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कुमार अंबुज की कविताएं एक गहन नागरिकता बोध से भरी हुई हैं

Mon, 18 Apr 2022 03:42 PM IST
सारंग उपाध्याय अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली Published by: सारंग उपाध्याय Updated Mon, 18 Apr 2022 03:42 PM IST
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Kumar Ambuj best poems a symbol of citizenship sense
साहित्य - फोटो : amar ujala
जब समय अफवाह बन रहा हो और सच को झूठ बनाने पर आमादा हो। जब मंशाएं कुटिल व हिंसक हों, विवेक लकवाग्रस्त और विचार ध्वनियों में शोर की तरह भिनभिना रहा हो, जब प्रश्न हकला रहे हों और जवाब गायब हों, जब इस दौर और समय पर सवाल उठाने वाले शीर्षक योजनाबद्ध तरीके से छिपा लिए गए हों, गायब किए जा रहे हों और सारा संबोधन उपशीर्षक से हो रहा हो तब कविताएं ही शीर्षक होंगी, वे प्रश्न बन जाएंगी, सवाल करेंगी और समय को कटघरे में खड़ा कर झूठ को बेनकाब करेंगी।
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वे उन सवालों को उठाएंगी जिनके जवाब शोर में दबा दिए गए हैं, उन जवाबों को तलाश करेंगी जिन्हें इतिहास में दफन करने की साजिशें चल रही हैं।

कविताएं न्याय और सच की तलाश में सुदूर भविष्य में झांकेंगी ताकि अपने वर्तमान को ठीक से संबोधित कर सकें।


बतौर पाठक यदि आप थोड़े संवेदनशील और जागरूक हैं, आप अपनी आसपास की दुनिया से लगातार सवाल पूछते हैं और आपके भीतर कविताओं के प्रति कोमल, प्रेममय और सात्विक भावुकता के साथ ही विवेक और विचार की धार, हल्की सी भी कुंद नहीं पड़ी है तो फिर कुमार अंबुज की कविताएं एक गहन नागरिकता बोध से भरी हुई हैं, गहरी अंतर्दृष्टि समेटे हुए हैं जो राजनीति, व्यवस्था के बीच पिस रही मनुष्यता के साथ खड़ी मिलती हैं। 
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जिस पहलक़दमी के लिए हमें
एक मिनट भी इंतज़ार नहीं करना चाहिए
हम उसके लिए एक साल, पांच साल, बीस साल
ना जानें कितने वर्षों तक प्रतीक्षा करते चले जाते हैं
जैसे प्रतीक्षा करना भी जीवन बिताने का कोई उपाय है

जब ऋतुओं के अंतराल में पतझर आता है
हम आदतन करने लगते हैं अगले मौसम का इंतज़ार
लेकिन देखते हैं यह तो पलटकर वापस आ गया है पतझर
तब नष्ट होते चले जाने के दृश्य
चारों तरफ़ चित्रावली की तरह दिखने लगते हैं

मुड़कर देखने पर दूर तक कोई दिखाई नहीं देता
ना किसी के साथ चलने की आवाज़ें आती हैं
तभी अचानक प्रकट होती हैं कुछ इच्छाएं
कहती हैं हम अंतिम हैं
हमें एक पुराना नीला फूल खिलते हुए देखने दो

देर रात तक बैठने दो गली के लैम्पोस्ट के नीचे
दोस्त के साथ बचपन के शहर में रात का चक्कर लगाओ
यह जानते हुए कि उस पौधे की प्रजाति खत्म हो चुकी है
लैम्पपोस्ट का क़स्बा कब का डूब में आ गया है
और दोस्त को गुज़रे बीत गया है एक ज़माना
इच्छाओं से कहता हूं तुम अंतिम नहीं हो
असंभव हो

आगे चलते हुए वह अकेला बच्चा मिलता है
जो रास्ते में मरी हुई चिड़िया देखकर
इस तरह रोने बैठ जाता है
जैसे जिंदगी में पहली बार अनाथ हुआ हो
प्रतीक्षा-भरी इस अनिश्चित दुनिया में
वह भोर के तारे को उगता हुआ देखता है
फिर उसे अस्त होते हुए
सभ्यता की राह में आगे दिखती हैं वे दीवारें
जिन पर लगाए पोस्टर फाड़ दिए गए हैं

चलते-चलते हम आ गए हैं उस जगह
जहां पोस्टर तक का जीवन ख़तरे में है
और सबको अंदाज़ा हो जाता है कि अब
मनुष्यों का जीवन और ज्यादा खतरे में पड़ चुका है.
(जब एक पोस्टर का जीवन)

कुमार अंबुज की ये कविताएं राजनीति और व्यवस्था के बीच फंसे एक आम निम्न-मध्यवर्गीय मनुष्य जीवन का विलाप हैं, इन कविताओं में इस व्यवस्था में न्याय की आस में चप्पलें घिसती, ठगी हुई मनुष्यता का रुदन है। एक शोक है, निरे, कोरे, अंधड़, विवेकहीन, मतिशून्य भावनाओं के सैलाब में फंसी मनुष्यता का, एक रोष और गुस्सा है उस राजनीति, व्यवस्था की विषमताओं, शोषण और उग्र राष्ट्रवाद के खिलाफ जिसके शोर में सच की आवाज गुम हो रही है, जहां मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जा रहा और जीवन को जीवन।

कुमार अंबुज के भीतर का कवि सजग नागरिक भी है। एक जागरूक और सतर्क लेखक, जिसकी दृष्टि सत्ता के हर कार्य, गतिविधि और हर उस फैसले पर रहती है जिसका सीधा प्रभाव जनता पर पड़ता है, मनुष्यता पर पड़ता है और पूरा समाज उससे प्रभावित होता है। उनकी कविता राजनीति से दूर होकर नहीं अपितु उसके केंद्र में आकर सीधी बात करती है। उनका वैचारिक दृष्टिकोण उस जनपक्षधरता के साथ खड़ा मिलता है जहां हाशिए पर और तकरीबन पीछे धकेल दिया गया समाज मुख्यधारा से अलग अलग-थलग दुनिया में संघर्षरत है। अपने अधिकारों के लिए लड़ता-भिड़ता, घायल होता और न्याय की आस में लगातार मुठभेड़ करता।

कुमार अंबुज की कविताओं से झांकती उनकी काव्य दृष्टि बेहद तार्किक और पैनी है। उनकी कविताएं अपने आसपास घट रहे बारीक और सूक्ष्म बदलावों को ना केवल रेखांकित करती हैं, बल्कि परिणाम पर नजर रखती हैं और उसके पीछे के कारणों को भी सामने लाती हैं।

वे असहाय, शोषित, ठगे और छले हुए आदमी के खिलाफ धोखे से काम कर रहे सिस्टम को एक झटके में नंगा कर देते हैं। खरी, सीधी बात और बिना किसी लाग-लपेट के उनकी कविताएं सीधे वहां हाथ धरती हैं जहां मनुष्यता की संवेदनाएं धड़क रही हैं, जहां मनुष्य का आत्माभिमान सांसें लेता है।

आखिर कहां है इनकी जमीन, कितना है इनका रकबा
क्या ये इस घर में, इस पेड़ के नीचे, इस नदी किनारे
इस तलहटी में जीवन भर रह सकते हैं
या तुम्हारे द्वारा खींच दिए गए घेरे के बाहर
एक कदम भी रख देंगे तो हो जाएंगे निर्वासित
(एक अधूरी कहानी)

कविता के भीतर एक कहानी रचती यह कविता हाशिए पर पड़े, विस्थापित, शोषित, भुला दिए गए और पिछड़ चुके मानव समुदाय का रुदन है। यह कविता बेहद मार्मिक और संवदेनशील कविता है।

कुमार अंबुज कविताओं के माध्यम से सीधा सवाल उठाते हैं। कहीं कोई दुराव-छिपाव नहीं और ना ही किसी काव्यात्मक सौंदर्य और शिल्प में फंसकर वे किसी यथार्थ को औचक तरीके से उजागर कर चमत्कार खड़ा करने की कोशिश में रहते हैं अपितु इसके इतर वे सीधी और दो टूक बात करने में विश्वास करते हैं। सपाट और सीधा सवाल उठाने वाली भाषा। इस तरह देखें तो उनकी कविताएं एक अनूठे खुरदुरे कलात्मक सौंदर्य से भरी हुई हैं।
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यथार्थ इन कविताओं में मानों अपने उबड़-खाबड़ किंतु सत्य के सौंदर्य में भीगा हुआ है। इन कविताओं में रचते-बसते शब्द, कविता कर्म में शब्दों को बरतने की खूबसूरत बानगी है। ये कविताएं शब्दों की ताकत पहचानती हैं। वे शब्दों से सवाल भी उठाती हैं और सवाल पूछना भी जानती हैं। वे इन्हीं शब्दों की कोमलता से एक ओर संवेदना और सहानुभूति का स्पर्श करती हैं तो वहीं उन्हीं शब्दों से चोट भी करती हैं। यही शब्द मिलकर उनकी कविताओं की स्पष्ट आवाज बन जाते हैं, ऐसी आवाज जहां गहरे अर्थबोध, समाज की प्रचलित धारणाओं, मान्यताओं को ढहा देते हैं।

जिस थाली में खाता है उसी को मारता है ठोकर
जिस घर में रहता है उसी में लगाता है सेंध

याद करो
तुमने उसकी थाली में वर्षों तक कितना कम खाना दिया
याद करो तुमने घर में उसे उतनी जगह भी नहीं दी
जितने तिलचट्टे , चूहे, छिपकलियां
या कुत्ते घेर लेते हैं
(नमक हराम)

दरअसल, कुमार अंबुज का काव्य संसार शब्दों, बिम्बों, अर्थों और वाक्य संरचना में निहित निरा, कोरा लिजलिजा भावुक रसायन नहीं है और ना वाहवाही के लिए खड़ी की गई भाषा की आकर्षित करने वाली मरीचिका, जहां बहुत कुछ कह चुकने के बाद ना हासिल कुछ है ना हाथ कुछ आया है।

सबसे ज्यादा ताकतवर होती है निराशा
सबसे अधिक दुस्साहस कर सकती है नाउम्मीदी
यह भी एक आशा है
कि चारों तरफ बढ़ती जा रही है निराशा

दरअसल, वे भाषा में भाषा नहीं रचते अपितु सरल भाषा में गहरे अर्थों का संसार खड़ा करते हैं। उनकी कविताएं गहरी और सघन अनुभूतियों का संसार हैं, जहां भाषा अपनी सीमा में अपने सत्य से सुंदर बन पड़ी है। इन कविताओं की काव्य भाषा इस समय, समाज और व्यवस्था के पार देखती है, वह भेदना जानती है और सच को पहचानना भी। उनकी कविताओं में शब्दों और भाषा की तिजारत नहीं मिलती अपितु वे अपने पाठक से तकरीबन सामान्य, सरल प्रवाह में बातचीत भर करते हैं और फिर बातचीत के बीच एक ऐसे यथार्थ में प्रवेश कराते हैं जहां एक कवि अचूक, कठोर, सीधी, सधी, मारक और तकरीबन कार्रवाई के अंदाज में सीमित शब्दों में कविता गढ़ता मिलता है, ऐसी कविता जो अपने जायके में कड़वी है लेकिन रोगी समाज, बिगड़ैल सत्ता प्रतिष्ठानों को होश में लाने के लिए पर्याप्त है और सड़ रही व्यवस्था का इलाज कर सकती है। 


कविता ‘रोटी, कम्बल और पैरासिटामॉल’ जो साल 2017 में लिखी गई है, लेकिन 2019 के अंत तक आते-आते कोरोना जैसी महामारी में, जब हर आम और खास अकाल मृत्यु की गोद में समा रहा था, दौर कठिन था और व्यवस्था की चाल, चरित्र सभी उजागर हो रहा था, लाखों करोड़ों के बैल आउट पैकेज का तिलिस्म सामने था, दवा, इलाज और अस्पतालों के बीच सांस-सांस के लिए आदमी मोहताज था, भूखे, प्यासे, सैंकड़ो मील चलकर प्रतिस्थापन को मजबूर हुए लोग, चिलचिलाती धूप, बारिश के बीच काफिलों में पैदल बढ़ रहे थे ऐसे में यह कविता मानो हर आदमी की पुकार बन गई. मानो समय को भेदती और मनुष्यता के पक्ष में खड़ी आवाज, ऐसी आवाज जो सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों से हर नागरिक का हक मांग रही हो-

कई बार रखी गई मांगों को फिर रखता हूं
कि दो वक्त की चाय और तीन वक्त की रोटी चाहिए
दो जोड़ी कपड़े और रोशनीवाला हवादार कमरा चाहिए
वित्त मंत्री भला करें रिजर्व बैंक का या ना करें
मगर मुझे चटनी के लिए थोड़ा सा हरा धनिया चाहिए

ठेले-खोमचेवालों से भी छोटी-मोटी चीजों का
करना पड़ता है मोल-भाव जो बिल्कुल सुहाता नहीं
लेकिन टैक्स और महंगाई इतनी है कि करना पड़ता है
आप कम कर दें भले ही सचिवालय का स्टाफ
या बंद ही हो जाए बिना काम का कोई मंत्रालय
मगर मुझे दाल, चावल, कम्बल और कैल्शियम चाहिए

अनगिनत मुश्किलें हो गईं हैं चारों तरफ
देशव्यापी वीरताओं की नृशंसताओं से पटे हैं अखबार
मुझे सिरदर्द हो रहा है, दुख रहा है बदन, चढ़ आया है बुखार
इस हालत में मुझ नागरिक को
किसी का वक्तव्य नहीं चाहिए, पैरासिटामॉल चाहिए.
(‘रोटी, कम्बल और पैरासिटामॉल’)

दरअसल, यह कविताएं देश, काल से पार हर उस वक्त की कविताएं हैं जहां मनुष्यता के साथ अन्याय हो रहा हो। इन कविताओं में शोषण के खिलाफ द्रोह है, सवाल उठाने की सीधी ताकत है। कुमार अंबुज की कविताएं केवल परिस्थिति विशेष में उपजे संकट के प्रति द्रोह करती कविताएं नहीं हैं बल्कि हर दौर में जब-जब मनुष्यता शोषण, अत्याचार और व्यवस्था के पैरों तले कुचली जाएगी वहां यह कविताएं हक मांगती खड़ी मिलेंगी। इन कविताओं की ताकत हर समय में लगातार तीक्ष्ण होती इनकी सार्थकता है।

भविष्य के आसन्न संकट को देखती, अपने समय को भेदती और निरंतर खतरों के प्रति आगाह करती कुमार अंबुज की काव्य दृष्टि व्यवस्था के हर कोने पर है। ऐसी मानो सैटेलाइट के रूप में वे एक सच्ची नजर रखे हुए हैं। ना उनसे कुछ छिपा है और ना किसी मनुष्य विरोधी विचारधारा को वे बख्शेंगे। इस संदर्भ में वे बीते एक दशकों के बदलावों पर पूरी नजर रखे हुए हैं, आज जबकि यह समय और ज्यादा संवेदना शून्य हुआ है, जहां धर्मांधता का बोलबाला है, लोग हत्यारी भीड़ में तबदील हो रहे हैं, जहां मनुष्य को एक जाति, धर्म और समूह की पहचान में समेट दिया गया है और एक व्यक्ति की नागरिकता और अस्तित्व संकट में है, जहां उग्र राष्ट्रवाद की अंधी आंधी ने राष्ट्र को ही दांव पर लगा दिया है, जहां सभ्यतामूलक प्रश्नों के साथ मनुष्य की पहचान उसके अस्तित्व से ज्यादा बड़ी हो गई है, जहां धर्म, जाति, और चंद प्रतीकों में संपूर्ण मनुष्यता परिभाषित हो रही है, वहां कुमार अंबुज की कविताएं सवालों के साथ इस समय में प्रवेश करती हैं और परत-दर-परत इस व्यवस्था, समय और समाज के सच को उघाड़ती चलती हैं।

उनकी कविता शोक सभा जो कि एक लंबी कविता है एक पूरे कालखंड के भीतर दर्ज उथल-पुथल को, विघटन, विस्थापन, विषमताओं, शोषण और अन्याय को दर्ज करती है। अपने कई उपशीर्षकों के बीच इस कविता में बीते केवल एक दशक ही नहीं बल्कि सालों का वह शोक दर्ज है जो दुख, दर्द और वेदना के रूप में उस अंतिम मनुष्य के हृदय में धड़क रहा है जिसकी सांसों को तक सुना नहीं गया- जो बेदखल है और तकरीबन गायब है। 

एक घर था मां-पिता का
उसे याद करना कई लोगों को याद करना है
जैसे पूर्वजन्म के स्वप्न से गुजरना है

अब कहीं ऐसा घर नहीं जो करता हो मेरी प्रतीक्षा
जहां कोई सांकल, खिड़की का पल्ला
मकड़ी का जाला भी तकता हो मेरी राह

इधर सड़कों, गलियों को पार करते हुए
दिख जाती है कभी कोई टूटी दीवार

जिसे देखकर यही आता है याद
किसी का घर नहीं रहा

ऐसे ही यह कविता कुछ लाइनें देखें-

कई जगहों में कई मकानों में रहा
जो घर ना बन सके
लेकिन स्मृति में बने हुए हैं
जिस मकान में रहता हूं अभी
लगता है वह मेरी स्मृति में ही कहीं है

अनेक परिजन जिनके साथ गुजारा जीवन
स्मृति में हैं कुछ इस तरह कि
अभी रहता हूं जिन चार लोगों के संग
तो लगता है उनके साथ नहीं
उनकी स्मृति के साथ रहता हूं

कुमार अंबुज की कविताओं में जीवन के शाश्वत और अंतहीन सुख-दुख के चक्र में एक जीवन दृष्टि भी दिखाई देती है जो जीवन की नश्वर होती धारा को अलग तरह से दर्ज करती है- वे दुखों के बीच जीवन की मद्धिम होती उजास को बेहद कोमलता के साथ स्पर्श करते हैं। कुमार अंबुज के भीतर का कवि छूटे, अधूरे और नियति के चक्र में दर्ज उतार-चढ़ावों में घूम रही मनुष्यता को भी सहेजता है।
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