मंद आंच पर घंटों पकने के बाद बनता है 'कोशा मांग्शो', परोसने से पहले मिलाया जाता है घी
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कोलकाता के लगभग सौ साल पुराने ‘गोलबाड़ी’ नामक रेस्तरां की ख्याति उसके जायकेदार ‘कोशा मांग्शो’ पर ही टिकी है। हम यह मान कर चलते हैं कि बंगाली बंधु या तो मच्छी भात खाते हैं या मिष्टी। बाकी साग-सब्जी, दाल या मुर्गी मांस के लिए उनकी जुबान नहीं मचलती। इससे बड़ी गलतफहमी और कुछ नहीं हो सकती। हकीकत यह है कि हमारे ये मित्र हर स्वादिष्ट व्यंजन के तलबगार होते हैं, चाहे वह विलायती नमूने के कटलेट, पेटी, पेस्ट्री हों या फिर चीनी अथवा मुगलिया पराठे, बिरयानी और कलिया वगैरह। खास मौकों पर वह बकरी के गोश्त का लुत्फ लेते हैं, जिनमें पतली तरी वाला ‘पाठार झोल’ और लबाबदार ‘कोशा मांग्शो’ सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि बकरे के मांस का चलन 1857 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के कोलकाता मटिया बुर्ज में पहुंचने के साथ बढ़ा था। लेकिन इसके पहले भी बंगाल में मुगलों के मुसलमान सूबेदार नवाबों का राज था और मुर्शिदाबाद जैसी रियासतों में मांस के अनेक व्यंजन बनाए जाते थे। कोलकाता के लगभग सौ साल पुराने ‘गोलबाड़ी’ नामक रेस्तरां की ख्याति उसके जायकेदार ‘कोशा मांग्शो’ पर ही टिकी है। ऐसा बताया जाता है कि तेज आंच पर कुछ देर तक भूनकर इसे ‘कसा’ जिसे बंगाली उच्चारण ने ‘कोशा’ बना दिया है।
इस भुनाव से मांस का रस बोटियों के भीतर सील हो जाता है। इसके बाद बहुत मंदी आंच पर घंटों यह मांस पकाया जाता है। इसके पहले मांस की बोटियों को दही, हल्दी, मिर्च, जीरा, धनिया पाउडर और नमक के साथ मिलाकर रात भर नरम करने को रखा जाता है। प्याज को बारीक काटकर लहसुन की कलियों और पिसी अदरक को डाला जाता है।कांचापाड़ा में बसे हमारे एक लेखक-प्रकाशक मित्र लहसुन की पूरी गांठ ही पतीली में डालकर यह गोश्त रांधते हैं। उनकी हठ यह भी है कि चूल्हे पर लकड़ियों की आंच में ही यह पकाया जा सकता है! खड़ेे मसालों में तेज पत्ता, दालचीनी, लौंग, काली मिर्च, इलायची और लाल मिर्च भी पाक विधि का हिस्सा है।
‘कोशा मांग्शो’ को मोटे पेंदे की पतीली में धैर्य से भूना जाता है। बहुत सीमित मात्रा में पानी छिड़कर, ताकि वह तले पर न लगे। जब मांस गहरे भूरे रंग का (लगभग काला) होने लगता है, तब उसे अपनी पसंद के अनुसार, गाढ़ेे शोरबे वाला बनाने लायक पानी डालकर उबाला जाता है, तब तक जब तक बोटियां उंगलियों से तोड़ने लायक मुलायम न हो जाएं। ‘कोशा मांग्शो’ सरसों के तेल में पकाया जाता है, पर परोसने के ठीक पहले इसमें घी भी मिलाते हैं। आमतौर पर इसका आनंद मीठे पुलाव के साथ लिया जाता है।
खानपान के इतिहासकारों का मानना है ‘कोशा मांग्शो’ ही वह मटन करी है, जिससे अंग्रेजों का साक्षात्कार बंगाल में हुआ और इसी का एक अन्य अवतार ‘रेलवे मटन करी’ है, जिसमें 19वीं सदी में खटास के लिए टमाटर की जगह इमली का इस्तेमाल किया जाता था। जाहिर है कि रेल का लंबा सफर हो या वीरान इलाके में डाक बंगले का रैनबसेरा चैन से कोशा मांस पकाने की चुनौती विकट थी। ‘करी’ का आविष्कार सामिष साहबों की आवभगत के लिए किया जाना समझ में आता है, पर ‘कोशा मांग्शो’ भले ही इसकी प्रेरणा रहा हो, इनकी तुलना करना तर्कसंगत नहीं।
‘कोशा मांग्शो’ पारंपरिक बंगाली व्यंजन है, जो काली पूजा, बंगाली नववर्ष ‘पोइला बैशाख’ पर अनिवार्यतः पकाया जाता है। भद्रलोक अर्थात् संपन्न बंगाली रविवार के दिन इसका लुत्फ लेते हैं। इसे पकाने में मछली पकाने से अधिक समय लगता है और बंगाली इसे अपने सोनार बांगाल की गर्म आबो हवा में इसे पचाने में गरिष्ठ समझते हैं।