अनिवार्य
उच्च न्यायालय के निर्देशों के मुताबिक, भविष्य में ऐसे संवेदनशील मामलों को आगे भेजते समय निचली अदालतों को मेडिकल बोर्ड की स्पष्ट रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अब से मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन बातें दर्ज होना अनिवार्य है:
पहला, पीड़िता की वर्तमान शारीरिक स्थिति का विस्तृत ब्योरा।
दूसरा, गर्भ की सटीक अवधि यानी गर्भ कितने सप्ताह का है।
तीसरा, चिकित्सीय रूप से गर्भपात संभव और सुरक्षित है या नहीं।
प्राथमिक आधार पर सुनवाई के निर्देश
उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए अत्यंत तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में महज एक दिन की देरी भी पीड़िता के स्वास्थ्य और उसके संपूर्ण जीवन के लिए ऐसे गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है, जिनकी भरपाई भविष्य में कभी भी संभव नहीं हो सकती।
इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने प्रदेश भर की सभी अदालतों को निर्देश दिया कि दुष्कर्म पीड़ितों से जुड़ी ऐसी याचिकाओं को अदालतों में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। उच्च न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि चिकित्सा रिपोर्ट में किसी भी स्तर पर अस्पष्टता न रहे।
