अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस: बुजुर्गों में बढ़ रही है 'एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम' की समस्या, इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक
- एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम- उम्र बढ़ने के साथ अकेलेपन की समस्या है।
- कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है यह सिंड्रोम
- बुजुर्गों का ध्यान रखना, उनके साथ समय बिताना जरूरी।
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उम्र का वह पड़ाव जब इंसान ज्यादातर जिम्मेदारियों से मुक्त होता है, उसके पास समय होता है कि वह परिवार के साथ समय बिता सके। लेकिन उस समय तक परिवार में बड़े हो चुके बच्चे अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं और यह चक्र इसी तरह चलता रहता है, असल में इस चक्र का चलना बुरा नहीं है। सभी जानते हैं कि नौकरी के साथ ऐसा होता है, लेकिन आजकल ग्लोबल अवसरों में हो रही बढ़त की वजह से अब नौकरी का यह चक्र हजारों किलोमीटर्स की दूरी में बदलने लगा है और यह दूरी आपसी संवादों में भी आ गई है। वे दिन अब नहीं रहे जब अधिकांश परिवारों में पूरा घर साथ बैठकर बात किया करता था, खाना खाता था या टीवी ही देखता था। अब तो साल में एक-आध बार किसी त्योहार या विशेष अवसर पर ऐसा हो पाता है। नौकरी या पढ़ाई के लिए विदेश गए बच्चे ज्यादातर वहीं रह जाते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं उन्हें हर पल याद करते बुजुर्ग माता-पिता।
हालांकि अवसर पाने पर आगे बढ़ने के लिए मेहनत करना और उस मेहनत को साकार होते देखना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इस चक्कर में अगर वे लोग पीछे छूटने लगें जिन्होंने आपको यहां तक पहुंचाने के लिए रात-दिन एक किया, तो रुककर सोचने की जरूरत होती है। एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम ऐसी एक स्थिति है जब अकेले पीछे छूट गए बुजुर्गों में मन और शरीर, दोनों बीमारी के स्तर पर पहुंच जाते हैं। सही समय पर इस मानसिक समस्या का इलाज और इस पर नियंत्रण आवश्यक है।
खाली घरौंदे और सिंड्रोम
दुनिया एक बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुकी है जहां अवसरों की भरमार है, और ये अवसर आपके घर से सैकड़ों-हजारों किलोमीटर्स की दूरी पर भी मिल सकते हैं। तो जब किसी घर के बच्चे नौकरी, पढ़ाई या व्यवसाय के सिलसिले में दूसरे शहर या सात समंदर पार चले जाते हैं तब पीछे रह गए बुजुर्गों में पनपती है 'एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम' यानी खाली पड़े घरौंदे की टीस। अब आजकल चूंकि छोटा परिवार-सुखी परिवार के चलते अधिकांश घरों में एक या दो संतानें ही होती हैं। ऐसे में उनका घर से चले जाना बुजुर्गों को बीमार बना जाता है।
एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम के चलते इंसान के दिमाग पर ऐसा असर भी पड़ सकता है कि पीड़ित खुद को नुकसान पहुंचा सकता है या किसी गंभीर तकलीफ में पड़ सकता है। असंतुलित मानसिक स्थिति के चलते शराब, सिगरेट जैसी बुरी लत का शिकार बनने की आशंका भी बढ़ जाती है और इससे नुकसान और भी गम्भीर हो सकता है।
डिप्रेशन से सुसाइडल टेंडेंसी तक
भारत में पिछले कुछ सालों में अपने शहर से दूसरे शहरों या विदेशों की ओर पलायन कर रहे युवाओं की संख्या में तेजी आई है। इसके चलते बुजुर्गों में एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम के केस भी बढ़े हैं। जिसके कारण उनमें डिप्रेशन, आइडेंटिटी क्राइसिस, अल्कोहलिज्म और एंग्जायटी जैसी समस्याओं का प्रतिशत बढ़ जाता है और यदि समय पर इसका इलाज न हो पाए तो यह गंभीर शारीरिक-मानसिक समस्या बन सकती है। इतना ही नहीं बुजुर्ग सेल्फ हार्म या सुसाइडल टेंडेंसी भी डेवलप कर सकते हैं। उन्हें अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है। विशेषज्ञ इसके लिए सही प्रबंधन और काउंसिलिंग की सलाह देते हैं। इससे स्थिति को संभाला जा सकता है।
शरीर पर भी पड़ता है असर
इस स्थिति से केवल मन और दिमाग ही नहीं शरीर भी तकलीफ में आ सकता है। बच्चों का घर से जाना पैरेंट्स के लिए डिप्रेशन जैसी स्थिति ला देता है। खाली घर में व्यक्ति खुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है। धीरे-धीरे मानसिक अकेलेपन की यह स्थिति साइकोसोमैटिक समस्याओं के रूप में भी सामने आने लगती है। साइकोसोमैटिक इन समस्याओं में घबराहट, कमजोरी, बैचेनी, सीने में दर्द, हाथ पैरों में दर्द, पेट की तकलीफें, अनिद्रा या अकेले में रोना आदि शामिल है। इन समस्याओं के लिए फिजिशियन के साथ साथ मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग की भी जरूरत होती है।
इन बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक
बुजुर्गों में अकेलेपन की समस्या मौजूदा समय में काफी बढ़ गई है। इस तरह की परेशानियों से बचे रहने के लिए इन बातों को जरूर ध्यान में रखें।
- खाली दिमाग शैतान का घर। इसलिए खुद को किसी भी क्रिएटिव एक्टिविटी से जोड़ें। परिचितों, मित्रों, रिश्तेदारों और पास-पड़ोस के लोगों से घुलें- मिलें। यह याद रखें कि अब तक का आपका जीवन भी नौकरी या व्यवसाय में बीता है। अब आपके पास खुद की खुशी से बिताने के लिए समय है। इसका सदुपयोग करें।
- अपने मन में एक बात को स्पष्ट रखें। बच्चे अपनी प्रगति के लिए आगे बढ़े हैं। उनका करियर भी मायने रखता है, इसलिए उन्हें जानें दें लेकिन उनसे हमेशा की शिकायत न पालें। अपने अनुभव और ज्ञान को लोगों से बांटने की कोशिश करें। आजकल ऐसे कई ग्रुप चलन में हैं जिनसे जुड़कर आप अपनी सामर्थ्य के हिसाब से जरूरतमंदों की मदद कर सकते हैं। ऐसे किसी ग्रुप से जुड़ें।
- अपनी सभी दवाइयां समय पर लें। यदि आप काउंसिलिंग करवा रहे हैं तो सेशंस बीच में न छोड़ें। आप स्वस्थ रहेंगे तो आपके बच्चे भी निश्चिन्त होकर तरक्की कर पाएंगे और अपना परिवार सम्भाल पाएंगे। इसलिए अपनी फिटनेस पर भी ध्यान दें ताकि समय-समय पर आप अपने बच्चों से मिलने और घूमने-फिरने भी आसानी से जा सकें।
- अपने मन की बात बच्चों से शेयर जरूर करें। उन्हें यह बताएं कि आप उन्हें कितना मिस कर रहे हैं। यह उन्हें आपके साथ अधिक समय बिताने को प्रेरित करेगा। भले ही वे ऑनलाइन आकर आपसे बात कर पाएं, लेकिन करेंगे। व्हाट्सएप, मेल, आदि के जरिये सम्पर्क में बने रहें।
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