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होली 2018: ठंडाई का मतलब भांग नहीं, कई रोगों से पल में छुटकारा दिलाती है

Tue, 20 Feb 2018 09:44 AM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Tue, 20 Feb 2018 09:44 AM IST
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Holi Recipes 2018: thandai is beneficial for our health
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अक्सर लोग ठंडाई को भांग से जोड़कर देखते हैं। मगर वास्तव में ठंडाई का मतलब शीतल पेय से है। ऐसा पारंपरिक पेय, जो गर्मी से झुलसते शरीर को शीतलता प्रदान करता है, यह प्यास ही नहीं बुझाता मन को भी आह्लादित करता है। 
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रा याद करें वह गाना ‘जय जय शिव शंकर! कांटा लगे ना कंकड़, कि प्याला तेरे नाम का पिया!’ सुनते ही आंखों के आगेे पीतल के लोटे को एक घूंट में गटककर भंग की तरंग में बहकने वाले बनारसी का एक चित्र उभरने लगता है। यह ‘खइके पान बनारस वाला’ छोरा नहीं, उम्रदराज पंडित जी भी हो सकते हैं। कद्दावर पहलवान भी हो सकते हैं। मैथिली के कालजयी लेखक खट्टर काका की कहानियों में ठंडाई की उपस्थिति एक सजीव पात्र जैसी रहती है। बुरा हो 1960 वाले दशक के हिप्पियों का, जिन्होंने इसकी चुस्की लेते ही, इसे ‘आमंड-ग्रास ड्रिंक’ का नाम दे दिया और फिरंगियों के साथ ही हिंदुस्तानियों की निगाह में यह नशीली चीज बन गई। वहीं, रही सही कसर पूरी कर दी चालू फिल्मी गानों ने।
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ठंडाई का नाम जुड़ा है, भोलेनाथ शंकर, बनारस की नगरी और होली के त्योहार के साथ। इस रिश्तेदारी ने भी इस गलतफहमी को बढ़ावा दिया कि बिना बूटी यानी भांग के ठंडाई घोटी-छानी नहीं जा सकती है। यह सच है कि कई शौकीन बिना हल्के सुरूर के प्याले ही रह जाते हैं, पर अधिकांश बादाम की गिरी और औंटा कर गाढ़े गए दूध से सुवासित इस दिव्य शरबत का सेवन सात्विक अवतार में कर ही तृप्त हो जाते हैं।
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वास्तव में, ठंडाई पारंपरिक शीतल पेय है, जो गर्मी से झुलसते शरीर को दाह, ताप-संताप से मुक्ति दिलाता है। प्यास ही नहीं बुझाता मन को भी आह्लादित करता है। दूसरे देसी शरबतों से यह अलग इसलिए है, क्योंकि यह पौष्टिक भी है। वहीं, होली में मौसम बदलने की सार्वजनिक घोषणा करता है ठंडाई।

जिस तरह पंजाब में अमृतसर और पटियाला अपनी लस्सी के लिए मशहूर है। वैसे ही ठंडाई बनारस की पूरबी अंग की कलाकारी है। ध्यान रहे, इसे गाढ़ा करने के लिए न गिलास में पेड़े तोड़ने की जरूरत होती है, न ऊपर से मक्खन मलाई मारने की। हां, इसमें कोई दोराय नहीं कि चैन से ठंडा कर मिट्टी के कुल्हड़ में पीने से सौंधेपन का पुट आनंद बढ़ाता है।

ठंडाई का पारंपरिक नुस्खा बहुत जटिल नहीं है। काली मिर्च, इलायची, गुलाब की पंखुड़ियां, मुनक्के, चार मगज, सौंफ के संगम के बिना ठंडाई की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इन सभी की तासीर ठंडी होती है। यह सब जानकारी हासिल करने के बाद भी सही तकनीक के अभाव में तमाम मेहनत बेकार हो सकती है। ‘मसालों’ का सही अनुपात रहना परमावश्यक है और बादाम वाले मिश्रण सिल बट्टे की दरकार करता है मिक्सी की नहीं। यह भ्रम भी न पालें कि महीन मलमल से छानने की जरूरत भी भांग की हरी पत्तियों के लिए ही होती है। छानने का मकसद यह है कि मुंह में कुछ भी खुरदुरा पदार्थ ठंडाई का मजा खराब करने को न पहुंच पाए, चाहे वह बादाम ही क्यों न हो! 

 आजकल लोग घर पर भी बोतलबंद ठंडाई में दूध मिलाकर इस पेय को तैयार कर लेते हैं। विडंबना यह है कि इस शॉर्टकट में वह आनंद कहां? कृत्रिम स्वाद, सुगंध, संरक्षक इसे नकली बना कर छोड़ देते हैं। इससे बेहतर विकल्प पंसारी के यहां से ठंडाई बनाने का पैकेटबंद मिश्रण, इसके लिए  उपयोग करना ठीक रहेगा। ठंडाई पीने-पिलाने के लिए झंझट से कतराएं नहीं। असली ठंडा मतलब ठंडाई! 
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