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थाईलैंड में मशहूर है लाल, पीले और हरे रंग वाली ‘थाई करी’, भारत से पहुंची थी बनाने की रेसिपी

Tue, 11 Sep 2018 10:31 AM IST
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 11 Sep 2018 10:31 AM IST
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Know about the history of Thai red yellow and green curry
thai curry

हमने और आपने कितनी ही ‘करी’ का स्वाद लिया होगा, लेकिन थाई करी की बात तो एकदम अलग ही है। दुनिया के लोकप्रिय खानपान में ‘थाई करी’ का नंबर तीसरा है और इसकी वजह है, इसमें इस्तेमाल होने वाले कई तरह के पेस्ट। इतना ही नहीं, आप तीन अलग रंगों में भी इस करी का स्वाद ले सकते हैं। दुनियाभर में आप कहीं चले जाएं, आपको थाईलैंड का खाना परोसने वाले रेस्तरां नजर आ जाएंगे। संसार के सबसे लोकप्रिय खानपान में फ्रांसीसी और चीनी खाने के बाद थाईलैंड का ही नंबर आता है, जो आजकल इतालवी और मैक्सिकन खाने से आगे चल रहा है। कोरियाई व्यंजन या भूमध्य सागरी कुछ समय के लिए भले ही लोकप्रियता हासिल कर ले, लेकिन ‘थाई करी’ सदाबहार है। खानपान के शौकीन इनके नाम याद करने की जरूरत नहीं समझते, बल्कि इनके लिए लाल करी, हरी करी और पीली करी जैसे विशेषण इस्तेमाल करते हैं। अंग्रेजों के लिए ‘करी’ एक ऐसा नाम था, जिसके अंतर्गत दर्जनों कोरमे, सालन और कलिए समा जाते थे। और उनका मानना है कि भारत से थाईलैंड तक ‘करी’ को पहुंचाने वाले हिन्दुस्तानी सौदागर, धर्मप्रचारक और मजदूर, कारीगर आदि ही थे।

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दिलचस्प बात यह है कि खानपान पर भारतीय प्रभाव सिर्फ थाईलैंड में ही नहीं देखने को मिलता, बल्कि मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया तक नजर आता है। लाओस और कंबोडिया में भी भाषा, कला और भवन निर्माण आदि पर भारतीय-हिंदू या बौद्ध छाप साफ झलकती है , परंतु वहां का खाना थाईलैंड की तरह करी वाला नहीं। थाईलैंड की करी अगर लाल रंग वाली हो, तो बहुत तीखी होती है, क्योंकि उसका रंग ही यह संकेत देता है कि उसकी आत्मा पिसी लाल मिर्च में रची-बसी है।

हरी रंगत वाली करी भी इससे कुछ ही कम तीखी होती है। उसका कलेवर, रूप, रंग और स्वाद हरी मिर्च पर आधरित रहता है। पीली करी में हल्दी का जादू रहता है, पर उसकी मौजूदगी बहुत जाहिर नहीं होती। इन तीनों ही प्रकार के तरीदार व्यंजनों में दो तत्व अनिवार्यतः रहते हैं,नारियल का दूध और मछली का पेस्ट। शुद्ध शाकाहारियों को सतर्क रहने की जरूरत है कि शाकाहारी थाई करी में भी मछली का मसालेदार पेस्ट जरूर पड़ता है। आजकल इसकी जगह कुछ लोग खमीर चढ़ी सोयाबीन की चटनी का इस्तेमाल करते हैं। थाईलैंड की करी में ही नहीं, दूसरे व्यंजनों में भी उनकी खास पहचान निर्धारित करने के लिए कुछ खास स्थानीय कािफर लाइम (कागजी नींबू की एक किस्म), गलांगल,सुगंधित अदरक की एक प्रजाति और लेमनग्रास नामक खुशबूदार तिनकों का इस्तेमाल होता है। काफिर लाइम बंगाल के गंधराज की याद दिलाता है तो गलांगल आम्रहल्दी की।

 

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ऐसा नहीं कि थाईलैंड के भोजन में सिर्फ करी की ही महिमा है। उनके शाकाहारी और मांसाहारी सूप भी कम मजेदार नहीं होते। कच्चे पपीते को बड़े जतन से तराशकर साथ देने वाले फलों और सब्जियों को खूबसूरत फूल-पत्तियों की शक्ल देकर जिस तरह सजाया जाता है, वह भी कम आकर्षक नहीं होता। थाईलैंड में समुद्री भोजन बहुत लोकप्रिय है, तरह-तरह के झींगें, केकड़े, सीपियां और कुंतल आदि खाने में इस्तेमाल किए जाते हैं। कई ऐसी सब्जियां हैं, जो भारतवर्ष में साधारण समझी जाती हैं,किंतु थाईलैंड में इन्हें बहुमूल्य माना जाता है। मसलन सीताफल, तोरई, लौकी आदि। जहां हम भारतीय बासमती को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं, थाईलैंड के निवासी अपने जैसमिन राइस को सबसे स्वादिष्ट और अच्छा समझते हैं। हां, मिठाई के मामले में थाईलैंड वालों का हाथ जरा तंग नजर आता है। लीची, खरबूज, अमरूद, के अलावा कुछ स्थानीय जंगली फल डुरियन, रामबुटान, मैंगोस्टीम, लुकाट काफी लोकप्रिय हैं। इनमें से कुछ के दर्शन हमें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में भी होते हैं। समुद्री तटवर्ती और पहाड़ी उत्तरी इलाके के अलावा दक्षिण में पड़ोसी मलेशिया के खाने के साथ संलग्न इलाकों में काफी साम्य दिखलाई देता है। उत्तर-पश्चिम में म्यांमार के साथ जुड़े आदिवासी इलाकों का खाना तो बिल्कुल अलग होता है। बैंकॉक, फुकेट और पटाया तक ही अपने ज्ञान को सीमित ना रखें। थाईखाना घर पर बनाना बेहद आसान, किफायती और सेहत के लिए फायदेमंद है, एक बार अजमाकर तो देखें।
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