फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jharkhand ›   jharkhand khunti jariagarh durga puja 300 year old tradition dussehra fair 800 villages

झारखंड: 300 साल से अटूट आस्था! कभी 800 गांवों के लोग जुटते थे मां दुर्गा के दर्शन को, आज भी कायम है परंपरा

Sun, 11 Oct 2026 09:45 AM IST
राँची ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: राँची ब्यूरो Updated Sun, 11 Oct 2026 09:45 AM IST
सार

झारखंड के खूंटी जिले के कर्रा प्रखंड स्थित जरियागढ़ स्टेट में करीब 300 वर्षों से दुर्गापूजा की परंपरा चली आ रही है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इसकी शुरुआत ठाकुर नरेंद्र नाथ शाहदेव ने की थी।

विज्ञापन
jharkhand khunti jariagarh durga puja 300 year old tradition dussehra fair 800 villages
पूजा करते हुए ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

समय बदला, पीढ़ियां बदलीं और त्योहार मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया, लेकिन खूंटी जिले के जरियागढ़ में मां दुर्गा के प्रति लोगों की आस्था आज भी अटूट है। कर्रा प्रखंड स्थित जरियागढ़ स्टेट में करीब 300 वर्षों से चली आ रही दुर्गापूजा की परंपरा आज भी क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है। एक समय यहां लगने वाला दशहरा मेला इतना प्रसिद्ध था कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छोटानागपुर के दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु मां के दर्शन करने और मेले में शामिल होने पहुंचते थे। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, दशहरा के अवसर पर सोनपुर परगना के करीब 800 गांवों के लोग यहां जुटते थे। इससे इस आयोजन की व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

विज्ञापन

ठाकुर नरेंद्र नाथ शाहदेव ने शुरू की थी दुर्गापूजा की परंपरा

स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, जरियागढ़ में दुर्गापूजा की शुरुआत ठाकुर नरेंद्र नाथ शाहदेव ने की थी। वे छोटानागपुर के महाराजा के भाई कुंवर हरिनाथ शाहदेव के वंशज थे। लाल मृगेन्द्र नाथ शाहदेव के अनुसार, ठाकुर नरेंद्र नाथ शाहदेव का विवाह पश्चिम बंगाल के पंचकोट-काशीपुर महाराजा की पुत्री से हुआ था। माना जाता है कि इस वैवाहिक संबंध और उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं से प्रेरित होकर जरियागढ़ में मां दुर्गा की आराधना शुरू हुई।

विज्ञापन


उस दौर में जरियागढ़ स्टेट को सोनपुर परगना के नाम से जाना जाता था। दशहरा के अवसर पर आसपास के गांवों के लोगों के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु और व्यापारी भी यहां पहुंचते थे। इस तरह दशहरा मेला धार्मिक आस्था, सामाजिक मेल-मिलाप और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया था। मेले की प्रसिद्धि ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक फैली हुई थी।

विज्ञापन
विज्ञापन

समय के साथ बदला मेले का स्वरूप, लेकिन पूजा की परंपरा रही कायम

समय के साथ दशहरा मेले का स्वरूप बदलता गया और पुरानी व्यवस्थाओं में कई बदलाव हुए, लेकिन मां दुर्गा की पूजा की परंपरा लगातार जारी रही। पहले यहां भैंस और बकरे की बलि देने की प्रथा थी। वर्तमान में भैंस की बलि बंद हो चुकी है, जबकि बकरे की बलि की परंपरा अब भी कायम है। राजपरिवार और ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से हर साल दुर्गापूजा का आयोजन किया जाता है।

पीढ़ियों से आगे बढ़ रही धार्मिक अनुष्ठानों की जिम्मेदारी

जरियागढ़ की दुर्गापूजा की एक खास पहचान यह भी है कि धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी जिम्मेदारियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। पहले मां दुर्गा की प्रतिमा की पूजा कराने के लिए पश्चिम बंगाल से पुजारी बुलाए जाते थे। योगेश्वर दास से शुरू हुई यह परंपरा अब उनके पौत्र मुरली दास निभा रहे हैं। दस भुजी देवी मंडप में राजपुरोहित के रूप में गोपाल नाथ शर्मा पूजा-अर्चना कराते थे। उनके बाद उनके पौत्र आनंद नाथ शर्मा और फिर उनके पुत्र शियावर शरण शर्मा ने यह जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में उनके भतीजे अशोक कुमार शर्मा इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। वहीं, मां चिंतामणि की पूजा मसमानो गांव के साउंगी परिवार के बसंत साडंगी कराते हैं।

राजपरिवार की कई पीढ़ियों ने संभाली परंपरा

ठाकुर नरेंद्र नाथ शाहदेव द्वारा शुरू की गई दुर्गापूजा की परंपरा को बाद में ठाकुर देवेंद्र नाथ शाहदेव, ठाकुर महेंद्र नाथ शाहदेव, ठाकुर ब्रजेंद्र नाथ शाहदेव और ठाकुर शिवेंद्र नाथ शाहदेव ने आगे बढ़ाया। वर्तमान में ठाकुर जयेंद्र नाथ शाहदेव के नेतृत्व में राजपरिवार के सदस्य दुर्गापूजा की तैयारियों में जुटते हैं। राजपरिवार और ग्रामीणों की सहभागिता से यह आयोजन आज भी अपनी परंपरागत पहचान बनाए हुए है।

आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है जरियागढ़ की दुर्गापूजा

जरियागढ़ की दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और सामुदायिक एकजुटता की जीवंत मिसाल है। करीब 300 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा बताती है कि बदलते समय के बावजूद लोकआस्था अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है। कभी 800 गांवों के लोगों की मौजूदगी से गुलजार रहने वाले दशहरा मेले की यादें और राजपरिवार की सांस्कृतिक विरासत आज भी जरियागढ़ की पहचान को विशिष्ट बनाती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed