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भोपाल मास्टर प्लान 2047 पर किसानों का प्रदर्शन : 66 गांवों की जमीन पर संकट का आरोप, नीलबड़ में रोकी पदयात्रा
Thu, 22 Oct 2026 03:29 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Thu, 22 Oct 2026 03:29 PM IST
सार
भोपाल मास्टर प्लान 2047 के प्रारूप के विरोध में 66 गांवों के किसानों ने मुगालिया छाप से पदयात्रा शुरू की, लेकिन पुलिस ने नीलबड़ में रोक दिया। किसानों ने भोजताल संरक्षण जोन-1 और जोन-2 हटाने, कृषि भूमि का भू-उपयोग बरकरार रखने और सभी 66 ग्राम पंचायतों में ग्राम सभाओं की सहमति लेने की मांग की है।
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किसानों की पदयात्रा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजधानी के प्रस्तावित मास्टर प्लान 2047 को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में विरोध तेज हो गया है। शहर के विकास की नई योजना में अपनी जमीन और खेती बचाने की मांग के साथ गुरुवार को 66 गांवों के किसान सड़क पर उतर आए। मुगालिया छाप से नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के संयुक्त संचालक कार्यालय तक पदयात्रा पर निकले किसानों को पुलिस ने नीलबड़ में बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके बाद किसान सड़क पर बैठ गए और नारेबाजी करते हुए विरोध जताया।
किसानों का आरोप है कि मास्टर प्लान के नए प्रारूप में भोपाल ग्रामीण क्षेत्र के 66 गांवों की कृषि भूमि को रिवरफ्रंट, फॉरेस्ट, ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल करने का प्रस्ताव है। इससे खेती पर निर्भर किसानों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। किसानों ने कहा कि वे अपनी आपत्तियां और सुझाव संबंधित विभाग तक पहुंचाने के लिए पदयात्रा कर रहे हैं। उनका कहना है कि कृषि भूमि का उपयोग बदले जाने से परिवारों के सामने रोजगार और भरण-पोषण का संकट खड़ा हो सकता है।
1995 और 2031 के प्लान का दिया हवाला
किसानों ने अनोखी मान सिंह पटेल ने कहा है कि जिन जमीनों पर वे वर्षों से खेती कर रहे हैं, उनका भू-उपयोग पहले कृषि ही रहा है। उनके मुताबिक, वर्ष 1995 के मास्टर प्लान और वर्ष 2031 के प्रस्तावित प्रारूप में भी इन जमीनों को कृषि भूमि के रूप में रखा गया था। अब भोपाल तालाब के संरक्षण के नाम पर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की कृषि भूमि का भू-उपयोग बदलने का प्रस्ताव उनकी चिंता का कारण है। किसानों ने भोजताल संरक्षण जोन-1 और जोन-2 को प्रस्तावित योजना से हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि तालाब का संरक्षण जरूरी है, लेकिन इसके लिए खेती पर निर्भर परिवारों की जमीन और आजीविका पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। किसानों ने मांग की है कि उनकी जमीन का भू-उपयोग कृषि ही रखा जाए।
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66 ग्राम पंचायतों की सहमति लेने की मांग
किसानों ने मास्टर प्लान तैयार करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2031 के मास्टर प्लान को लेकर आपत्तियों के दौरान ग्राम पंचायतों की सहमति से प्रारूप तैयार करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन मौजूदा प्रारूप तैयार करते समय गांवों की ग्राम सभाओं की सहमति नहीं ली गई। किसानों ने मांग की है कि भोपाल ग्रामीण क्षेत्र की सभी 66 ग्राम पंचायतों में ग्राम सभाएं आयोजित कराई जाएं। इसके बाद ग्रामीणों की आपत्तियों, सुझावों और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मास्टर प्लान तैयार किया जाए। उनका तर्क है कि गांवों के विकास से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है।
यह भी पढ़ें-मध्य प्रदेश में मौसम कैसा रहेगा?: अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में भी नहीं थमेगी बारिश, आज इन जिलों में अलर्ट
मिसरोद में 45 मीटर सड़क का भी विरोध
मास्टर प्लान 2047 के प्रारूप को लेकर आपत्तियां केवल कृषि भूमि तक सीमित नहीं हैं। मिसरोद गांव के रहवासियों ने भी पुरानी आबादी के बीच प्रस्तावित 45 मीटर चौड़ी सड़क को लेकर नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में आपत्तियां दर्ज कराई हैं। रहवासियों ने मकानों, मंदिरों, शासकीय संस्थानों और पुराने पीपल-बरगद के पेड़ों के संरक्षण की मांग की है। उन्होंने सड़क के लिए वैकल्पिक मार्ग तलाशने से पहले तकनीकी सर्वे कराने की मांग भी उठाई है। मास्टर प्लान के प्रारूप पर सामने आ रही इन आपत्तियों के बीच अब किसानों और रहवासियों की मांग है कि अंतिम योजना तैयार करने से पहले जमीन के मौजूदा उपयोग, गांवों की बसाहट और स्थानीय जरूरतों पर गंभीरता से विचार किया जाए।
किसानों ने स्पष्ट किया है कि वे अपनी आपत्तियां विभाग के सामने दर्ज कराकर कृषि भूमि का मौजूदा स्वरूप बनाए रखने और ग्राम सभाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग उठा रहे हैं।
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किसानों का आरोप है कि मास्टर प्लान के नए प्रारूप में भोपाल ग्रामीण क्षेत्र के 66 गांवों की कृषि भूमि को रिवरफ्रंट, फॉरेस्ट, ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल करने का प्रस्ताव है। इससे खेती पर निर्भर किसानों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। किसानों ने कहा कि वे अपनी आपत्तियां और सुझाव संबंधित विभाग तक पहुंचाने के लिए पदयात्रा कर रहे हैं। उनका कहना है कि कृषि भूमि का उपयोग बदले जाने से परिवारों के सामने रोजगार और भरण-पोषण का संकट खड़ा हो सकता है।
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1995 और 2031 के प्लान का दिया हवाला
किसानों ने अनोखी मान सिंह पटेल ने कहा है कि जिन जमीनों पर वे वर्षों से खेती कर रहे हैं, उनका भू-उपयोग पहले कृषि ही रहा है। उनके मुताबिक, वर्ष 1995 के मास्टर प्लान और वर्ष 2031 के प्रस्तावित प्रारूप में भी इन जमीनों को कृषि भूमि के रूप में रखा गया था। अब भोपाल तालाब के संरक्षण के नाम पर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की कृषि भूमि का भू-उपयोग बदलने का प्रस्ताव उनकी चिंता का कारण है। किसानों ने भोजताल संरक्षण जोन-1 और जोन-2 को प्रस्तावित योजना से हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि तालाब का संरक्षण जरूरी है, लेकिन इसके लिए खेती पर निर्भर परिवारों की जमीन और आजीविका पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। किसानों ने मांग की है कि उनकी जमीन का भू-उपयोग कृषि ही रखा जाए।
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66 ग्राम पंचायतों की सहमति लेने की मांग
किसानों ने मास्टर प्लान तैयार करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2031 के मास्टर प्लान को लेकर आपत्तियों के दौरान ग्राम पंचायतों की सहमति से प्रारूप तैयार करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन मौजूदा प्रारूप तैयार करते समय गांवों की ग्राम सभाओं की सहमति नहीं ली गई। किसानों ने मांग की है कि भोपाल ग्रामीण क्षेत्र की सभी 66 ग्राम पंचायतों में ग्राम सभाएं आयोजित कराई जाएं। इसके बाद ग्रामीणों की आपत्तियों, सुझावों और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मास्टर प्लान तैयार किया जाए। उनका तर्क है कि गांवों के विकास से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है।
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मिसरोद में 45 मीटर सड़क का भी विरोध
मास्टर प्लान 2047 के प्रारूप को लेकर आपत्तियां केवल कृषि भूमि तक सीमित नहीं हैं। मिसरोद गांव के रहवासियों ने भी पुरानी आबादी के बीच प्रस्तावित 45 मीटर चौड़ी सड़क को लेकर नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में आपत्तियां दर्ज कराई हैं। रहवासियों ने मकानों, मंदिरों, शासकीय संस्थानों और पुराने पीपल-बरगद के पेड़ों के संरक्षण की मांग की है। उन्होंने सड़क के लिए वैकल्पिक मार्ग तलाशने से पहले तकनीकी सर्वे कराने की मांग भी उठाई है। मास्टर प्लान के प्रारूप पर सामने आ रही इन आपत्तियों के बीच अब किसानों और रहवासियों की मांग है कि अंतिम योजना तैयार करने से पहले जमीन के मौजूदा उपयोग, गांवों की बसाहट और स्थानीय जरूरतों पर गंभीरता से विचार किया जाए।
किसानों ने स्पष्ट किया है कि वे अपनी आपत्तियां विभाग के सामने दर्ज कराकर कृषि भूमि का मौजूदा स्वरूप बनाए रखने और ग्राम सभाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग उठा रहे हैं।
