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जन्मदिन विशेष, विद्रोही : जीवन जो अलिखित कविता सा था

मैं इनका मुरीद

विद्रोही : जीवन जो अलिखित कविता सा था

चन्द्रिका, नई दिल्ली

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जीवन स्थायित्व की तलाश करता है। कवि ने अस्थायित्व को चुना। बेघर रहा, हर रात का दर ही उसका घर रहा। जहाँ शाम हो जाए, जहाँ नींद आ जाए वहीं घर हो जाए। उन्होंने जीवन इसी तरह जिया। रमा शंकर यादव नाम मिटता गया और वह विद्रोही बनता गया, कवि विद्रोही और विद्रोह का कवि। सबने उन्हें इसी नाम से जाना। लोगबाग जेएनयू आते तो उन्हें इसी नाम से खोजते। विद्रोही कुछ वक्त के लिए अगर कहीं चले जाते तो जेएनयू उन्हें इसी नाम से खोजता। यहीं उनका घर था। 

यहाँ के ढाबे और यहाँ की सारी जगहों के रिक्त स्थानों में जरूरी शब्द की तरह जरूरी वक्त पर वे खड़े हो जाते। लड़ाई में लोग कम होते तो उनकी कविताएँ भीड़ की तरह बोलने लगतीं। जेएनयू के पत्थरों को उनके पीठ के निशान की आदत सी हो गई थी जो शायद अब भी बची हों। सर्दियों के एक दिन वह शहर की तरफ गया, छात्रों के साथ किसी लड़ाई का हमवार होने और लौटा तो उसकी लाश लौटी।  आगे पढ़ें

कविता बड़बड़ाते हुए वह चुप हो गये...

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