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एमपी के अतिथि विद्वानों को स्थायी नौकरी कब?: हरियाणा से बेहतर नीति का वादा, फिक्स वेतन और समायोजन का इंतजार

Thu, 29 Oct 2026 11:53 AM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल Published by: Sandeep Kumar Tiwari Updated Thu, 29 Oct 2026 11:53 AM IST
सार

मध्यप्रदेश में अतिथि विद्वानों के स्थायित्व, फिक्स वेतन, समायोजन और सेवा सुरक्षा का मुद्दा फिर चर्चा में है। हरियाणा से बेहतर नीति का आश्वासन मिलने के बाद अब अतिथि विद्वान उसके क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं। चर्चा के बाद भी अंतिम नीति और लागू करने की तारीख स्पष्ट नहीं है। 

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When will guest scholars in MP get permanent jobs?: Promise of a policy better than Haryana’s; they await fixe
उच्च शिक्षा मंत्री से अतिथि विद्वानों की मुलाकात - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्यप्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों में वर्षों से पढ़ा रहे अतिथि विद्वानों के लिए सबसे बड़ा सवाल अब भी उनकी नौकरी की सुरक्षा और भविष्य का है। फिक्स वेतन, स्थायित्व, समायोजन और नियमित प्राध्यापकों की नियुक्ति के कारण सेवा प्रभावित होने जैसी समस्याओं का समाधान कब होगा, इस पर अतिथि विद्वानों की नजरें टिकी हैं। सरकार की ओर से दूसरे राज्यों की व्यवस्थाओं का अध्ययन करने और बेहतर नीति बनाने की बात पहले कही जा चुकी है, लेकिन अब अतिथि विद्वान उस घोषणा को जमीन पर उतरते देखना चाहते हैं। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के साथ अतिथि विद्वान महासंघ के प्रतिनिधिमंडल की चर्चा में स्थायित्व, समायोजन और भविष्य की सुरक्षा का मुद्दा फिर उठा। महासंघ की मांग है कि वर्षों से सेवाएं दे रहे अतिथि विद्वानों के लिए प्रभावी नीति लागू की जाए। हालांकि, इस चर्चा के बाद भी नीति लागू करने की तारीख, पात्रता की शर्तों या समायोजन की अंतिम प्रक्रिया को लेकर कोई सार्वजनिक घोषणा सामने नहीं आई है।
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हरियाणा मॉडल से बेहतर नीति का आश्वासन
अतिथि विद्वानों के भविष्य को लेकर 10 जुलाई 2026 को भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित स्वागत सम्मेलन महत्वपूर्ण रहा था। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने अतिथि विद्वानों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए हरियाणा सरकार की नीति से बेहतर व्यवस्था लाने का आश्वासन दिया था। उस समय फिक्स वेतन, नियमितीकरण और सेवा सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चर्चा में रहे थे। इससे पहले जनवरी 2026 में हरियाणा मॉडल का अध्ययन करने के लिए समिति बनाए जाने को लेकर भी रिपोर्ट सामने आई थी। हरियाणा की व्यवस्था में निर्धारित पात्रता वाले अतिथि शिक्षकों के लिए निश्चित वेतन और सेवा सुरक्षा जैसे प्रावधानों का उल्लेख किया गया था। मध्यप्रदेश में भी इसी तरह की व्यवस्था की संभावनाओं पर चर्चा हुई, लेकिन हरियाणा के प्रावधानों को हूबहू लागू करने या मध्यप्रदेश के लिए अंतिम नीति मंजूर होने की पुष्टि नहीं है। अब अतिथि विद्वानों की मांग है कि दूसरे राज्यों की व्यवस्थाओं का अध्ययन केवल चर्चा तक सीमित न रहे, बल्कि मध्यप्रदेश की परिस्थितियों के अनुसार स्पष्ट नीति तैयार कर लागू की जाए।
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फिक्स वेतन और स्थायित्व पर टिकी निगाहें
अतिथि विद्वानों के लिए फिक्स वेतन का मुद्दा इसलिए अहम है, क्योंकि उनकी आय और सेवा की निरंतरता का सीधा संबंध उनके भविष्य से है। लंबे समय तक कॉलेजों में पढ़ाने के बावजूद यदि सेवा की स्थिति अनिश्चित बनी रहती है, तो उनके सामने आर्थिक सुरक्षा और रोजगार की चिंता बनी रहती है। अतिथि विद्वान चाहते हैं कि सरकार उनकी सेवा अवधि और अनुभव को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था बनाए, जिससे उन्हें लंबे समय तक काम करने के बाद भी भविष्य को लेकर असमंजस का सामना न करना पड़े। हालांकि, प्रस्तावित फिक्स वेतन की राशि, उसके दायरे और लागू करने की शर्तों पर अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं हुआ है।
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नियमित नियुक्तियों के बीच फॉलन आउट की समस्या
अतिथि विद्वानों की प्रमुख समस्याओं में फॉलन आउट भी शामिल है। नियमित प्राध्यापकों की नियुक्ति होने पर संबंधित पद पर काम कर रहे अतिथि विद्वान की सेवा प्रभावित हो सकती है। ऐसे में वर्षों से पढ़ाने वाले अतिथि विद्वानों के सामने दोबारा रोजगार की अनिश्चितता खड़ी हो जाती है। संघ के अध्यक्ष देवराज सिंह ने कहा कि महासंघ लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग करता रहा है, जिससे नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया और अतिथि विद्वानों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सके। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए समायोजन की स्पष्ट नीति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, किन परिस्थितियों में और किस प्रक्रिया के तहत समायोजन किया जाएगा, इस पर अभी अंतिम रूपरेखा स्पष्ट नहीं है।

भर्ती में आरक्षण और आयु सीमा में छूट का मुद्दा भी अहम
अतिथि विद्वानों से जुड़ी चर्चाओं में सहायक प्राध्यापक भर्ती के दौरान आरक्षण और आयु सीमा में छूट जैसे मुद्दे भी सामने आए हैं। जुलाई के कार्यक्रम से संबंधित रिपोर्टों में अतिथि विद्वानों के लिए 25 प्रतिशत पद आरक्षित करने और आयु सीमा में 10 वर्ष की छूट जैसी सुविधाओं का उल्लेख किया गया था। इन प्रावधानों को स्थायित्व और समायोजन से अलग समझना जरूरी है। भर्ती में आरक्षण या आयु सीमा में छूट मिलने से पात्र अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया में अवसर मिल सकता है, लेकिन इससे सभी कार्यरत अतिथि विद्वानों की सेवा अपने आप सुरक्षित या नियमित नहीं हो जाती। इसलिए महासंघ की मांग है कि सेवा सुरक्षा के मुद्दे पर भी अलग से ठोस व्यवस्था बनाई जाए।

छुट्टी और सामाजिक सुरक्षा पर भी स्पष्टता की जरूरत
संघ के मीडिया प्रभारी आशीष पाण्डेय ने बताय कि अतिथि विद्वानों से संबंधित मांगों में आकस्मिक अवकाश, ऐच्छिक अवकाश, महिला अतिथि विद्वानों के लिए प्रसूति अवकाश और स्थान परिवर्तन जैसी सुविधाएं भी शामिल रही हैं। इसके अलावा तकनीकी शिक्षा विभाग में कार्यरत अतिथि विद्वानों के वेतन और सेवा संबंधी व्यवस्थाओं को उच्च शिक्षा विभाग के समान करने का मुद्दा भी उठाया गया था। इन सुविधाओं का उद्देश्य अतिथि विद्वानों को काम के दौरान बेहतर सुरक्षा और सहूलियत देना है। लेकिन इनकी वर्तमान स्थिति, लागू होने के दायरे और विभागवार नियमों की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। किसी सुविधा की मांग उठना और उसका सरकारी स्तर पर लागू हो जाना अलग-अलग स्थितियां हैं।


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अब सरकार के सामने तीन बड़े सवाल
अतिथि विद्वानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पहले किए गए आश्वासनों पर आगे क्या कार्रवाई हुई है। क्या हरियाणा मॉडल का अध्ययन पूरा हो चुका है? क्या स्थायित्व और समायोजन को लेकर कोई लिखित प्रस्ताव तैयार है? और क्या नीति लागू करने की समयसीमा तय की गई है? इन सवालों के जवाब मिलने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि सरकार की ओर से अब तक क्या प्रक्रिया पूरी की गई है और अतिथि विद्वानों को राहत मिलने की दिशा में अगला कदम क्या होगा। अतिथि विद्वान महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. देवराज सिंह ने उच्च शिक्षा मंत्री और विभागीय अधिकारियों के प्रति आभार जताते हुए उम्मीद व्यक्त की है कि सरकार जल्द सकारात्मक निर्णय लेगी। फिलहाल अतिथि विद्वानों की निगाहें किसी नए आश्वासन से ज्यादा उस ठोस नीति पर हैं, जो उनकी सेवा, आय और भविष्य को लेकर बनी अनिश्चितता दूर कर सके।
 
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