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मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करता है शारीरिक और मानसिक नुकसान, रिसर्च में खुलासा

Wed, 09 Jan 2019 09:43 AM IST
कशिश मिश्रा ऊर्जा डेस्क, अमर उजाला
ऊर्जा डेस्क, अमर उजाला Published by: कशिश मिश्रा Updated Wed, 09 Jan 2019 09:43 AM IST
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Negative Effects of Cell Phones on Health
mobile - फोटो : file photo

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा समय बिताने का मतलब है कि आप अब अपने में नहीं जी रहे हैं।ऐसे में आपको डिजिटल डिटॉक्सिफिकेशन की जरूरत हो सकती है।तकनीक हमें अनोखे और रचनात्मक तरीकों से संवाद स्थापित करने के अवसर देती है।लेकिन, तकनीक में हो रहे बदलावों को समझने में चूकना और इसका बेजा इस्तेमाल करना, जानबूझकर मुसीबतें बुलाने जैसा है। 

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अगर आप भी उन लोगों में से हैं, जिन्हें बार-बार यह महसूस होता है कि निजी, पारिवारिक, सामाजिक और पेशेवर जिंदगी में संतुलन नहीं है, तो आपको डिजिटल डिटॉक्सिफिकेशन की जरूरत है। तमाम शोध और अध्ययन यह बात साबित कर चुके हैं कि मोबाइल, लैपटॉप, टीवी या दूसरे डिजिटल उपकरणों के साथ हद से ज्यादा वक्त गुजारना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। 

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बहरहाल, यह जानना ज्यादा जरूरी है कि जब ऐसी डिजिटल लत लग जाए, तो उससे बचा कैसे जाए? डिजिटल लत से छुटकारा पाने को डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है। डिजिटल डिटॉक्स के साथ ही फोमो की मुसीबत जुड़ी है। फोमो (फियर ऑफ मिसिंग आउट) यानी अकेले छूट जाने का भय।
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जब हम डिजिटल डिटॉक्स की बात करते हैं, तो आखिरी हल यही होता है कि स्मार्टफोन, लैपटॉप से दूर रहें, लेकिन इस दूरी से भय सताने लगता है कि जब हम इंटरनेट से दूर होंगे, उस दौरान अन्य लोगों को पता नहीं क्या-क्या नई, रोचक और मजेदार चीजें जानने को मिलेंगी और हम इस आनंद के अनुभव से वंचित रह जाएंगे। लिहाजा, इस भय के बिना डिजिटल डिटॉक्स के लिए पांच कदम उठा सकते हैं। 

अक्सर लोगों को व्यस्त रहने पर बड़ा फख्र होता है, लेकिन यह बेहद बचकानी बात है।

Negative Effects of Cell Phones on Health
mobile - फोटो : file photo

आकर्षण का एलाइनमेंट : परिवार, दोस्त, सेहत और पेशा ये चार ऐसी चीजें हैं, जहां व्यक्ति को सबसे ज्यादा ध्यान या आकर्षण बनाए रखने की जरूरत होती  है। डिजिटल जिंदगी में बहुत ज्यादा उलझ गए हैं, तो इन चारों पर ध्यान केंद्रित करें। खासतौर से मोबाइल पर इन चारों के अलावा और सभी तरह की चीजों से दूर रहें।  

व्यस्तता नहीं, खुशी जरूरी : अक्सर लोगों को व्यस्त रहने पर बड़ा फख्र होता है, लेकिन यह बेहद बचकानी बात है। जरूरत से ज्यादा व्यस्त रहना दिखाता है कि जीवन में संतुलन नहीं है। व्यस्त रहना ज्यादा आसान है, बजाय वह करने के जो हमें असल में खुशी देता है। इसमें भी इंटरनेट और सोशल मीडिया व्यस्तता की आग में घी का काम करते हैं। 

मोबाइल का हाथ में होना हमें भटकाता है

Negative Effects of Cell Phones on Health
mobile - फोटो : file photo
हर बार जरूरी तो नहीं : आमतौर पर मोबाइल का हाथ में होना हमें भटकाता है, समय बर्बाद कराता है। सोशल मीडिया पर या दुनिया में क्या चल रहा है, इसके बजाय इस पर गौर करें कि आपके साथ और आसपास क्या हो रहा है। 

संतुलन का सिद्धांत : आठ घंटे अक्सर काम करते हुए बीतते हैं, तो जिस तरह से आठ घंटे काम जरूरी है, उसी तरह से आठ घंटे नींद और आठ घंटे का वक्त मोबाइल स्क्रीन पर दोस्ती निभाने के बजाय अपने स्वास्थ्य, परिवार और अपने दोस्तों को दें।

कम से कम हफ्ते में एक दिन को नो मोबाइल डे जरूर बनाएं।

Negative Effects of Cell Phones on Health

नोमोजोन : तमाम तरीकों के साथ यह भी एक तरीका है कि घर में कोई ऐसा कोना बनाएं, जहां पूरा परिवार एक साथ बैठे और उस जगह किसी भी तरह का कोई डिजिटल उपकरण न हो। अगर रोज यह करना संभव नहीं, तो कम से कम हफ्ते में एक दिन को नो मोबाइल डे जरूर बनाएं।

नींद से लंबी चैट
औसतन एक आदमी दिन में 200 बार फोन चेक करता है, यानी हर छह मिनट तीस सेकंड में फोन चेक करता है। मोबाइल रखने वाले करीब 70 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिन्हें लगता है कि बिना मोबाइल और कंप्यूटर के उनके लिए एक दिन निकालना भी मुश्किल है।मोबाइल रखने वाले चार लोगों में से एक व्यक्ति ऐसा होता है, जो अपनी नींद की अवधि से ज्यादा समय के लिए मोबाइल या दूसरी डिजिटल स्क्रीन्स के संपर्क में रहता है।

16 से 24 वर्ष आयु के 70 फीसदी लोग कॉल कर बात करने के बजाय टेक्स्ट या चैट करना पसंद करते हैं। एक किशोर उम्र का मोबाइलधारक एक माह में औसतन 3400 मैसेज अपने बिस्तर पर लेटे हुए भेजता है।जरूरत से ज्यादा डिजिटल एक्सपोजर हमें थकाता है और हम थकान मिटाने के लिए भी डिजिटल तरीकों से मनोरंजन करते हैं। यह एक ऐसा विषैला चक्र बन जाता है, जिसकी आखिर में हमें लत लग जाती है।

डॉ. तचीकी डेविस 
वेल बीइंग विशेषज्ञ, (बर्कले इंस्टीट्यूट ऑफ वेल बीइंग, कैलिफोर्निया)

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