फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Lifestyle ›   Relationship ›   Real Story of a man who ties a knot with a eunuch

एक किन्नर से शादी करने वाले मर्द की कहानी

Mon, 08 Oct 2018 01:07 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Mon, 08 Oct 2018 01:07 PM IST
विज्ञापन
Real Story of a man who ties a knot with a eunuch
demo pic
मेरे दोस्त और मोहल्ले वाले समझते हैं कि मैं बस पैसे के लिए निशा के साथ हूं। वो पैसा कमाती है और मैं खर्च करता हूं। आम लोगों को भी यही लगता है कि किन्नर पैसे वाले होते हैं। वो शौक से रहते हैं। उनके पास मुफ़्त का पैसा होता है और पारिवारिक जिम्मेदारियां कुछ होती नहीं लेकिन ये लोगों की गलतफहमी है। ये अधूरा सच है। मैं और निशा इस दस बाई दस फुट के कमरे में रहते हैं। रात को जब कमरे में हल्की रोशनी होती है तो दीवारों का ये केसरिया रंग मुझे अच्छा लगता है। हमारे पास एक ढोलक है, एक बिस्तर और कोने में दुर्गा जी की ये मूर्तियां। निशा इनकी पूजा करती है।
विज्ञापन


निशा कहती है कि जब हम अपने रिश्ते के बारे में अपने परिवारवालों को ही नहीं समझा पाये, तो लोगों को इस बारे में समझाने से क्या बदल जायेगा। इसीलिए घर के बारे में वो बाहर के लोगों से कम ही बात करती है। निशा मुझे किसी हीरोइन से कम नहीं लगती। बड़ी-बड़ी आंखें। साफ रंग और माथे पर बड़ी बिंदी लगाने का उसे बहुत शौक है। हम दोनों की कहानी बारह साल पहले दोस्ती से शुरू हुई थी।
विज्ञापन

 

'बुरी संगत'

पहले निशा का नाम प्रवीण था। हम एक ही मोहल्ले में रहते थे। जब मैं प्रवीण से पहली बार मिला, तो वो दसवीं क्लास में था। मैंने छठी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। मां-बाप और बड़े भाई ने काफी समझाया था कि मैं स्कूल जाऊं पर उन दिनों हम खुद को 'हीरो' समझते थे। आज मैं भले ही उसे 'बुरी संगत' कहूं, लेकिन जिन लोगों में मैं उठ-बैठ रहा था, उनका मुझ पर काफी असर था। उनमें से ही कुछ लोगों के साथ मिलकर मैंने शादी वाले घरों में जाकर 'घोड़ी', 'टप्पे', 'बन्ने' और कई दूसरे तरह के लोकगीत गाने का काम शुरू किया था। सोलह साल की उम्र में मैं अपने खर्चे ख़ुद उठाने लायक हो गया था। उधर, प्रवीण बारहवीं क्लास में आ गया था।

'उसे बांधकर पीटा'
हम दोनों नाबालिग थे और लव-रिलेशन में थे। वो लड़की है या लड़का, इस बात से मुझे कभी फर्क महसूस नहीं हुआ।उसका खूबसूरत होना या लड़की जैसा दिखना, मेरे लिए मायने नहीं रखता था बल्कि जब मैं और प्रवीण मिले थे, तब वो लड़कों की तरह ही पैंट-शर्ट पहनता था। किसी लड़की के साथ रिलेशन में होना कैसा होता है, ये भी मुझे इसलिए पता है क्योंकि प्रवीण से पहले मैं एक लड़की के साथ दो साल तक रिलेशन में था। हमारे शारीरिक संबंध भी थे, लेकिन वो मुझसे आठ साल बड़ी थी।

बाद में उसकी शादी हो गई पर मुझे लगता है कि मैं किसी महिला से रिलेशन होने के मुकाबले अब ज़्यादा ख़ुश हूं लेकिन प्रवीण के साथ होने का एहसास मुझे हमेशा ही अच्छा लगा। घर में मैं पति हूं और वो पत्नी। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रवीण की फीलिंग शुरुआत से ही लड़कियों वाली थी।

किन्नरों का ग्रुप

उसे मेकअप करने का बहुत शौक है। 12वीं क्लास में ही उसने अपने कान छिदवा लिये थे और बाल बढ़ाने शुरू कर दिये थे। यहां तक कोई समस्या नहीं थी लेकिन जब प्रवीण के घरवालों को पता लगा कि उनका बेटा 'लड़का' नहीं है और वो मेरे साथ रिलेशन में है तो उन्होंने रस्सी से बांधकर उसकी पिटाई की और ऐसा सिर्फ एक बार नहीं हुआ। उन्होंने प्रवीण को घर से निकाला तो नहीं, लेकिन उसे छत पर बने एक कमरे में रहने को कह दिया और वहां पानी और बिजली तक बंद कर दी।

किन्नरों का ग्रुप
वो पढ़ाई कर सके इसके लिए तब मैंने एक बैटरी का इंतज़ाम किया था। मुझे लगता है कि उस वक़्त जो तकलीफें थीं, उनसे हम साथ लड़े, जिस वजह से हमारा रिश्ता और मजबूत हुआ। मुझे खुशी है कि प्रवीण मुझसे ज़्यादा पढ़ लिख गया। मेरी मां कहती थी कि पढ़ने-लिखने से दुनिया बदल जाती है पर प्रवीण के लिए दुनिया नहीं बदली।

'किन्नरों को नौकरी नहीं देंगे', ऐसा कहकर कई लोगों ने प्रवीण को काम पर रखने से मना कर दिया। इसी वजह से प्रवीण ने किन्नरों के समूह में शामिल होने का फ़ैसला किया था। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था।मैं जानता था कि किन्नरों का ग्रुप जॉइन करने का मतलब होगा, शादियों और लोगों की ख़ुशी के मौकों पर गाना गा-बजाकर पैसे मांगना।

मुझे आज भी याद है वो दिन, जब मैंने पहली बार निशा (प्रवीण) को गली में तालियां पीटते देखा था। मुझे बहुत दुख हुआ था। लोगों ने, उसके घरवालों ने उसे वैसे ही स्वीकार किया होता, उसकी थोड़ी भी मदद की होती तो वो आज कुछ और कर रही होती। उसे मजबूरी में इस पेशे में न आना पड़ता।हालांकि मैं अब साउंड सिस्टम लगाने का ठेका लेने लगा हूं और हम दोनों मिलकर ठीकठाक कमा लेते हैं।  घर चल जाता है।
विज्ञापन

'हिजड़ों की शादी'

निशा के साथ जो हुआ, उसे लेकर शुरुआत में मुझे थोड़ा गुस्सा आता था लेकिन उसके काम को लेकर शर्मिंदगी का अहसास मुझे कभी नहीं हुआ, क्योंकि वो ख़ुश थी। हम ख़ुश थे। किन्नर समूह की मुखिया ने ही प्रवीण का नाम बदलकर निशा रखा था। मैंने इस सबमें उसका साथ दिया पर उसके बड़े भाई और उसके पिता ने कई बार उसकी पिटाई की। निशा के घर का माहौल इतना खराब हो गया कि जब उसकी मां का देहांत हुआ तो परिवारवालों ने उससे मुंडन करवाने को कहा, लेकिन निशा ने साफ़ मना कर दिया। निशा की मां के गुजरने के कुछ दिन बाद हमने शादी कर ली। हमारी शादी को अब लगभग दस साल हो गए हैं।

एक बार हमने सरकारी दफ़्तर में जाकर छोटे बाबू से अपनी शादी रजिस्टर करवाने के बारे में पूछा था। वो बोले, "हिजड़ों की शादी रजिस्टर नहीं होती।"किसी ने बताया कि निशा सेक्स चेंज ऑपरेशन करा ले तो शादी रजिस्टर हो सकती है लेकिन ये सब करने की जरूरत हमें महसूस नहीं हुई। तो हमारी शादी की कोई कागजी या कानूनी मान्यता नहीं है।

उसका लड़कियों की तरह पेश आना
ऐसा रिश्ता बनाने वाले हम अकेले नहीं हैं। निशा के समूह में करीब 25 किन्नर ऐसे हैं जिनसे पुरुषों ने शादी की है। इन 25 में से 10 पुरुष ऐसे हैं जिनकी किसी महिला से भी शादी हुई, उनका परिवार है और बच्चे भी। लेकिन वो सप्ताह में दो दिन अपने किन्नर पार्टनर के साथ रहते हैं। निशा और मेरे रिलेशन में ये पहले से तय था कि बंदा (पति) मैं हूं और निशा मेरी पत्नी है। वो मेरे लिए करवा चौथ का व्रत भी रख लेती है। तैयार होती है तो मुझसे पूछती है कि वो कैसी लग रही है लेकिन हमारे यहां ये नहीं है कि घर में मर्द मैं हूं तो मेरी ही चलेगी।

हर छह महीने में किन्नर समूह के सदस्य एक पार्टी करते हैं। इसमें सभी किन्नर अपने पतियों के साथ आते हैं। निशा और मुझे ये पार्टियां बहुत पसंद हैं।  इन पार्टियों में सभी जमकर डांस करते हैं और बढ़िया खाते-पीते हैं। मुझे ये पार्टियां इसलिए भी पसंद हैं क्योंकि इनमें निशा एक किन्नर की तरह नहीं, बल्कि एक 'महिला की तरह' पेश आती है।

कई बार किन्नर, लड़कों को भी छेड़ देते हैं पर निशा इन पार्टियों में या कहीं घूमते वक़्त ये ख्याल रखती है कि वो मेरे सामने तालियां न पीटे, गालियां न दे और किन्नरों के लहजे में लोगों से तेज आवाज में बात न करे। वो शायद मुझसे शर्माती है। ये मुझे अच्छा लगता है।
 

उलझे रिश्ते

वैसे निशा में लड़कों वाली ताकत भी है।  घर पर जब मजाक में हम दोनों में हाथापाई हो जाती है तो उसे हरा पाना आसान नहीं होता। कई बार तो वो मुझे ही गिरा देती है।पहले मेरे बहुत दोस्त थे लेकिन अब ज़्यादातर पीछे छूट गए हैं क्योंकि वो मुझसे किन्नरों से दोस्ती करवाने के लिए कहते थे। उनका दिमाग सिर्फ सेक्स तक सीमित था। वो न तो किन्नरों को लेकर गंभीर थे और न ही मेरी सोच समझते थे। निशा के समूह की मुखिया मुझे अपने दामाद की तरह इज्जत देती हैं। 

निशा ने शादी से पहले घर छोड़ा था। इस बात को दस साल से ज़्यादा हो गए हैं।  तब से लेकर आज तक उसने कभी अपने घरवालों से बात नहीं की। वो अपने भाई और पिता की शक़्ल भी नहीं देखना चाहती। उसे लगता है कि वह किन्नर है तो उसे पिता की संपत्ति में भी उसका कोई अधिकार नहीं बचा। पिता के बाद निशा के बड़े भाई को दोनों का हिस्सा मिलेगा। मेरे घर में भी ज़्यादातर लोग मुझसे बात करने से बचते हैं।  हमारे ज़्यादातर रिश्तेदारों ने कहा कि वो मुझसे तभी मिलेंगे, जब मैं निशा को छोड़ दूंगा। तो मैंने रिश्तेदारों को ही छोड़ दिया।

लड़कियों के प्रस्ताव
हालांकि, बीते दो सालों में परिवार के लोगों ने ये दबाव बढ़ाया है कि मैं किसी लड़की से शादी कर लूं। उन्हें ये लगता रहता है कि मेरी राय बदलेगी। वो शादी के लिए तीन लड़कियों के प्रस्ताव ला चुके हैं। लेकिन मेरी शर्त थी कि मैं शादी के बाद भी निशा का साथ नहीं छोडूंगा। ये बात मैं उन्हें टहलाने के लिए कह देता हूं। वहीं शादी की बात भी होती है तो निशा का डर बढ़ने लगता है, कि कहीं मैं उसे छोड़कर न चला जाऊं। इसी डर में वो मुझे फेसबुक और व्हॉट्सऐप इस्तेमाल करने से रोकती है। ताकि किसी और लड़की के चक्कर में न पड़ जाऊं। मैं इस बात पर बड़ा हंसता हूं।

दो आखिरी ख़्वाहिशें
मेरी मां अपने अंतिम दिनों में कहा करती थी, "बेटा मत पड़ इन चक्करों में। जवानी के साथ सब चला जायेगा। घर महिला से ही चलता है। तू सबसे छोटा है। मेरे मरने के बाद तुझे कोई नहीं पूछेगा। "अब उसकी बात सही लगने लगी है। हालांकि उस वक़्त मैंने उन्हें कहा था, "मां ये दिल की लगी है, नहीं छूट रही..."मां के जाने के बाद घर में किसी ने मुझसे सीधे मुंह बात नहीं की। वो ये कहकर मुझे डराते जरूर हैं कि जैसे-जैसे बुढ़ापा आयेगा, जीवन मुश्किल होता जायेगा।मैं प्यार करता हूं निशा से। सच्चा प्यार। मैं इसके साथ ही पूरी लाइफ बिता दूंगा। मुझे इससे मतलब नहीं है कि ये लड़का है, लड़की है या किन्नर। मेरा इससे दिल मिलता है। बस यही है।मेरी बस दो ख़्वाहिशें हैं। एक, इस कमरे से थोड़ा बड़ा घर खरीदना है जहां हम तरीके से रह सकें और दूसरा, एक बच्चे को गोद लेकर उसकी शादी करनी है। मैं अपनी शादी में कुछ खर्च नहीं कर पाया। बारात भी नहीं देखी और दावत भी नहीं कर पाया था। हालांकि निशा किसी बच्चे को गोद लेने के ख्याल से डरती है। उसे लगता है कि किसी बच्चे को अपने जीवन में लाना आसान नहीं होगा।



 
विज्ञापन
विज्ञापन

सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें  लाइफ़ स्टाइल से संबंधित समाचार (Lifestyle News in Hindi), लाइफ़स्टाइल जगत (Lifestyle section) की अन्य खबरें जैसे हेल्थ एंड फिटनेस न्यूज़ (Health  and fitness news), लाइव फैशन न्यूज़, (live fashion news) लेटेस्ट फूड न्यूज़ इन हिंदी, (latest food news) रिलेशनशिप न्यूज़ (relationship news in Hindi) और यात्रा (travel news in Hindi)  आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़ (Hindi News)।  

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed