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अरबी के पत्तों से बनी इस खास डिश के हैं कई नाम, स्वाद है बेहद लाजवाब

Sun, 15 Apr 2018 02:08 PM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Sun, 15 Apr 2018 02:08 PM IST
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Know interesting things about patod

अरबी के पत्तों को बड़े चाव से पूर्वोत्तरी राज्यों तथा नेपाल में भी हरे साग के रूप में खाया जाता है। उत्तराखंड में पतोड़ भाप से नहीं पकाए जाते, बल्कि सुर्ख भूरे तले जाते हैं । कहीं इसे ‘रिकौंच’ कहते हैं, तो कहीं ‘पीठा’ या ‘पतूरी’। गुजरात में यह ‘पात्रा’ कहलाता है, तो महाराष्ट्र में ‘आलू वड़ी’।

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भारतीय खान-पान में अनाज, दलहन और साग-सब्जियों के अलावा तनों, डंठलों फूल-पत्तियों से भी अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं। इन्हीं में एक ‘पतोड़' है, जिसके कई तरीके के पकवान खाने को मिलते हैं। कहीं इसे ‘रिकौंच’ कहते हैं, तो कहीं ‘पीठा’ या ‘पतूरी’। गुजरात में यह ‘पात्रा’ कहलाता है, तो महाराष्ट्र में ‘आलू वड़ी’। मसाला भरी ‘बाकर वड़ी’ भी इसकी बहिन जैसी ही लगती है।
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उत्तराखंड में पतोड़ भाप से नहीं पकाए जाते, बल्कि सुर्ख भूरे तले जाते हैं और खाने के साथ बड़ी अच्छी जुगलबंदी साधते हैं। अरबी के पत्तों को बड़े चाव से पूर्वोत्तरी राज्यों तथा नेपाल में भी हरे साग के रूप में खाया जाता है, पर वहां पतोड़ नहीं बनाए जाते। हम जब कभी पतोड़ खाते हैं, तो हमें यूनानी-भूमध्यसागरीय भोजन की ‘दोलमांतेस’ नामक चीज याद आने लगती है, जिसमें अंगूर की बेल की पत्तियों में लपेटकर चावल मिश्रित मांस या सब्जियां पेश की जाती हैं, पर इनका आकार सूक्ष्म होता है। 

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पतोड़ के लिए अरबी के पत्ते इस्तेमाल किए जाते हैं

असम का ‘अंगुली पीठा’ सरीखा।  पतोड़ के लिए ज्यादातर अरबी के कोमल पत्ते ही इस्तेमाल किए जाते हैं, परंतु कभी-कभार कोई दूसरा खाने लायक कोमल हरा पत्ता भी इस्तेमाल होता है। कला मर्मज्ञ बनारसी संस्कृति के पुरोधा संरक्षक राय ने कुछ वर्ष पहले हमें बताया था कि संस्कृत ग्रंथों में जिस ‘अलीक मत्स्य’ का उल्लेख मिलता है, वह यही ‘रिकौंच' या ‘पतोड़’ ही है। देखते ही लगता है कि इस व्यंजन की मूल प्रेरणा मछली की शक्ल वाले मसालादार शाकाहारी  व्यंजन को प्रस्तुत करने की ही रही होगी।

पूर्वांचल में भीतर भरी जाने वाली पीठी बेसन की नहीं, बल्कि उड़द या मूंग की दाल से तैयार की जाती है। इसमें पारंपरिक पारिवारिक नुस्खों के अनुसार, जीरा, धनिया, मेथी, मिर्ची आदि डाले जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अमचूर या किसी दूसरी खटाई का इस्तेमाल जरूरी है, क्योंकि वह अरबी के पत्तों के लिए कुदरती कसैलेपन की काट है। 
 

भारतीय पतोड़ की ही संतान है

पतोड़ की विशेषता यह भी है कि इसे आप तल कर गरमागर्म परोस सकते हैं या फिर भाप में पका कर सेहत के लिए फायदेमंद नुस्खों का हिस्सा मान इसका आनंद ले सकते हैं। पतोड़, पकौड़ियों की तरह चाय-नाश्ते का साथ बखूबी निभा सकता है और मसालेदार गाढ़ी या पतली तरी में कोफ्ते की भूमिका भी निभा सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि राजस्थान में, जो पितौड़ की सब्जी बनाई जाती है, उसका मात्र नाम ही पतोड़ है। उसमें हरा पत्ता इस्तेमाल ही नहीं होता। उसे बेसन के गाढ़े घोल को जमाने के बाद पकाकर फिर बर्फी के टुकड़ों में काटकर तैयार किया जाता है। इसका शोरबा गट्टे की सब्जी जैसा ही होता है। हमारी राय में बिना हरियाली के दर्शन-प्रदर्शन के किसी व्यंजन को पतोड़ कहला ही नहीं सकते, क्योंकि पत्र शब्द पत्ते का मूल रूप है। 

पश्चिमी खान पान में ‘रूलाड’ नामक व्यंजन दिखने में हूबहू पतोड़ जैसा नजर आता है। गोलाकार नली को सुंदर चक्राकार टुकड़ों में काट कर तश्तरी में पेश किया जाता है। ‘एप्पल स्ट्रूडल’ तथा स्विस रोल ‘लेमन रोल’ में पेस्ट्री या स्पंज केक वही भूमिका अदा करते हैं, जो ‘पतोड़’ में हरा पत्ता। शुद्ध शाकाहारी हठधर्मी जापानी खाने के शौकीनों ने जिस शाकाहारी सूशी का ‘आविष्कार’ किया है, वह भारतीय पतोड़ की ही संतान है। 

 
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