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Hindi News ›   Lifestyle ›   Healthy Food ›   Know Why we love to have outside food

अगर आप भी बाजार के खाने को देखकर लार टपकाते हैं तो ये खबर आपके लिए वार्निंग है

Tue, 06 Mar 2018 10:03 AM IST
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 06 Mar 2018 10:03 AM IST
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Know Why we love to have outside food
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अब चूंकि बाज़ार में तैयार खाना मिल ही जाता है, तो हम भी आलस कर जाते हैं। इसमें कोई शक भी नहीं कि बाजारू खाने का जायका एकदम अलग होता है। लेकिन इन्हें जायकेदार बनाने के पीछे लंबी प्रक्रिया और साइंस काम करती है।

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रेडीमेड खाना आग पर कम, माइक्रोवेव में गर्म करने के लिहाज से पकाए जाते हैं। कई व्यंजन तो माइक्रोवेव में ही बनाए भी जाते हैं। माइक्रोवेव के संपर्क में आते ही खाने में कई तरह की रासायनिक प्रतिक्रियाएं होती हैं।

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इनमें से सबसे मशहूर है 'मैलार्ड रिएक्शन'। खाने में होने वाले इस केमिकल रिएक्शन को सबसे पहले 1912 में फ़्रांस के वैज्ञानिक लुईस कैमिले मैलार्ड ने खोजा था।

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जब हमारे खान-पान की चीज़ों में मौजूद अमीनो एसिड को चीनी के साथ मिलाकर गर्म किया जाता है, तो खाने में खास तरह की प्रतिक्रिया होती है जिसकी वजह से खाना गहरे भूरे रंग का हो जाता है। उसका जायका बढ़ जाता है।

मैलार्ड रिएक्शन सबसे ज़्यादा बेकरी में तैयार चीज़ों में होता है। बिस्कुट, तली हुई प्याज़, चिप्स, तले हुए आलू, इस तरह के दीगर खाने इसी केमिकल रिएक्शन की वजह से इतने लज़ीज बनते हैं कि हम चाह कर भी ख़ुद को रोक नहीं पाते।

ब्रिटेन के फूड रिसर्चर स्टीव एलमोर कहते हैं कि खाने में होने वाली ये केमिकल प्रतिक्रया बहुत पेचीदा है। अगर अमीनो एसिड नाइट्रोजन के साथ मिलते हैं, तो ये खाने में उम्दा क़िस्म की ख़ुशबू पैदा करते हैं। अगर खाना बहुत ज़्यादा गीला होगा तो उसमें ये केमिकल रिएक्शन संभव नहीं है।

मिसाल के लिए अगर कच्चे आलू को तंदूर में सेंका जाता है, तो उसकी 80 फीसद नमी ख़त्म हो जाती है और जब ये उबलने को होता है, तो पानी भाप बनकर उड़ने लगता है और उसकी सतह सूखने लगती है। यही वजह कि सेंके हुए आलू की ऊपरी सतह भूरी और थोड़ी कड़ी होती है। जबकि, अंदर से आलू अपने क़ुदरती रंग वाला होता है।

मैलार्ड प्रतिक्रिया के लिए खाने में नमी का स्तर पांच फ़ीसद कम होना ज़रूरी है। तभी खाने की ऊपरी सतह गहरे भूरे रंग वाली बनती है।

माइक्रोवेव में यही काम दूसरी तरह से होता है। जब खाने को आग पर सेंका जाता है, तो उसमें मैलार्ड प्रतिक्रिया तेज़ी से होती है। लेकिन माइक्रोवेव में तेज़ किरणों के ज़रिए खाने को सेंका जाता है। जिसकी वजह से खाने में मैलार्ड प्रतिक्रिया सही तरीक़े से नहीं हो पाती। इसी वजह से माइक्रोवेव की गर्मी में तैयार खाने का स्वाद फीका और बदमजा होता है।

एक रिसर्च में पाया गया कि पारंपरिक तरीक़े से सेंके हुए गोश्त के मुक़ाबले माइक्रोवेव में तैयार किए गोश्त का ज़ायक़ा एक तिहाई ही लज़ीज था।

माईक्रोवेव में चूंकि खाना जल्दी तैयार होता है, लिहाज़ा ज़्यादातर लोग इसी का सहारा लेते हैं। लेकिन खाने को भरपूर ज़ायक़ेदार बनाने के लिए बेक किए गए खाने पर नमक, चीनी और मोनोसोडियम ग्लूटोमेट की परत चढ़ा देते हैं।

चीन में इस तरह के खाने की काफ़ी मांग है। 2015 में ब्रिटेन के द टेलीग्राफ अखबार ने अपनी रिसर्च में पाया था कि ब्रिटेन की सुपरमार्केट में मिलने वाले खानों में चीनी की मात्रा कोका कोला की एक केन के बराबर है। खाने में चीनी की इतनी मात्रा उचित नहीं है।

ताजा और घर जैसा खाना मुहैया कराने की मांग लगातार बढ़ रही है। जबकि पारंपरिक तरीके से स्वादिष्ट खाना तैयार करने में समय लगता है। लिहाज़ा खाना तैयार करने वाले दूसरे विकल्पों पर निर्भर हो रहे हैं।

हालांकि बहुत से तजुर्बेकार बावर्चियों का कहना है कि माईक्रोवेव हरेक तरह का खाना तैयार करने के लिए मुफ़ीद नहीं है। माईक्रोवेव तेज़ आंच के साथ पानी को पूरी तरह से सुखा देता है और खाने को सूखा बना देता है। जबकि खाने को मुलायम रखने के लिए उसमें हल्की सी नमी होना ज़रूरी है।

माईक्रोवेव में खाना बनाना इतना बुरा भी नहीं बशर्ते कि उसे माक़ूल गर्म आंच पर जल्दी पकाया जाए। ज़्यादतर माइक्रोवेव 2.45 गीगाहर्त्ज़ पर किरणें निकालते हैं। इतनी गर्मी चिकनाई, चीनी और पानी के लिए उचित है। इतनी गर्मी में ऐसा खाना आसानी से पकाया जा सकता है जिनमें पानी और चिकनाई की मात्रा ज़्यादा होती है।

माइक्रोवेव में तैयार खाने की एक और दिक़्कत है। वो अधपके होते हैं इसलिए खराब भी जल्दी होते हैं। चूंकि इस अधपके खाने को फ्रिज में ठंडा करके लंबे वक़्त तक रखा जाता है इसीलिए इनका जायका बासी हो जाता है।

ख़ासतौर से अधपके गोश्त की चिकनाई जब ऑक्सीजन के संपर्क में आती है, तो उसमें ख़ास क़िस्म की बू पैदा हो जाती है। इस मुश्किल से पार पाने के लिए ये प्रोजेक्ट तैयार करने वाले खाने में एंटीऑक्सिडेंट मिलाते हैं। मैलार्ड तत्व एक अच्छा एंटी ऑक्सिडेंट है लेकिन हैरत की बात है कि इन खानों में वही नदारद होता है।

रेडीमेड खाना बनाने वालों की कोशिश होती है कि खाने को ख़राब करने वाले केमिकल रिएक्शन होने से पहले ही उसे खा लिया जाए इसीलिए तैयार खानों की उम्र कम रखी जाती है।

कई मर्तबा पैक खानों में सीलन भी होती है। दरअसल जब खाने को बड़े बर्फ़खानों में रखा जाता है, तो बहुत ज़्यादा ठंड से खाने में नमी पैदा हो जाती है लेकिन अब इसका उपाय भी खोज लिया गया है।

नई तकनीक की मदद से इन बर्फ़खानों में खाना कार्ड बोर्ड के डिब्बों में बंद करके रखा जाता है, जिन पर मेटेलिक फिल्म चढ़ी रहती है। इससे खाना ठंडा रहता है। उसमें ना तो बैक्टीरिया पैदा होते हैं ना ही खाने में नमी जाती है।

तैयार खाने की बढ़ती मांग पूरा करने में माइक्रोवेव मददगार हैं। लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि इसकी गर्मी में तैयार खानों का स्वाद उतना अच्छा नहीं होता, जितना पारंपरिक तरीक़े से बने खाने में क्योंकि पारंपरिक तरीके से तैयार खाने को ज़ायकेदार बनाने वाले सभी तत्व उसमें मौजूद रहते हैं लेकिन उसे बनाने में समय लगता है।

बेहतर तो यही है कि घर का पका ताज़ा खाना ही खाया जाए।

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