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जानिए, बच्चे पहली बार कब भावनाएं समझते हैं
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 29 Jun 2013 05:35 PM IST
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बच्चों की पहली मुस्कान तो आपको हमेशा याद रहती होगी लेकिन वे पहली बार आपकी मुस्कान पहचानकर या दूसरों बच्चों के मनोभाव समझकर कब अपनी प्रतिकिया देते हैं, इसकी जानकारी आपको नहीं होगी। हाल में एक शोध में यह पाया गया है कि बच्चे पांच महीने की आयु में ही एक-दूसरे के मनोभाव समझते हैं और सातवें महीनें में वे बड़ों की भावनाएं समझने लगते हैं।
उटाह की ब्रिघेम यंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि बच्चे एक-दूसरे की आवाज और चेहरे के भावों के आधार पर मूड का अंदाजा लगाते हैं। शोधकर्ता प्रोफेसर रोज़ फ्लोम के अनुसार, 'हमने पाया कि पांचवे महीने से ही बच्चे एक-दूसरे की आवाज और चेहरे के भाव पर उसके मूड का अंदाजा लगाते हैं और इसी आधार पर अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं।'
डेलीमेल पर प्रकाशित इस शोध में यह भी माना गया है कि सातवें महीने तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे बड़ों के मनोभावों को उनके चेहरे के भाव के आधार पर समझने लगते हैं और छठवें महीनें में वे अपने परिवार के सदस्यों का चेहरा अच्छी तरह पहचानने लगते हैं।
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प्रोफेसर फ्लोम बताते हैं कि जन्मजात शिशु अपने भाव और भूख-प्यास बता नहीं पाता और इसीलिए वह अपने चेहरे के भावों से अभिभावकों को संकेत देता है। धीरे- धीरे भावों के माध्यम से उसकी बातचीत का तरीका बदलता है और वह दूसरे के भावों को भी इसी आधार पर समझने का प्रयास करता है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी बच्चों के व्यवहार पर हाल में एक शोध हुआ है जिसमें माना गया है कि बच्चे दो महीने की आयु से ही अपनी मां को संकेत देते हैं कि वे उन्हें गले लगाएं या गोद में लें। इस शोध का विस्तृत विवरण पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
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उटाह की ब्रिघेम यंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि बच्चे एक-दूसरे की आवाज और चेहरे के भावों के आधार पर मूड का अंदाजा लगाते हैं। शोधकर्ता प्रोफेसर रोज़ फ्लोम के अनुसार, 'हमने पाया कि पांचवे महीने से ही बच्चे एक-दूसरे की आवाज और चेहरे के भाव पर उसके मूड का अंदाजा लगाते हैं और इसी आधार पर अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं।'
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डेलीमेल पर प्रकाशित इस शोध में यह भी माना गया है कि सातवें महीने तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे बड़ों के मनोभावों को उनके चेहरे के भाव के आधार पर समझने लगते हैं और छठवें महीनें में वे अपने परिवार के सदस्यों का चेहरा अच्छी तरह पहचानने लगते हैं।
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प्रोफेसर फ्लोम बताते हैं कि जन्मजात शिशु अपने भाव और भूख-प्यास बता नहीं पाता और इसीलिए वह अपने चेहरे के भावों से अभिभावकों को संकेत देता है। धीरे- धीरे भावों के माध्यम से उसकी बातचीत का तरीका बदलता है और वह दूसरे के भावों को भी इसी आधार पर समझने का प्रयास करता है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी बच्चों के व्यवहार पर हाल में एक शोध हुआ है जिसमें माना गया है कि बच्चे दो महीने की आयु से ही अपनी मां को संकेत देते हैं कि वे उन्हें गले लगाएं या गोद में लें। इस शोध का विस्तृत विवरण पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।