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जुड़वा बच्चों की मां ने डायरी में लिखी आपबीती, पढ़कर यकीनन भावुक हो जाएंगे आप

Fri, 09 Mar 2018 09:35 AM IST
रूपायन डेस्क
रूपायन डेस्क Updated Fri, 09 Mar 2018 09:35 AM IST
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Mother Shares Her Inspiring Account Of Raising Twins
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कुछ साल पहले मेरे जुड़वा बच्चे पैदा हुए थे। मैं खुश थी और परेशान भी, क्योंकि बच्चों के हिसाब से मुझे अपनी दिनचर्या को सेट करना पड़ा। सुबह दस बजे पहले नंबर के बच्चे को दूध पिलाने का सही समय था और उसके बाद दूसरे नंबर के बच्चे को। इसी प्रकार दो बजे पहले नंबर के बच्चे को दूध पिलाने का समय था और उसके बाद दूसरे नंबर के बच्चे का। मेरी मदद करने के लिए एक सहायिका थी, जिसको अपनी नींद पूरी करने के लिए दस घंटे की जरूरत होती थी, इसलिए वह बरामदे में सोती थी। जब कभी गर्मी होती, तब भी वह कहती, 'आपके पंखे की ठंड को मैं सहन नहीं कर सकती।'

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हां, जब बच्चे सो रहे होते, तो वे कम परेशान करते थे। बीच-बीच में दूध पिलाने के लिए उन्हें तकलीफ देकर जगाना पड़ता था। कुदरत के इन तोहफों को पाकर मैं वाकई बहुत खुश थी। देखते-देखते अब वो दो साल के हो चुके हैं। वे खिलौनों से ज्यादा खेलने लगे थे। उनकी शरारतें मुझे गुदगुदाती लगी थी। कभी-कभी परेशान होती, मगर उनकी मासूमियत को देख मैं नरम भी पड़ जाती थी। 

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Mother Shares Her Inspiring Account Of Raising Twins
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मेरे व्यक्तित्व में इस बदलाव के पीछे मेरे जुड़वा बच्चे हैं। मेरी पसंद और नापसंद सब बदल गई हैं। उन्होंने मेरे जिंदगी में खास जगह बना ली है। जैसे, मुझे पास्ता से तंदूरी और मछली से चिकन पसंद आने लगा है। अब मेरा पसंदीदा रंग लाल नीला हो गया है। मेरी पंसदीदा जगह मॉल से पार्क हो गए हैं। दोनों बच्चों की उम्र अब ढाई साल हो गई है। मातृत्व ने अब मेरे व्यक्तित्व पर असर डालना शुरू कर दिया है। जो चीजें मैंने अनुभव से सीखी हैं, उसे बस मां बनकर ही  महसूस किया जा सकता है।  जब मैं उनको खेलते हुए, बातें करते हुए देखती हूं, तो मैं काफी भावुक हो जाती थी। हालांकि, जब वे लड़ते हैं, मैंने ध्यान दिया है कि जानवरों की तरह लड़ते-झगड़ते हैं, एक-दूसरे पर चिल्लाते हैं, मारते हैं, यहां वहां घूमते हैं, एक-दूसरे से चीजें छुड़ाते हैं, हथेलियां मारते हैं। अब दोनों में दोस्ती हो गई है। वे अपनी छोटी-छोटी उंगलियों में चम्मच, ब्लॉक या किताब लेकर मुझे मारने की कोशिश करते हैं। और आखिर में इस प्यारी लड़ाई में मेरी हार होती है। यह एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है। तो क्या मां बनने के बाद मैं पूरी तरह बदल गई हूं? खुद से सवाल करती रहती हूं।

Mother Shares Her Inspiring Account Of Raising Twins
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एक दिन नंबर 2 के बच्चे को बुखार आ गया। मैंने उसको धीमी आवाज में रोते सुना। मैं ऐसे ही उठी और बच्चे को दवाई दी, सुबह गर्म पानी किया और उसे उपचार देना शुरू किया। सुबह के 2 बजे उठकर बच्चों को लोरिया सुनाना मेरे लिए आसान नहीं था। यहां तक कि मैं इसके बारे में सोच भी नहीं सकती थी। और अब मैंने ध्यान दिया है कि कैसे मेरे अंदर के मातृत्व संबंधी जीन्स ने अपने आप काम करना शुरू कर दिया है। मुझे मातृत्व का अच्छा अनुभव महसूस हो रहा है। मैंने इस चीज पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया कि कैसे मैं बच्चों की समस्याओं से बहुत कुछ सीख रही थी। 

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Mother Shares Her Inspiring Account Of Raising Twins
जुड़वा बच्चे - फोटो : Getty Images
बजाय बच्चों की देख-रेख के दौरान आ रही परेशानियों पर रोना रोने के। अब यह मेरे लिए एक खेल था। बच्चे जब किसी चीज को लेकर दुखी होते, तो अपने अंदर साहस लाना होता है, उन्हें समझाना होता है। मेरी मां सही कहती थी कि मैंने अपने एक-एक रोम को बदल दिया है। काश वह यह सब देखने के लिए यहां मौजूद होतीं। अब मेरे दोनों बच्चे लगभग 7 साल के हो चुके हैं। दोनों अब काफी बातूनी हो गए हैं। उनके सवाल कभी चौंकाते हैं, तो कभी गुस्सा भी दिलाते हैं- मां हम कहां से आए हैं? मां भगवान कहां हैं? मां आपके गाल बहुत ही मुलायम हैं। वगैरह, वगैरह। मैंने उनके साथ बातचीत यह कहकर खत्म कर दी कि क्या तुम लोगों ने अपना होमवर्क पूरा किया?

यह मेरे अंदर आए बदलाव का हिस्सा है, जोकि अब एक दर्शनिक की कहानी होने जा रही है। अब मेरे पास हर समस्या का हल है। 
 

जब एक बच्चा अपनी मां के सामने नखरे करता है... जब एक बच्चा जंक फूड मांगता है... जब दोनों जुड़वा बच्चे बहुत ज्यादा गेम खेलते हैं...आदि। मैंने इस समय जो सीखा है, उसे आपके लिए एक और डायरी लिखनी होगी। एक मां के रूप में यह बार-बार स्कूल जाने जैसा है। जैसे नई चुनौतियों से लड़ने के लिए प्रत्येक दिन अपना होमवर्क करो और एक सरल समाधान के साथ आओ, ताकि परेशानियों को सुलझाने के दौरान ये समाधान दूसरी मां की मदद कर सकें। यदि किसी के अंदर सीखने की लालसा है और बार-बार सीख रहा है, तो वह अपने आप में पर्याप्त है। प्रत्येक दिन बदलाव होने से आप अपने बच्चों की तरह रोज सीखते हुए आगे बढ़ती हैं। और इस चीज को मैं भी महसूस कर रही हूं।

आप भी मां हैं, तो अपनी डायरी हमें भेज दें। रूपायन के पाठकों को उसे पढ़कर अच्छा लगेगा।

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