पीरियड्स में परेशानी की छुट्टी करो, स्कूल की नहीं
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देश के विकास के लिए महिलाओं की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। जहां तक भारत में महिलाओं की शिक्षा का सवाल है, तो यहां पर महिलाओं की शिक्षा में भारी असमानता दिखाई देती है। प्राथमिक शिक्षा में जहां देश की लगभग 91% लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी करती हैं तो वहीं माध्यमिक शिक्षा में देश की 70% लड़कियां। ये आंकड़े अपने आप में भयावह हैं, क्योंकि उच्च शिक्षा में देश की स्थिति बदतर है, लेकिन प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में देश की प्रगति काफी संतोषजनक है।
एक ताजा अध्य्यन के अनुसार भारत में लगभग 2 करोड़ लड़कियां पीरियड्स की वजह से स्कूल जाना छोड़ देती हैं। पीरियड्स एक सामान्य व प्राकृतिक क्रिया है लेकिन जागरूकता के अभाव के कारण ये एक समस्या बनती जा रही है। पीरियड्स के समय लापरवाही या जागरूकता का अभाव महिलाओं के लिए जानलेवा भी सिद्ध होता जा रहा है।
लड़कियों को पीरियड्स किशोरावस्था में लगभग 12-13 वर्ष की उम्र में होना शुरू होता है। इस उम्र में अक्सर देखा गया है कि लड़कियां शरीर में होने वाले इस बदलाव को मानसिक रूप से स्वीकार करने में सक्षम नहीं होती हैं। साथ ही जागरूकता का अभाव व सैनिटरी नैपकिन जैसे अतिआवश्यक उत्पादों की अनुपलब्धता भी उनके स्कूल छोड़ने का महत्वपूर्ण कारण है।
सैनिटरी नैपकिन जैसे उत्पाद न होने पर वो अन्य उत्पाद इस्तेमाल करने लगती हैं, जो कि उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए लड़कियों को पीरियड्स के बारे में जागरूक करना बेहद आवश्यक होता है, खासतौर पर पहले पीरियड्स के समय।
पहले पीरियड्स के समय लड़कियों को पहले से ही जागरूक करना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि ये कोई समस्या नहीं है ये एक प्राकृतिक क्रिया है जिससे उनका स्वास्थ्य बेहतर होता है। अपनी बेटियों को अपने आप से घुलने मिलने दें ताकि वो अपने स्वास्थ्य से जुड़ी हर बात आप से बता सकें।
पीरियड्स के समय उन्हें अच्छी गुणवत्ता के सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराएं। साथ ही उन्हें सैनिटरी नैपकिन को इस्तेमाल करना भी सिखाएं। इन सारी बातों से आपकी बेटी के अंदर आत्मविश्वास उत्पन्न होगा, जिससे वो अपनी शिक्षा पर ध्यान दे पाएंगी और पीरियड्स में करेंगी परेशानी की छुट्टी।