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त्वचा रोगों की दवा से डायबिटीज़ का इलाज?

Tue, 24 Sep 2013 12:31 PM IST
Updated Tue, 24 Sep 2013 12:31 PM IST
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skin disease medicine can treat diabetes

अमरीका में हुए एक शोध में पाया गया है कि त्वचा रोगों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली एक दवा का इस्तेमाल टाइप-वन डायबिटीज़ या मधुमेह के इलाज में किया जा सकता है।

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एक छोटे से परीक्षण में पता चला कि 'अलफेसेप्ट' नाम की ये दवा शरीर में इंसुलिन पैदा करती है, जो कि टाइप-वन डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

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शोधकर्ताओं का कहना है कि ये दवा अन्य इलाजों से बेहतर साबित हो सकती है, क्योंकि ये प्रतिरक्षा तंत्र की रक्षा करती है। लेकिन इसके लिए अभी और अधिक शोध करने की ज़रूरत है।
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इस शोध के नतीजे 'द लैंसेट डायबिटीज़ एंड एंडोक्रायनोलॉजी' नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

प्रतिरक्षा तंत्र
बाज़ार में एमिवाइव के नाम से बिकने वाली अलफेसेप्ट का इस्तेमाल अमरीका में साल 2011 से पहले तक त्वचा रोगों के इलाज में किया जाता था। लेकिन साल 2011 में इस दवा को उसके निर्माताओं ने बाज़ार से वापस ले लिया। इस दवा को यूरोपीय बाज़ारों के लिए कभी मंज़ूरी नहीं मिली।

सोरायसिस, टाइप-वन क्लिक करें डायबिटीज़ की तरह की एक बीमारी है, ये तब होती है जह प्रतिरक्षा तंत्र स्वस्थ त्वचा कोशिकाओं पर हमला करता है।

चिकित्सकीय परीक्षण में पता चला कि सोरायसिस की दवा एक ख़ास तरह की टी कोशिकाओं पर हमला करती है, ये क्लिक करें टाइप-वन डायबिटीज़ में इंसुलिन का निर्माण करने वाली कोशिकाओं पर भी हमला करती है।

इस शोध को अमरीका के इंडियानापोलिस के इंडियाना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया। उन्होंने ये देखना तय किया कि क्या इसका प्रभाव उस व्यक्ति पर भी पड़ता है, जिसका हाल ही में टाइप-वन क्लिक करें डायबिटीज़ का इलाज हुआ है।

परीक्षण में 33 मरीजों को लगातार 12 हफ्तों तक अलफेसेप्ट की सुई लगाई गई, 12 हफ़्ते बाद फिर यही प्रक्रिया अपनाई गई।

वहीं 16 अन्य मरीज़ों को इसी तरह से नकली सुई लगाई गई।

प्रयोग में शोधकर्ताओं ने पाया कि किस तरह खाना खाने के दो घंटे बाद पैंक्रियाज़ से इंसुलिन के उत्पादन में किसी तरह का अंतर नज़र नहीं आया। लेकिन दो समूहों में खाने के चार घंटे बाद उन्हें महत्वपूर्ण अंतर दिखा।

इस दौरान पता चला कि जिस समूह ने दवा ली थी, वह इंसुलिन की रक्षा करने में सक्षम है, जबकि प्रायोगिक दवा लेने वालों के क्लिक करें इंसुलिन के स्तर में गिरावट देखी गई।

एक साल बाद उसी समूह के इंसुलिन के प्रयोग में कोई महत्वपूर्ण बढ़ोतरी नहीं दर्ज की गई। लेकिन प्रायोगिक दवा लेने वालों में ऐसा देखा गया।

हाइपोग्लाइसीमिया का लक्षण
पहले समूह के खून में कुछ समय के लिए शुगर का स्तर कम यानी हाइपोग्लाइसीमिया का लक्षण देखा गया। टाइप-वन डायबिटीज़ वालों में हाइपोग्लाइसीमिया एक आम बात है।

अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता और इंडियाना विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रिग्बी कहते हैं कि इस परीक्षण के पहले 12 महीने काफी उत्साहजनक थे।

उन्होंने कहा कि परीक्षण से पता चलता है कि इलाज के 12 महीने बाद भी अलफेसेप्ट पैंक्रियाज कोशिकाओं के कामकाज की रक्षा कर सकता है।

उन्होंने कहा कि परीक्षण के शुरुआती नतीजों का मतलब है कि भविष्य में इस दवा का उपयोग टाइप-वन डायबिटीज़ को स्थिर करता है और उसे बढ़ने से रोकता है। लेकिन इसका इलाज नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि यह परीक्षण आगे भी जारी रहेगा और 18 और 24 महीने बाद फिर माप लिए जाएंगे।

येल विश्वविद्यालय के डॉक्टर केवान हेराल्ड कहते हैं,'' इस छोटी सफलता को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है। लेकिन जब इसे कैंसर और संक्रामक रोगों के साथ मिलाया जाएगा तो इन छोटी उपलब्धियों का और अधिक महत्व होगा।''


टाइप-वन डायबिटीज के लिए काम करने वाले जेडीआरएफ़ के मुख्य कार्यकारी कैरेन एडिंग्टन ने कहा कि शोध के नतीजे आशाजनक है।

उन्होंने कहा,'' अध्ययन के नतीजे भविष्य में होने वाले शोध के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस तरह के छोटे क़दम भविष्य नें टाइप-वन डायबिटीज़ से मुक्त दुनिया की ओर ले जाएंगे। ये एक चुनौतीपूर्ण और जटिल स्थिति है। लेकिन एक दिन टाइप-वन डायबिटीज का इलाज संभव होगा। ये केवल समय, पैसे और अच्छे शोधों की बात है।''

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