वो गालियां इतनी अभद्र मानी जाती हैं कि उनका बखान नहीं किया जा सकता लेकिन उनके बारे में आप बखूबी जानते हैं।देश के अलग-अलग इलाकों में उनका मतलब जरूर बदल सकता है पर उनकी भाषा नहीं बदलती।गालियों की भाषा में औरत, उसके शरीर या उसके रिश्ते का ही इस्तेमाल होता है।अक्सर हिंसा में लपेट कर और 'सेक्शुअल' तंज के साथ इन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है।इन गालियों का इस्तेमाल अक्सर इतना किया जाता है कि मर्द और औरत दोनों की ही भाषा का ये हिस्सा बन जाती हैं , पर गाली भी एक तरीके से औरतों को मर्दों के सामने दूसरा दर्जा देती हैं और कई औरतों को यह चीज बहुत परेशान करती है।शायद यही वजह है कि जब औरतों की 'मर्जी' और आजाद ख्याल के बारे में जानने की कोशिश की गई तो औरतों के मन में दबी कई असहजताएं सामने आईं।
आखिर महिलाओं के नाम पर ही क्यों दी जाती है कोई भी 'गाली', यहां हुआ खुलासा
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'औरतों के पास भी दिल और दिमाग होता है'
अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी और रिश्ते निभाती औरतों की कहानियों की सीरीज पर एक पाठक सीमा राय ने फेसबुक पन्ने पर औरतों से जुड़ी गालियों पर टिप्पणी की।साथ ही उन्होंने लिखा कि "औरतें हर मुद्दे पर अपना मत रख सकती हैं, उनके पास भी दिल और दिमाग होता है पर उनसे उम्मीद की जाती है कि वे न बोलें।"सीमा राय का इशारा खास तौर पर उस तरफ था जहां एक औरत खुलकर अपनी 'सेक्शुअल डिजायर' के बारे में बता रही है।अब यह तो आप भी जानते हैं कि ऐसे मुद्दे पर औरत की सोच को तरजीह नहीं दी जाती।अहमियत तो छोड़िए, आम धारणा ये है कि ऐसी इच्छाएं सिर्फ मर्दों में ही होती हैं। जाहिर है बहुत सी महिलाओं को उस औरत की कहानी में अपना अक्स नजर आया।एक और पाठक, वीरासनी बघेल ने लिखा कि "यह जिस भी महिला की कहानी है, वो समाज का एक अलग आईना दिखाती हैं।"
महिलाओं की सच्ची कहानियां
वीरासनी लिखती हैं कि "यह साबित होता है कि कमी हमेशा महिलाओं में नहीं होती, कमी पुरुषों में भी होती है और समाज को अपने गलत नजरिए का चश्मा उतारने की जरूरत है।" हमारी कहानियां सच्ची हैं पर औरतों की पहचान गुप्त रखी गई है क्योंकि डर है कि समाज और जानने वालों की तरफ से न जाने कैसी प्रतिक्रिया आए पर इन गुमनाम कहानियों को पढ़नेवाली औरतें बेबाकी से लिख रही हैं।
पूनम कुमारी गुप्ता बड़ी साफगोई से अपनी बात कहती हैं। उनका कहना है कि "लोग कितना बदलेंगे ये तो पता नहीं, पर शायद औरतों की खुद की कुढ़न ही कम हो जाए।"ये कहानियां दुख और शिकायत की नहीं हैं।सामाजिक दबाव, पारिवारिक दायरों और औरत होने के नाते तय भूमिकाओं को तोड़कर अपने मन को सुनने की हैं इसीलिए इन्हें पढ़कर किसी की कुढ़न कम हो रही है तो किसी को जिंदगी अलग तरीके से जीने का हौसला मिल रहा है।
महिलाओं के दिलो-दिमाग को जानने का मौका
बिना किसी शारीरिक रिश्ते में बंधे, दो औरतों की साथ रहने की हमारी दूसरी कहानी पर एक पाठक मीनाक्षी ठाकुर लिखती हैं, "अपने तरीके से जीने की हिम्मत सब में नहीं होती, जो इन दोनों ने कर दिखाया!"अतिया रहमान ने लिखा कि "जब आपको सच में पता होता है कि आप जो कर रहे हैं उसकी वजह क्या है और आप सचमुच चाहते क्या हैं, तब ऐसी कहानियां बनती है।"हमारे समाज में अक्सर औरतों को अपनी चाहत जानने, पहचानने और उसे अहमियत देने की सीख दी ही नहीं जाती।शायद इसीलिए 12 आम औरतों की कहानियां बताने वाली हमारी इस सिरीज में पाठकों की इतनी दिलचस्पी है।यह मौका है औरतों के ख़ुद को और मर्दों के औरतों की दिल की बात जानने का।