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MP News: दमोह में 1933 में महात्मा गांधी ने रखी थी इस गुरुद्वारे की नींव, वाल्मिक समाज करता है संचालन

Tue, 30 Jan 2024 12:23 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह Published by: शबाहत हुसैन Updated Tue, 30 Jan 2024 12:23 PM IST
सार

MP News: आज पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि मना रहा है और इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। दमोह में भी बापू का आगमन हुआ था और यहां उन्होंने गुरुद्वारे की नींव रखी थी, इस गुरुद्वारे का संचालन वाल्मिक समाज के द्वारा किया जाता है।

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Mahatma Gandhi had laid the foundation of this Gurudwara in Damoh in 1933
दमोह में 1933 में महात्मा गांधी ने रखी थी इस गुरुद्वारे की नींव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलनों के समय देश के कई राज्यों समेत मध्यप्रदेश का भी दौरा किया था। 1933 में बापू पहली बार दमोह आए थे। दमोह प्रवास के दौरान गांधीजी ने शहर के गड़रयाओ मोहल्ले में गुरुद्वारे की स्थापना की थी जिसका एक शिलालेख वहां मौजूद है। गुरुद्वारे की देखरेख वाल्मीकि समाज द्वारा की जाती है।

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शेवरेले कार से घूमा था दमोह
बापू जिस समय दमोह आए थे तब उस समय की सबसे महंगी कार शेवरेले में उन्हें शहर का भ्रमण कराया गया था। बापू को गढ़ाकोटा से दमोह तक उसी कार से लाया गया था। वह कार दमोह के प्रतिष्ठित डॉक्टर दुआ की थी, उस समय कार को जगन्नाथ पटेरिया ने चलाया था। बापू ने दमोह पहुंचकर शहर के मोरगंज गल्ला मंडी में सभा की थी, जिसमें करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे। उसके बाद वह मलिन बस्ती वर्तमान में गड़रयाओ मोहल्ला पहुंचे और वहां गुरुद्वारे की नींव रखी थी।
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डॉक्टर दुआ की जुबानी
शहर के प्रतिष्ठित डॉक्टर तरुण दुआ बताते हैं कि उनके दादा डॉक्टर बीडी दुआ उस समय जेल डॉक्टर थे, लेकिन गांधी जी से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी और देश की आजादी के लिए कूद पड़े थे। दमोह आने से पहले गांधी जी गढ़ाकोटा में रुके थे, जहां से उन्हें दमोह आना था। इसलिए उनके दादा ने उनके करीबी जगन्नाथ पटेरिया को अपनी शेवरेले कार दी और कहा कि वह गांधी जी को इसी कार से दमोह लेकर आए। जगन्नाथ पटेरिया भी देशभक्त थे और हमेशा खादी पहनते थे। उस समय उनके दादा की कार में चमड़े के सीट कवर थे, इसलिए उन्हें निकालकर खादी के कपड़े के सीट कवर लगाए गए और फिर गांधी जी को गढ़ाकोटा से दमोह लाया गया। उसी कार से उन्हें दमोह की सैर कराई गई थी। डॉक्टर तरुण दुआ बताते है कि जब भी उनके परिजन उन्हें देश की आजादी में उनके दादा का योगदान बताते थे, तो उन्हें काफी गर्व होता था। आज भी उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनके परिजनों ने भी देश की आजादी में अपना योगदान दिया। हालांकि लंबा समय होने के कारण उनके पास उस समय की कोई फोटो नहीं है।
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नारा दिया था ‘एक चवन्नी चांदी की जय बोल महात्मा गांधी की’
गांधी जी के दमोह आगमन के एक प्रत्यक्ष गवाह पूर्व विधायक स्वर्गीय आनंद श्रीवास्तव भी हमेशा बताते थे कि जब गांधी जी दमोह आए थे, उस समय अंग्रेजों ने सिक्के के रूप में एक चांदी की चवन्नी यानी 25 पैसे के चलन को शुरू किया था। उसी चवन्नी को लेकर दमोह में एक नारा तैयार किया गया, जिसमें कहा गया था, एक चवन्नी चांदी की जय बोल महात्मा गांधी की। दमोह में बना यह नारा पूरे देश में चलन में आया था। वह बताते थे कि उस समय वह छोटे थे, लेकिन उन्होंने घंटाघर पर गांधीजी को करीब से देखा था और उस नारे की गूंज सुनी थी।

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