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एमपी-गुजरात के बीच शेरों को लेकर जंग

Mon, 04 Aug 2014 12:30 PM IST
Updated Mon, 04 Aug 2014 12:30 PM IST
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gujarat mp dispute on lions

गुजरात के गिर के जंगलों से कुछ शेरों को मध्य प्रदेश के कूनो अभयारण्य भेजे जाने को लेकर दोनों सूबों की सरकारें लंबे समय से क़ानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में शेरों को लुप्त होने से बचाने के लिए कुछ शेरों को किसी और जंगल में भेजना ज़रूरी है वहीं गुजरात सरकार मानती है कि वे गुजरात में ही सुरक्षित हैं।

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क्या ये मामला सिर्फ़ राजनीति में उलझा है या इसमें व्यावसायिक हित भी हैं? पिछले कई साल से एशियाई शेर अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं, वहीं एक जंग जंगल से बाहर भारत की अदालतों, सरकारी दफ्तरों और राजनीतिक गलियारों में लड़ी जा रही हैं।
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जब भारत में शेर सिर्फ़ सौराष्ट्र में सिमट गए, तब उन्हें बचाने के लिए 1950 में वाइल्डलाइफ़ बोर्ड ने उनमें से कुछ शेरों को दूसरे जंगलों में भेजने का निर्णय लिया था। 1957-58 में तीन शेर ट्रेन के ज़रिए गुजरात से उत्तर प्रदेश के चंद्रप्रभा अभ्यारण्य में छोड़े भी गए।
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कुछ साल में वो तीन से 11 हो गए पर जल्दी ही मर गए या कुछ शिकार के शिकार हो गए। 1986 में वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के शोधकर्ताओं ने उन्हें प्राकृतिक आपदा या महामारी से बचाने के लिए स्थानांतरित करने पर ज़ोर दिया। अक्टूबर 1993 में वडोदरा में 'पॉप्युलेशन एंड हैबिटेट एनेलिसिस वर्कशॉप' में शेरों के लिए राजस्थान में दरा जवाहरसागर, सीतामाता सैंक्चुअरी और मध्य प्रदेश में कुनो सैंक्चुअरी को चुना गया।

गुजरात सरकार ने शेर देने से किया इंकार

gujarat mp dispute on lions

कुनो का चयन होते ही मध्य प्रदेश सरकार ने जंगल और उसमें बसे 18 गांवों के क़रीब डेढ़ हज़ार परिवारों का पुनर्वास कर दिया था लेकिन गुजरात ने शेर देने से मना कर दिया। डॉक्टर रवि चेल्लम कहते हैं, "किसी ने नहीं सोचा था कि गुजरात सरकार शेर देने से मना कर देगी। शेर गुजरात में सुरक्षित हैं लेकिन शेरों का स्थानांतरण उनके लिए लाइफ इंश्योरेंस जैसा है।"

गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शेरों को दूसरे राज्य न भेजने के लिए कई तर्क दिए। गुजरात सरकार के एक अफ़सर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ''मोदी ने गुजरात की अस्मिता को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। शेरों को इस अस्मिता से जोड़कर उन्होंने उनके स्थानांतरण के मुद्दे पर राजनीति कर दी।।।मोदी और शिवराज चौहान के रिश्ते भी नाज़ुक रहे हैं, इसलिए वह शेर भेजने को राज़ी नहीं थे।"

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि गुजरात समिति बनाकर छह महीने में शेरों को भेजने का काम पूरा करे। लेकिन गुजरात सरकार ने रिव्यू पेटीशन दायर कर दी।

गुजरात के सैलानी कम होने का खतरा?

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हालांकि गुजरात में शेरों की आबादी बढ़ रही है। सासन गिर जंगल के उपसंरक्षक संदीप कुमार कहते हैं, "गिर में शेर अब सुरक्षित है। इनका जेनेटिक पूल सलामत है और अब ऐसा कोई खतरा नहीं रहा। हमने विश्व स्तरीय चिकित्सालय से लेकर कई बचाव सेंटर बनाए हैं और नए रिज़र्व एरिया भी बना रहे हैं। गिर नेशनल पार्क के अलावा गुजरात में उनके लिए नए घर होंगे।"

लेकिन इससे इंसान और जानवर के बीच संघर्ष बढ़ने का भी ख़तरा है। हालांकि कुछ लोग ये भी कहते हैं कि स्थानीय लोग शेरों से प्यार तो बहुत करते हैं लेकिन अगर उनमें से कुछ को वहां से दूसरी जगहों पर भेजा जाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन उन्हें ये बताना होगा कि ऐसा करना शेरों की प्रजाति को बचाने के लिए ज़रूरी है।

अमरेली ज़िले के वन्य जीव कार्यकर्ता मनोज जोशी कहते हैं, "सौराष्ट्र के लोग शेरों से इतना प्यार करते हैं और अगर उन्हें बचाने के इरादे से तीन-चार शेरों को दूसरी जगह भेज भी दिया जाएगा तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।"

वही खम्भा-गिर नेचर क्लब के अध्यक्ष भीखाभाई जेठवा कहते हैं, "गिर में कई बीजेपी नेताओं के रिसॉर्ट हैं और अगर शेर मध्य प्रदेश जाता है, तो उन्हें ख़तरा है कि गुजरात आने वाले सैलानी कम हो जाएंगे। अब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री हैं। अब वह किसका हित सोचते हैं, यह देखना होगा।"

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