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एनएलआईयू की रिसर्च: कठोर कानून के बाद भी क्यों नहीं थम रहे दुष्कर्म?,एमपी के जेलों में बंद दोषियों ने खोले राज
Sat, 31 Oct 2026 05:28 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Sat, 31 Oct 2026 05:28 PM IST
सार
दुष्कर्म रोकने के लिए कानून में फांसी और उम्रकैद जैसी सख्त सजा के प्रावधान भी अपराधियों की मानसिकता नहीं बदल पा रहे हैं। एनएलआईयू के छह साल के शोध में 300 दोषियों से बातचीत के दौरान सामने आया कि 154 ने नाबालिगों को निशाना बनाया था और 89 आदतन अपराधी थे। शोध में महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण सोच को अपराध की बड़ी वजह बताया है।
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दुष्कर्मियों पर रिसर्च
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध के लिए फांसी और उम्रकैद तक का प्रावधान है, लेकिन क्या सजा का डर अपराधियों की सोच बदल पा रहा है? भोपाल की नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू) के एक विस्तृत शोध ने इस सवाल को फिर खड़ा कर दिया है। भोपाल, इंदौर और ग्वालियर की केंद्रीय जेलों में बंद 300 दुष्कर्म के दोषियों से बातचीत में सामने आया कि बड़ी संख्या में अपराधियों की महिलाओं के प्रति सोच बेहद संकीर्ण और भेदभावपूर्ण थी। कुछ दोषियों को यह तक समझ नहीं थी कि यौन संबंधों में महिला की सहमति अनिवार्य है। वहीं कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने अपराध को गलत मानने से ही इनकार कर दिया।
जेलों में बंद 300 दोषियों के साक्षात्कार
एनएलआईयू के विधि शोधार्थी और अधिवक्ता डॉ. प्रखर बजाज ने 6 साल इस विषय पर शोध किया। अध्ययन का मुख्य सवाल था कि क्या दुष्कर्म रोकने के लिए कठोर दंड पर्याप्त है? इसके लिए भोपाल, इंदौर और ग्वालियर की जेलों में बंद 300 दोषियों के साक्षात्कार किए गए। साथ ही 60 पुलिस अधिकारियों, 20 जेल अधिकारियों और 53 विधि विशेषज्ञों से भी जानकारी जुटाई गई। इस तरह कुल 433 लोगों से प्राप्त जानकारी के आधार पर अपराधियों की मानसिकता, सामाजिक पृष्ठभूमि और कानून के प्रभाव का विश्लेषण किया गया।
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154 मामलों में पीड़ित नाबालिग, 34 में हत्या तक
शोध के आंकड़े अपराध की भयावहता को सामने रखते हैं। अध्ययन में शामिल 300 दोषियों में से 154 ने नाबालिगों को अपना शिकार बनाया था। 34 मामलों में दुष्कर्म के बाद पीड़िता की हत्या भी की गई। 246 दोषियों की उम्र 18 से 39 वर्ष के बीच थी, जबकि 109 निरक्षर पाए गए। आंकड़े बताते हैं कि अपराध को केवल शिक्षा, उम्र या सामाजिक स्थिति के किसी एक आधार पर समझना आसान नहीं है। इसके पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारक काम करते हैं।
महिलाओं की आजादी से परेशानी, कपड़ों और नौकरी पर भी आपत्ति
डॉ. बजाज के साक्षात्कारों में सामने आया कि कई दोषियों की महिलाओं के प्रति सोच बेहद आपत्तिजनक थी। वे महिलाओं के छोटे कपड़े पहनने, घर से बाहर निकलने और
नौकरी करने जैसी स्वतंत्रताओं को पसंद नहीं करते थे। यहां तक कि अपने परिवार की महिलाओं के काम करने और आजीविका कमाने पर भी उन्हें आपत्ति थी। शोधकर्ता के अनुसार, महिलाओं को बराबरी का अधिकार न देने और उनकी स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करने वाली यह मानसिकता गंभीर चिंता का विषय है। अपराध रोकने के लिए केवल घटना के बाद सजा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उस सोच को बदलना होगा, जिसमें महिला की इच्छा, स्वतंत्रता और सहमति का सम्मान नहीं किया जाता।
221 को अपराध का पछतावा, कुछ ने गलती मानने से भी किया इनकार
अध्ययन में 300 दोषियों में से 221 ने अपने अपराध पर पछतावा जताया। कई दोषियों ने कहा कि उनके एक गलत कदम ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया और अब उनके पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचा। हालांकि, शोध में ऐसे दोषी भी सामने आए जिन्होंने अपने कृत्य को गलत मानने से इनकार कर दिया। डॉ. बजाज के मुताबिक, कुछ मामलों में जमीन के विवाद और आपसी रंजिश जैसे कारणों से पहले से योजना बनाकर अपराध किए गए थे। ऐसे दोषियों में पछतावे का भाव नहीं दिखाई दिया। अध्ययन में 103 दोषियों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड था, जबकि 89 को आदतन अपराधी पाया गया। यह अंतर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहले से आपराधिक रिकॉर्ड होना और आदतन अपराधी होना एक ही श्रेणी नहीं है।
पहली से आठवीं तक बच्चों को पढ़ाया जाए सहमति और समानता का पाठ
शोध में अपराध की रोकथाम के लिए स्कूली शिक्षा में बदलाव की सिफारिश की गई है। डॉ. बजाज का सुझाव है कि पहली से आठवीं कक्षा तक बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार महिलाओं के प्रति सम्मान, लैंगिक समानता और आपसी सहमति की शिक्षा दी जाए। बच्चों को शुरुआत से ही यह समझाना जरूरी है कि किसी भी रिश्ते में सहमति अनिवार्य है और महिलाओं को भी पुरुषों के समान स्वतंत्रता और अधिकार प्राप्त हैं। इसके साथ ही यौन एजुकेशन को भी सही और वैज्ञानिक तरीके से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। शोध का तर्क है कि बचपन में विकसित होने वाली सोच आगे चलकर व्यक्ति के व्यवहार और सामाजिक रिश्तों को प्रभावित करती है। इसलिए अपराध होने के बाद कार्रवाई के साथ अपराध की मानसिकता तैयार होने की प्रक्रिया को भी रोकना होगा।
कानून हैं, लेकिन अपराधियों को सजा के परिणाम तक की जानकारी नहीं
शोध में कानूनों के प्रति जागरूकता की कमी भी सामने आई। डॉ. बजाज के अनुसार, साक्षात्कार में कई दोषियों को यह जानकारी नहीं थी कि दुष्कर्म के अपराध में कितनी कठोर सजा हो सकती है। कुछ को यह भी समझ नहीं थी कि यौन संबंध बनाने के लिए महिला की सहमति जरूरी है। उनका कहना है कि भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो कानून जैसे प्रावधानों के बावजूद जमीनी स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। कानून केवल किताबों और अदालतों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। गांवों, कस्बों और समाज के हर वर्ग तक यह संदेश पहुंचना चाहिए कि महिला की सहमति के बिना यौन संबंध अपराध है और इसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
सजा के साथ जांच और न्याय व्यवस्था भी हो मजबूत
शोध में केवल दंड बढ़ाने के बजाय कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी जोर दिया गया है। वैज्ञानिक तरीके से जांच, साक्ष्य जुटाने की बेहतर व्यवस्था, समयबद्ध न्याय और गवाहों की सुरक्षा को जरूरी बताया गया है। अपराध की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दोषियों के व्यवहार और आपराधिक पृष्ठभूमि को भी गंभीरता से देखने की जरूरत है।
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जेलों में बंद 300 दोषियों के साक्षात्कार
एनएलआईयू के विधि शोधार्थी और अधिवक्ता डॉ. प्रखर बजाज ने 6 साल इस विषय पर शोध किया। अध्ययन का मुख्य सवाल था कि क्या दुष्कर्म रोकने के लिए कठोर दंड पर्याप्त है? इसके लिए भोपाल, इंदौर और ग्वालियर की जेलों में बंद 300 दोषियों के साक्षात्कार किए गए। साथ ही 60 पुलिस अधिकारियों, 20 जेल अधिकारियों और 53 विधि विशेषज्ञों से भी जानकारी जुटाई गई। इस तरह कुल 433 लोगों से प्राप्त जानकारी के आधार पर अपराधियों की मानसिकता, सामाजिक पृष्ठभूमि और कानून के प्रभाव का विश्लेषण किया गया।
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154 मामलों में पीड़ित नाबालिग, 34 में हत्या तक
शोध के आंकड़े अपराध की भयावहता को सामने रखते हैं। अध्ययन में शामिल 300 दोषियों में से 154 ने नाबालिगों को अपना शिकार बनाया था। 34 मामलों में दुष्कर्म के बाद पीड़िता की हत्या भी की गई। 246 दोषियों की उम्र 18 से 39 वर्ष के बीच थी, जबकि 109 निरक्षर पाए गए। आंकड़े बताते हैं कि अपराध को केवल शिक्षा, उम्र या सामाजिक स्थिति के किसी एक आधार पर समझना आसान नहीं है। इसके पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारक काम करते हैं।
महिलाओं की आजादी से परेशानी, कपड़ों और नौकरी पर भी आपत्ति
डॉ. बजाज के साक्षात्कारों में सामने आया कि कई दोषियों की महिलाओं के प्रति सोच बेहद आपत्तिजनक थी। वे महिलाओं के छोटे कपड़े पहनने, घर से बाहर निकलने और
नौकरी करने जैसी स्वतंत्रताओं को पसंद नहीं करते थे। यहां तक कि अपने परिवार की महिलाओं के काम करने और आजीविका कमाने पर भी उन्हें आपत्ति थी। शोधकर्ता के अनुसार, महिलाओं को बराबरी का अधिकार न देने और उनकी स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करने वाली यह मानसिकता गंभीर चिंता का विषय है। अपराध रोकने के लिए केवल घटना के बाद सजा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उस सोच को बदलना होगा, जिसमें महिला की इच्छा, स्वतंत्रता और सहमति का सम्मान नहीं किया जाता।
221 को अपराध का पछतावा, कुछ ने गलती मानने से भी किया इनकार
अध्ययन में 300 दोषियों में से 221 ने अपने अपराध पर पछतावा जताया। कई दोषियों ने कहा कि उनके एक गलत कदम ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया और अब उनके पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचा। हालांकि, शोध में ऐसे दोषी भी सामने आए जिन्होंने अपने कृत्य को गलत मानने से इनकार कर दिया। डॉ. बजाज के मुताबिक, कुछ मामलों में जमीन के विवाद और आपसी रंजिश जैसे कारणों से पहले से योजना बनाकर अपराध किए गए थे। ऐसे दोषियों में पछतावे का भाव नहीं दिखाई दिया। अध्ययन में 103 दोषियों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड था, जबकि 89 को आदतन अपराधी पाया गया। यह अंतर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहले से आपराधिक रिकॉर्ड होना और आदतन अपराधी होना एक ही श्रेणी नहीं है।
पहली से आठवीं तक बच्चों को पढ़ाया जाए सहमति और समानता का पाठ
शोध में अपराध की रोकथाम के लिए स्कूली शिक्षा में बदलाव की सिफारिश की गई है। डॉ. बजाज का सुझाव है कि पहली से आठवीं कक्षा तक बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार महिलाओं के प्रति सम्मान, लैंगिक समानता और आपसी सहमति की शिक्षा दी जाए। बच्चों को शुरुआत से ही यह समझाना जरूरी है कि किसी भी रिश्ते में सहमति अनिवार्य है और महिलाओं को भी पुरुषों के समान स्वतंत्रता और अधिकार प्राप्त हैं। इसके साथ ही यौन एजुकेशन को भी सही और वैज्ञानिक तरीके से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। शोध का तर्क है कि बचपन में विकसित होने वाली सोच आगे चलकर व्यक्ति के व्यवहार और सामाजिक रिश्तों को प्रभावित करती है। इसलिए अपराध होने के बाद कार्रवाई के साथ अपराध की मानसिकता तैयार होने की प्रक्रिया को भी रोकना होगा।
कानून हैं, लेकिन अपराधियों को सजा के परिणाम तक की जानकारी नहीं
शोध में कानूनों के प्रति जागरूकता की कमी भी सामने आई। डॉ. बजाज के अनुसार, साक्षात्कार में कई दोषियों को यह जानकारी नहीं थी कि दुष्कर्म के अपराध में कितनी कठोर सजा हो सकती है। कुछ को यह भी समझ नहीं थी कि यौन संबंध बनाने के लिए महिला की सहमति जरूरी है। उनका कहना है कि भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो कानून जैसे प्रावधानों के बावजूद जमीनी स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। कानून केवल किताबों और अदालतों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। गांवों, कस्बों और समाज के हर वर्ग तक यह संदेश पहुंचना चाहिए कि महिला की सहमति के बिना यौन संबंध अपराध है और इसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
सजा के साथ जांच और न्याय व्यवस्था भी हो मजबूत
शोध में केवल दंड बढ़ाने के बजाय कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी जोर दिया गया है। वैज्ञानिक तरीके से जांच, साक्ष्य जुटाने की बेहतर व्यवस्था, समयबद्ध न्याय और गवाहों की सुरक्षा को जरूरी बताया गया है। अपराध की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दोषियों के व्यवहार और आपराधिक पृष्ठभूमि को भी गंभीरता से देखने की जरूरत है।
