विज्ञान का चमत्कार: वैज्ञानिकों ने लैब में बनाई कृत्रिम ग्रासनली, जन्मजात रोग वाले बच्चों के लिए जगी उम्मीद
वैज्ञानिकों ने लैब में ही कृत्रिम ग्रासनली बना ली है, जो निगलने की क्षमता को वापस ला सकती है। यह एक बड़ी सफलता है जो गंभीर जन्मजात दोषों के साथ पैदा हुए बच्चों के इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है।
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विस्तार
दुनियाभर में हर साल लाखों बच्चे जन्मजात रोगों के साथ जन्म लेते हैं। बच्चों में जन्मजात दिल की बीमारियों के मामले सबसे ज्यादा रिपोर्ट किए जाते हैं। इसके अलावा सांस, विकासात्मक समस्या और खान-पान से संबंधित विकारों के साथ भी कई बच्चे जन्म लेते हैं। 'लॉन्ग-गैप एसोफेजियल एट्रेसिया' भी बच्चों में जन्मजात होने वाली ऐसी ही एक समस्या है, जिसमें बच्चे की भोजन की नली के दो सिरों के बीच बहुत अधिक दूरी होती है। यह नली जुड़ी नहीं होती, जिससे शिशु निगल नहीं पाता। ऐसे बच्चों को जीवनभर कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में सर्जरी की जरूरत होती है।
मेडिकल रिपोर्ट्स पर नजर डालें तो पता चलता है कि ये एक दुर्लभ स्थिति है, 3000-4500 में से 1 बच्चे में ये समस्या देखी जाती है। मेडिकल संपन्न हिस्सों में ही इसकी सर्जरी उपलब्ध होती है, जिसमें फोकर तकनीक के जरिए नली के सिरों पर टांके लगाकर उन्हें धीरे-धीरे खींचकर जोड़ा जाता है। अगर नली नहीं जुड़ पाती तो आंत या पेट के हिस्से का उपयोग करके नई नली बनाई जाती है।
इस तरह की समस्याओं के शिकार बच्चों के लिए बड़ी राहत की खबर है। वैज्ञानिकों की टीम ने अब लैब में ही कृत्रिम ग्रासनली बना ली है, जो बच्चों में निगलने की क्षमता को वापस ला सकती है। मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक बड़ी सफलता है जो गंभीर जन्मजात दोषों के साथ पैदा हुए बच्चों के इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है।
लैब में बनी कृत्रिम ग्रासनली से जगी उम्मीद
ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने मेडिकल की दुनिया में चमत्कार करते हुए लैब में कृत्रिम ग्रासनली बना ली है। ये गंभीर जन्मजात दोषों के साथ पैदा हुए बच्चों के इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है।
- ग्रेट ऑर्मंड स्ट्रीट हॉस्पिटल और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने शोधकर्ताओं ने भोजन की नली का एक रिप्लेसमेंट हिस्सा तैयार किया है।
- शुरुआती टेस्टिंग में इसकी मदद से सामान्य रूप से भोजन निगलने की क्षमता में सुधार देखा गया है।
- शोधकर्ताओं ने बताया कि इस कृत्रिम नली को प्राप्तकर्ता की अपनी कोशिकाओं का उपयोग करके विकसित किया गया है, ऐसे में रोगी को किसी भी एंटी-रिजेक्शन दवा की आवश्यकता नहीं पड़ी।
- इस तरह की दवाएं मरीजों को संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती हैं। ऐसे में इस खोज को और क्रांतिकारी माना जा रहा है।
- फिलहाल इस ग्रासनली का उपयोग जानवरों में किया गया है, जिसमें अच्छे परिणाम देखे गए हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इंसानों में भी इसके बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
जन्मजात रोग वाले बच्चों के लिए बड़ी राहत
विशेषज्ञों का कहना है कि ये कृत्रिम ग्रासनली भविष्य में उन शिशुओं की मदद कर सकती है जो लॉन्ग-गैप एसोफेजियल एट्रेसिया से पीड़ित हैं। इसमें भोजन की नली पेट से ठीक से जुड़ी नहीं होती है।
अकेले ब्रिटेन में हर साल लगभग 180 बच्चे इस समस्या के साथ पैदा होते हैं, जिनमें से सबसे गंभीर मामलों में जन्म के तुरंत बाद कई जटिल ऑपरेशन की आवश्यकता होती है। अगर इस समस्या का उपचार न हो पाए तो प्रभावित बच्चों के लिए कुछ भी निगलना कठिन हो जाता है और उन्हें घुटन और निमोनिया जैसी गंभीर जटिलताओं का खतरा रहता है।
- शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि ये नई विकसित ग्रासनली वर्तमान सर्जरी की तुलना में आसान होगी और इससे बच्चों की जन्मजात समस्या को भी आसानी से ठीक किया जा सकेगा।
- वर्तमान में जो उपचार किए जाते रहे हैं वो अत्यधिक आक्रामक होते हैं, जिनमें अक्सर पेट या आंत के कुछ हिस्सों को स्थानांतरित करने के लिए बड़ी सर्जरी करनी होती है।
- इस जटिल प्रक्रिया के चलते बच्चों को जीवन भर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- इससे बच्चों में सांस लेने में कठिनाई, पाचन संबंधी समस्याएं और बाद में कैंसर का खतरा भी अधिक देखा जाता रहा है।
इस मेडिकल चमत्कार के लिए वैज्ञानिकों ने एक सुअर की ग्रासनली का उपयोग किया। सुअर को इसलिए चुना गया क्योंकि उनकी ग्रासनली इंसानों से काफी मिलती-जुलती है।
- फिर उन्होंने जिस जानवर में इसे लगाना था उससे ली गई मांसपेशियों की कोशिकाओं को इसमें जोड़ा गया।
- एक विशेष उपकरण में एक सप्ताह तक विकसित होने के बाद, इस कृत्रिम ग्रासनली को ट्रांसप्लांट किया गया।
- जिन आठ जानवरों में ये सर्जरी की गई वो जीवित रहे, सामान्य रूप से भोजन करने लगे और उनका पाचन भी ठीक रहा।
- छह महीने तक सभी जानवरों की निगरानी की गई। इस दौरान प्रयोगशाला में विकसित ग्रासनली में मांसपेशियां, नसें और रक्त वाहिकाएं भी विकसित हुईं। यह सिकुड़ने और भोजन को पेट तक पहुंचाने में भी बेहतर तरीके से काम करने लगी।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
इस विशेष खोज के प्रमुख शोधकर्ता पाओलो डी कोप्पी ने कहा कि यह आने वाले वर्षों में उपचार के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। 50 से अधिक वर्षों से, सुअर के हार्ट वाल्व का उपयोग हृदय रोग से पीड़ित रोगियों के जीवन को बचाने के लिए किया जाता रहा है। अब हमने इसी को ध्यान में रखते हुए फूड पाइप बनाई है। इस खोज में ये साफ हो गया है कि सुअर के ऊतक मानवों के लिए बड़े कारगर हो सकते हैं।
पीडियाट्रिक सर्जन और अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ. नताली डर्किन कहती हैं, इस शोध की सफलता देखकर हम बेहद खुश हैं, जो एक अत्यंत जटिल और दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्चों के लिए आशा की किरण लेकर आया है, जिसका उनके जीवन की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ सकता है।
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स्रोत:
Lab-grown oesophagus restores pigs’ ability to swallow
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