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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   125 injured in bloody game that started with the worship of Chandi Devi in Pandhurna

MP News: पांढुर्णा में शुरू हुआ गोटमार मेला, चंडी की पूजा के साथ शुरू हुए खूनी खेल में 150 जख्मी, चार गंभीर

Sat, 27 Aug 2022 03:13 PM IST
वीरेंद्र शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छिंदवाड़ा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छिंदवाड़ा Published by: वीरेंद्र शर्मा Updated Sat, 27 Aug 2022 03:13 PM IST
सार

पांढुर्णा में शुरू हुए गोटमार मेले में लोग एक-दूसरे पर पत्थरों से हमला कर मनाते है। इसी दौरान पत्थर लगने से 150 लोग घायल हुए है। सुरक्षा को देखते हुए 400 से अधिक पुलिस जवानों को तैनात किया गया हैै।

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125 injured in bloody game that started with the worship of Chandi Devi in Pandhurna
पांढुरना में शुरू हुए गोटमार मेले में लोग एक-दूसरे पर पत्थरों से हमला कर मनाते है। - फोटो : amar ujala

विस्तार

पांढुर्णा में शुरू हुए गोटमार मेले में शनिवार को करीब 150 लोग पत्थर लगने जख्मी हो गए। घायलों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। चार गंभीर बताए गए हैं। एक की हालत को गंभीर देखते हुए डॉक्टर ने उसे नागपुर के लिए रेफर कर दिया है। मेले की सुरक्षा को देखते हुए आयोजन स्थल पर 400 से अधिक पुलिस जवानों को तैनात किया गया हैै। पुलिस इस मेले को रोकने चाहती है, लेकिन लोग मानने को तैयार नहीं हो रहे है। उधर प्रशासन की तरफ से सुरक्षा व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए गए हैं। कलेक्टर ने धारा 144 तो लागू की हैं। इसके अलावा उपद्रवियों पर रखी जा रही है। साथ ही ड्रोन कैमरे से पूरे मेले की निगरानी की जा रही है।
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गोटमार मेले की परंपरा की शुरुआत एक प्रेम कहानी से हुई
प्रेम कहानी गोटमार परंपरा की शुरुआत हुई। बताया जाता है कि पांढुर्णा के लड़के और साबर गांव की युवती के बीच प्रेम हो गया था। उनकी प्रेम कहानी घर तक पहुंची तो बंदिशें लगनी शुरू हो गई। एक दिन दोनों घर छोड़कर भाग गए। जाम नदी पर दोनों को उनके परिजनों ने घेर लिया और पत्थरों से उन पर हमला कर दिया। इस हमले में दोनों की बीच नदी में मौत हो गई थी। इस घटना के बाद से लोग एक-दूसरे को पत्थर मारकर गोटमार मेला मनाते हैं। वर्षों पुरानी चली आ रही परंपरा में घायल तो लोग होते ही है। अभी तक 9 से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है। 
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चंडी मां की पूजा के बाद खत्म होता है मेला
चली आ रही किंवदंतियों के मुताबिक, सावरगांव और पांढुर्णा पक्ष के लोग जाम नदी में पलाश के पेड़ को लगाते है। उसके बाद उसमें झंडी बांधते हैं। नदी में जो पलाश का पेड़ लगाया जाता है, उसे सावरगांव पक्ष के लोग अपनी लड़की मानते हैं। मेला शुरू के बाद दोनों गांव के लोग एक दूसरे को पत्थर मारकर परंपरा निभाते हैं। आखिर में झंडी को तोड़ लिया जाता है और चंडी मां की पूजा गोटमार को खत्म करते हैं। 
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