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Ghaib Chhuti sharaab: Shrikant verma

मुड़ मुड़ के देखता हूं

"श्रीकान्त जी अपने कमरे में बंद हो गए और अंदर से सिटकनी लगा ली"

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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यह वाक़या रवीन्द्र कालिया की किताब ‘ग़ालिब छुटी शराब’ से है जिसमें वह लिखते हैं कि
 
उन दिनों श्रीकान्त वर्मा 'दिनमान' के सम्पादकीय विभाग से सम्बद्ध थे और मैं भी उसी प्रतिष्ठान से लौटा था। एक गोष्ठी में श्रीकान्तजी ने बग़ावती क़िस्म का वक्तव्य दिया। उन्होंने धर्मवीर भारती पर भी कुछ आक्षेप किये। जब तक मैं 'धर्मयुग' में रहा, साहित्य और कला के पृष्ठ मैं ही देखा करता था। रचनाओं के साथ लेखकों के पत्र पढ़ने का अवसर भी अनायास मिल जाता था। श्रीकान्त ने अत्यन्त सधे ढंग से समकालीन परिदृश्य पर अपने विचार रखे थे, मगर मुझे उनके वक्तव्य और उनके भारती के नाम लिखे पत्रों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई दिया।

नशे की झोंक में उनके वक्तव्य के बाद मैंने कह दिया कि श्रीकान्त जी की कथनी और करनी में बड़ा अन्तर है। लेखक से एक विषयगत ईमानदारी की अपेक्षा तो करनी ही चाहिए। श्रीकान्त जी ने गोष्ठी में जो विचार व्यक्त किये हैं, वह उनके उन विचारों से भिन्न हैं जो वह भारती जी को लिखते रहे हैं। गोष्ठी में सन्नाटा खिंच गया। भद्र समाज में जैसे मुझ जैसा कोई मूढ़ और गंवार अनधिकृत रूप से प्रवेश पा गया हो। श्रीकान्त का बहुत दबदबा था।

श्रीकान्त जी ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, नेमि जी उनके बचाव के लिए सामने आये और उन्होंने मेरी स्थापना पर गम्भीर असहमति दर्ज कराते हए इसे अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण कहा। श्रीकान्त ऐसे श्रीहीन हो गये जैसे किसी ने छुई-मुई का पौधा छू दिया हो। अचानक वह उठे और बहिर्गमन कर गये, उससे अभिजात वर्ग के लेखकों के बीच मेरी स्थिति और भी दयनीय हो गयी।

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