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चिंता: 30 साल में 42% तक बढ़े 'लाइलाज' डायबिटीज के मरीज, बच्चे सबसे ज्यादा शिकार; 10 साल तक घट सकती है जिंदगी

Thu, 21 Aug 2025 06:20 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Thu, 21 Aug 2025 06:20 PM IST
सार

  • अध्ययन की रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में साल 1990 से लेकर अब तक टाइप-1 डायबिटीज के मामले करीब 42% बढ़ चुके हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि ये बीमारी अब तेजी से हमारे आसपास फैल रही है।
  • चिंता की बात ये है कि इस प्रकार के डायबिटीज का कोई स्थायी इलाज नहीं है ये लाइलाज है, इसे केवल नियमित इंसुलिन थेरेपी और संतुलित जीवनशैली से कंट्रोल किया जा सकता है।

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Surge in Type 1 Diabetes cases about 42% since 1990 why type 1 diabetes happens and know its risk
टाइप 1 डायबिटीज के मामलों में वृद्धि - फोटो : Amarujala.com

विस्तार

Diabetes Risk Study: डायबिटीज (मधुमेह) वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है जो सभी उम्र के लोगों को अपना शिकार बना रही है। बच्चे हों या बुजुर्ग, वयस्क हों या वृद्ध, सभी इससे प्रभावित देखे जा रहे हैं। आमतौर पर मधुमेह के संबंध में सबसे ज्यादा चर्चा टाइप-2 डायबिटीज की होती है, ये लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी के कारण होती है। पर हालिया अध्ययनों की रिपोर्ट कहती है कि पिछले दो-तीन दशकों में टाइप-2 के साथ टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों की संख्या में भी तेजी से उछाल देखा गया है।  

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टाइप-1 डायबिटीज को जुवेनाइल डायबिटीज भी कहा जाता है क्योंकि यह ज्यादातर बच्चों और किशोरों में देखी जाती है। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल लाखों नए बच्चे टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित हो रहे हैं। इस प्रकार के डायबिटीज में रोगियों को अक्सर पूरे जीवनभर इंसुलिन के इंजेक्शन लेने की जरूरत पड़ सकती है।
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एक हालिया अध्ययन की रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में साल 1990 से लेकर अब तक टाइप-1 डायबिटीज के मामले करीब 42% बढ़ चुके हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि ये बीमारी अब तेजी से हमारे आसपास फैल रही है।
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वैज्ञानिकों ने कहा, इस डायबिटीज का उपचार महंगा है और इसे ठीक भी नहीं किया जा सकता है, लिहाजा इसका असर न सिर्फ रोगियों की क्वालिटी ऑफ लाइफ को प्रभावित करता है बल्कि इसके कारण लोगों का जीवनकाल भी करीब 10 साल तक कम हो सकता है।

Surge in Type 1 Diabetes cases about 42% since 1990 why type 1 diabetes happens and know its risk
टाइप-1 डायबिटीज और इसका खतरा - फोटो : Freepik.com

पहले टाइप-1 डायबिटीज के बारे में जान लीजिए

टाइप-1 डायबिटीज शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की गड़बड़ी से जुड़ी बीमारी है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम पैंक्रियाज (अग्नाशय) में मौजूद इंसुलिन बनाने वाले बीटा-सेल्स पर हमला कर देता है। इंसुलिन ही वह हार्मोन है जो शरीर में शुगर को ऊर्जा में बदलता है। इम्यून सिस्टम की इस प्रतिक्रिया के कारण जब इंसुलिन नहीं बन पाता तो खून में शुगर बढ़ने लगती है और यही डायबिटीज का कारण बनती है। 

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) और कई मेडिकल जर्नल्स के अध्ययन बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में टाइप-1 डायबिटीज का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। यह चिंता की बात इसलिए भी है क्योंकि इस प्रकार के डायबिटीज का कोई स्थायी इलाज नहीं है ये लाइलाज है, इसे केवल नियमित इंसुलिन थेरेपी और संतुलित जीवनशैली से कंट्रोल किया जा सकता है।


अब विषय पर वापस आते हैं।

आंकड़े बताते हैं कि टाइप-1 डायबिटीज सालाना औसतन 2% से 5% की दर से बढ़ रही है। यह वृद्धि यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम सहित विभिन्न क्षेत्रों में देखी जा रही है। हालांकि एशिया और दक्षिण अमेरिका में यह अब भी कम है। इस वृद्धि के कारणों को पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है, लेकिन शोध आनुवंशिक प्रवृत्ति और पर्यावरणीय कारकों के संयोजन की ओर इशारा करते हैं। 

Surge in Type 1 Diabetes cases about 42% since 1990 why type 1 diabetes happens and know its risk
बच्चों में डायबिटीज के मामले - फोटो : Adobe Stock

टाइप-1 डायबिटीज के बढ़ते मामलों के पीछे क्या कारण है?

विशेषज्ञ टाइप-1 डायबिटीज के मामलों में वृद्धि के लिए कुछ कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। आनुवंशिकी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किसे टाइप-1 डायबिटीज होगा। जिन लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है, उनमें कुछ पर्यावरणीय कारक जोखिमों को और भी बढ़ाने वाले हो सकते हैं।  

उदाहरण के लिए, बचपन में होने वाले संक्रमण जैसे मम्प्स, रूबेला और इन्फ्लूएंजा बी, बचपन में मोटापा और एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग, विटामिन-डी की कमी की स्थिति प्रतिरक्षा प्रणाली को अतिसक्रिय कर सकती है जिसके कारण कई बार इम्यून सिस्टम शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी क्षति पहुंचाने लगता है।


(ये फ्री वाला उपाय डायबिटीज हो या कोलेस्ट्रॉल सभी में लाभकारी)

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डायबिटीज के जोखिम कारक और इसका खतरा - फोटो : freepik.com

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

विशेषज्ञों का कहना है कि हम इतिहास में टाइप-1 डायबिटीज के उपचार के सबसे आशाजनक युग में हैं, जिसमें नई दवाएं हैं जो बीमारी के बढ़ने की गति को धीमा करती हैं, उन्नत इंसुलिन प्रणाली है जिससे रोगियों को गंभीर जोखिमों से बचाया जा सकता है। हालांकि जिस तरह से इस रोग के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है वो चिंताजनक है। जिन बच्चों में इसका पता चल रहा है उन्हें नियमित रूप से इसपर विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।

वेंडी नोवाक डायबिटीज इंस्टीट्यूट के बाल रोग विशेषज्ञ कुपर ए. विंटरगेर्स्ट कहते हैं, पहले की तुलना में टाइप-1 डायबिटीज के रोगी बेहतर जीवन गुणवत्ता के साथ लंबा जीवन जी रहे हैं, हालांकि हर साल बढ़ते डायबिटीज के मामले स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव भी बढ़ाते जा रहे हैं। 

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टाइप-1 डायबिटीज में हमेशा लेना पड़ता है इंसुलिन इंजेक्शन - फोटो : Freepik.com

जागरूकता और बचाव के उपाय जरूरी

इंडियाना स्थित पार्कव्यू एंडोक्राइनोलॉजी में मेडिकल एक्सपर्ट एलेक्जेंड्रा डी लेलिस कहती हैं, टाइप-1 रोगियों में इंसुलिन रेजिस्टेंस एक बड़ी भूमिका निभाता है।

डॉक्टर कहते हैं टाइप-1 डायबिटीज के कारण धमनियों में संकुचन (एथेरोस्क्लेरोसिस)  दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा हो सकता है। इसके अलावा आंखों, तंत्रिकाओं और किडनी आदि पर भी इसका प्रभाव पड़ता है इसलिए जरूरी है कि सभी लोग इन जोखिमों को जानें और लक्षणों की समय पर पहचान करें। अगर वैश्विक स्तर पर डायबिटीज को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए तो संभव है कि हम आने वाले वर्षों में टाइप-1 डायबिटीज के बढ़ते ग्राफ को कंट्रोल कर सकें।


(ये भी पढ़िए- शरीर को धीरे-धीरे खोखला बना देती है इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति)




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स्रोत
Global, regional, and national burden of type 1 diabetes in adolescents and young adults


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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