भारत अपनी सांस्कृतिक विविधताओं के कारण समूचे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां जिस तरह से पग-पग पर पानी और चार कोस पर वाणी बदल जाती है , उसी प्रकार एक राज्य से दूसरे राज्य में संस्कृतियां भी बदल जाती हैं और सबसे अच्छी बात यह है कि भारतीय इन बदलावों को सहर्ष स्वीकारते आए हैं। छठ पूजा की सारी धूम बिहार और उत्तरप्रदेश में देखने को मिलती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अन्य प्रदेशों में छठ पूजन नहीं होता। जिस तरह मनुष्य एक जगह से दूसरी जगह गया, वह अपने साथ अपनी संस्कृति भी ले गया। यदि आपने पहले कभी छठ पूजन नहीं किया है और आप इस बार करने जा रही हैं तो परेशान होने की कोई बात नहीं है। अगली स्लाइड्स के माध्यम से जानें छठ पूजन की पूरी विधि।
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नहाय-खाय
छठ पूजा का पहला दिन नहाय-खाय के रुप में मनाया जाता है। सबसे पहले पूरे घर की सफाई की जाती है। इसके बाद छठव्रती स्नान करके साफ-सफाई से भोजन बनाया जाता है। उसे ग्रहण करने के बाद ही व्रत की शुरुआत होती है। व्रत रखने वाले को भोजन में कद्दू- चना दाल और चावल खाना चाहिए। घर के अन्य सदस्यों को व्रत करने वाले के बाद ही भोजन करना चाहिए।
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खरना
कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना कहा जाता है। इस दिन व्रतधारी पूरे दिन उपवास रखने के बाद शाम को भोजन ग्रहण करें। खरने के प्रसाद के रुप में गन्ने के रस में बनी हुई चावल की खीर के साथ चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाएं। यह प्रसाद सभी को बांटें। इसमें नमक या चीनी का उपयोग वर्जित होता है।
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संध्या अर्ध्य
छठ पूजा के तीसरे दिन को संध्या अर्ध्य के रुप में जाना जाता है। इस दिन ठेकुआ का प्रसाद बनाया जाता है। शाम को बांस की टोकरी में अर्ध्य का सूप सजाया जाता है। सूर्यास्त के समय सभी व्रतधारी किसी नदी, तालाब या कुंड के किनारे इकट्ठा होते हैं और सामूहिक रुप से अर्ध्य देते हैं। सूर्य को दूध और जल का अर्ध्य दिया जाता है। छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा होती है।
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उषा अर्ध्य
व्रत के अंतिम व चौथे दिन उषा अर्ध्य दिया जाता है। यह अर्ध्य उगते सूरज को दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया संध्या अर्ध्य के समान ही होती है। यह अर्ध्य भी सामूहिक रुप से ही दिया जाता है। इस दिन कच्चे दूध का शरबत पीकर व्रतधारी अपना व्रत खोल सकते हैं। पूरे दिन स्वच्छता का बहुत ख्याल रखा जाता है।