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स्थानीय भोजन व्यवस्था को तरजीह देना कितना है जरूरी, आप भी जान लें इसके पीछे का सच
डॉ. विनोद वर्मा, आयुर्वेद विशेषज्ञ
Updated Tue, 26 Jun 2018 11:48 AM IST
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भोजन तैयार करते समय सभी रसों का सम्मिलन होना चाहिए और किसी स्वाद-विशेष की प्रधानता नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, सिरके का प्रयोग करके जो खट्टा सलाद तैयार किया जाए, उसमें थोड़ा गुड़ अथवा एक चम्मच शहद डालने से काम चल जाएगा। प्रायः खाने में तिक्त रस का अभाव रहता है, इसलिए खाने में सब्जी या सलाद के रूप में यह रस रहना चाहिए या फिर मसाले के प्रयोग से भोजन को तीक्ष्ण बना लें।
प्रत्येक भोजन में कई सब्जियां, फल, अन्न, जड़ी-बूटियां, मसाले तथा अन्य खाद्यों को सम्मिलित कीजिए। एक ही वस्तु को बार-बार इसलिए मत खाइए क्योंकि वह स्वास्थ्यकर हैं वहीं, अपनी प्रिय खाद्य वस्तु को इसलिए मत त्याग दीजिए क्योंकि वह आपको अस्वास्थ्यकर बताई गई है।
आयुर्वेदिक कौशल से उन अस्वास्थ्यकर वस्तुओं को भी स्वास्थ्यकर बनाया जा सकता है। प्रकृति ने ऋतु विशेष में जो फल एवं सब्जियां दी हैं, उनका प्रयोग करने का प्रयास करें। यदि आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं तो जहां जाएं, वहां पैदा होने वाली वस्तुएं खाइए और स्थानीय भोजन व्यवस्था अपनाइए।
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प्रत्येक भोजन में कई सब्जियां, फल, अन्न, जड़ी-बूटियां, मसाले तथा अन्य खाद्यों को सम्मिलित कीजिए। एक ही वस्तु को बार-बार इसलिए मत खाइए क्योंकि वह स्वास्थ्यकर हैं वहीं, अपनी प्रिय खाद्य वस्तु को इसलिए मत त्याग दीजिए क्योंकि वह आपको अस्वास्थ्यकर बताई गई है।
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आयुर्वेदिक कौशल से उन अस्वास्थ्यकर वस्तुओं को भी स्वास्थ्यकर बनाया जा सकता है। प्रकृति ने ऋतु विशेष में जो फल एवं सब्जियां दी हैं, उनका प्रयोग करने का प्रयास करें। यदि आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं तो जहां जाएं, वहां पैदा होने वाली वस्तुएं खाइए और स्थानीय भोजन व्यवस्था अपनाइए।
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