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Coronavirus: दोबारा कोरोना संक्रमण होने के क्या कारण हैं, वैक्सीन और हर्ड इम्यूनिटी के बाद भी रहेगा खतरा?

Sat, 29 Aug 2020 05:17 PM IST
Nilesh Kumar निलेश कुमार
Updated Sat, 29 Aug 2020 05:17 PM IST
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What Coronavirus reinfection means for herd immunity covid Vaccine all you need to know First Documented Corona Re infection Reported in Hong Kong
Coronavirus Research - फोटो : iStock/Amar Ujala

हांगकांग में कोरोना वायरस के दोबारा संक्रमण के मामले ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 33 वर्षीय युवक मार्च में पहली बार संक्रमित होने के बाद अगस्त में दोबारा कोरोना पॉजिटिव पाया गया। कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि दोबारा संक्रमण के मामले चीन, नीदरलैंड और बेल्जियम में भी सामने आ चुके हैं। भारत में तेलंगाना और गुजरात में भी ऐसे कुछेक मामले सामने आने की बात कही जा रही है। अहमदाबाद में भर्ती हांगकांग के ही एक मरीज को कोरोना ने दोबारा जद में लिया। हालांकि अभी भी बहुत सारे विशेषज्ञों का यही कहना है कि दोबारा संक्रमण के मामले दुर्लभ हैं। जानकारों के अनुसार, इस वायरस से जो पूरी तरह रिकवर नहीं हो पाते तो ऐसी स्थिति में उसके दोबारा संक्रमण होने की संभावना बनी रहती है। 

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कोरोना वायरस - फोटो : iStock

हांगकांग वाले मामले में साढ़े चार महीने के अंदर शख्स के शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ बनी एंटीबॉडी खत्म हो गई। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि 50 दिन के अंदर ही एंटीबॉडी खत्म हो सकती है। वहीं, मुंबई के जेजे अस्पताल में की गई एक स्टडी में पाया गया कि तीन से पांच हफ्ते पहले कोरोना पॉजिटिव हुए लोगों में से 90 फीसदी लोगों में महज 38.8 फीसदी एंटीबॉडी ही बची थी। अब सवाल यह है कि वैक्सीन से विकसित हुई एंटीबॉडी लोगों के शरीर में कितने दिनों तक रह पाएगी! या फिर टीकाकरण अभियानों से पैदा हुई हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति कबतक कोरोना से बचा पाएगी? 

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कोरोना वायरस (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : iStock

हांगकांग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता दोबारा संक्रमण वाले मामले पर अग्रेतर शोध में लगे हैं। इस केस में न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुरोध पर रिपोर्ट की समीक्षा करने वालीं येल यूनिवर्सिटी के इम्यूनोलॉजिस्ट यानी प्रतिरक्षाविद् अकीको इवासाकी का कहना है कि दूसरी बार हुआ संक्रमण एसिम्प्टोमैटिक था और उस शख्स के इम्यून रेस्पॉन्स यानी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया ने संक्रमण को बहुत गंभीर होने से रोक दिया। यह डॉक्यूमेंटेड यानी दस्तावेज में दर्ज उदाहरण जैसा है।

वैक्सीन के महत्व को रेखांकित करते हुए इवासाकी कहती हैं कि जिनमें लक्षण नहीं होते, वे भी संक्रमण फैला सकते हैं। वैक्सीनेशन के बाद इस संभावना पर तो विराम लगेगा। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक रूप से विकसित हुई इम्यूनिटी बीमारी को रोकती है, लेकिन दोबारा संक्रमण को भी किस हद तक रोकेगी, यह कह पाना थोड़ा मुश्किल है। 

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एंटीबॉडी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

इवासाकी ने कहा कि हर्ड इम्यूनिटी विकसित करने के लिए एक मजबूत, सुरक्षित और कारगर वैक्सीन की जरूरत पड़ेगी, जो बीमारी और दोबारा संक्रमण की संभावना, दोनों को रोके। 

अमेरिका और अन्य जगहों पर भी डॉक्टरों ने दोबारा संक्रमण के कई मामलों की सूचना दी थी, लेकिन उन मामलों की ठोस पुष्टि नहीं हुई। मरीज हफ्तों तक वायरस के पार्टिकल्स के वाहक हो सकते हैं और दोबारा संक्रमित होने अथवा करने की संभावना भी रखते हैं। हांगकांग यूनिवर्सिटी के सूक्ष्मजीव विज्ञानी केल्विन काई-वांग टू के मुताबिक, 33 वर्षीय शख्स का मामला दोबारा संकम्रण का ऐसा पहला केस है, जिसकी पुष्टि जीनोम सिक्वेंसिंग के आधार पर की गई है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

हांगकांग के शोधकर्ताओं ने उस शख्स के दोनों बार संक्रमित होने का कारण कोरोना वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन को बताया। क्लिनिकल इंफेक्शनल डिजीज नामक रिसर्च जर्नल में प्रकाशित होने वाले इस शोध के मुताबिक मार्च-अप्रैल में पाए गए वायरस का स्ट्रेन और शख्स को दोबारा संक्रमित करने वाले वायरस का स्ट्रेन बहुत अलग है। 

एंटीबॉडी की गारंटी कबतक?
विशेषज्ञों के मुताबिक, वायरस या बैक्टीरिया संक्रमण होने पर शरीर में एंटीबॉडीज बनती हैं। अलग-अलग बीमारियों में एंटीबॉडीज बनने का समय अलग-अलग होता है। कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद शरीर में वायरस से लड़ने के लिए विकसित होने वाली एंटीबॉडी ही वायरस को दोबारा लौटने से रोकती है। लेकिन इस एंटीबॉडी की भी वैधता होती है। 

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