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Questions raised over China's silence on the Nepal deluge; Tibet fires a barrage of questions at Beijing!
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नेपाल जलप्रलय पर चीन की चुप्पी पर उठे सवाल, तिब्बत ने बीजिंग पर दागे कई सवाल!
वीडियो डेस्क अमर उजाला डॉट कॉम
Published by: Bhaskar Tiwari
Updated Sun, 30 Aug 2026 03:39 AM IST
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तिब्बत और नेपाल के कई गांवों में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि प्राकृतिक आपदाएं किसी सीमा, सत्ता या राजनीति का इंतजार नहीं करतीं। इस आपदा के बीच चीन के तिब्बत क्षेत्र में जानकारी दबाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीनी अधिकारियों ने हिमस्खलन और उससे जुड़ी घटनाओं की खबरों को सार्वजनिक होने से रोकने की कोशिश की, लेकिन ग्लेशियर के टूटने की तेज आवाज, धरती के कंपन और घाटियों की ओर तेजी से बढ़ते बाढ़ के पानी ने तबाही की गंभीरता को उजागर कर दिया।
दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप ने यूरोपियन टाइम्स में लिखे एक लेख में इस घटना को लेकर गंभीर दावे किए हैं। उनके अनुसार, लांगटांग लिरुंग पर्वत के ऊपर मौजूद ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूट गया और करीब दो किलोमीटर नीचे घाटी में जा गिरा। इस विशाल हिमस्खलन से इतनी भूकंपीय ऊर्जा पैदा हुई, जिसे उन्होंने 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर बताया। उनके मुताबिक, इस घटना के बाद नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे इलाकों में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हुई और कई गांव इसकी चपेट में आ गए।
खेदरूब थोंडुप का दावा है कि तिब्बत के अंदर इस त्रासदी की जानकारी सार्वजनिक स्तर पर बेहद सीमित रही। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजिंग की सेंसरशिप व्यवस्था के कारण इस घटना को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक बुलेटिन, स्थानीय मीडिया रिपोर्ट या सार्वजनिक स्वीकारोक्ति सामने नहीं आई। उन्होंने इसे महज सूचना की कमी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नीति बताया है।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी शुरुआती रिपोर्टों में आंकड़े और घटनाक्रम बदल सकते हैं, खासकर तब जब प्रभावित क्षेत्र दुर्गम हों और वहां संचार व्यवस्था बाधित हो। फिर भी, नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के बढ़ते खतरे को लेकर चिंता जरूर बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के लिए भी ऐसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन और तेजी से बदल रहे हिमालयी पर्यावरण के प्रभावों को समझने का महत्वपूर्ण विषय बनती जा रही हैं। यह आपदा एक व्यापक संदेश देती है कि प्रकृति की ताकत को सीमाओं और राजनीतिक नियंत्रण से नहीं रोका जा सकता।
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