झारखंड में मानसून की विदाई: सामान्य से 2% कम बारिश, 8 जिले रेड जोन में, पाकुड़ की हालत सबसे खराब
झारखंड में इस साल मानसून के दौरान सामान्य से 2 फीसदी कम बारिश हुई। आठ जिले रेड जोन में हैं, जबकि पश्चिमी सिंहभूम में सबसे अधिक वर्षा दर्ज की गई। छह प्रमुख जलाशयों में क्षमता का 61.33 फीसदी पानी है। खरीफ फसलों की बोआई 80.93 फीसदी रही।
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झारखंड में इस वर्ष मानसून सत्र के 111 दिनों के दौरान सामान्य से दो फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। 30 सितंबर को मानसून अवधि समाप्त होने के बाद अब 15 अक्तूबर तक राज्य से इसकी पूरी तरह विदाई होने की संभावना है। हालांकि पूरे राज्य में वर्षा का कुल आंकड़ा सामान्य के आसपास दिखता है, लेकिन भौगोलिक वितरण असमान रहने के कारण आठ जिले रेड जोन में आ गए हैं। दूसरी ओर, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिलों में सबसे अधिक वर्षा हुई है।
मानसूनी बारिश का ट्रेंड और जिलों की स्थिति
इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 12 जून को झारखंड में प्रवेश किया था। चार महीने के इस मानसूनी सफर में बारिश का रुख काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। जून के महीने में राज्य को भारी कमी का सामना करना पड़ा और सामान्य से 58 फीसदी कम वर्षा दर्ज हुई। हालांकि अगस्त में स्थिति बदली और सामान्य से 26 फीसदी अधिक पानी बरसा। इसके बाद सितंबर में भी 15 फीसदी अधिक वर्षा दर्ज की गई।
जिलों के स्तर पर आंकड़ों को देखें तो पाकुड़ की स्थिति सबसे खराब दर्ज की गई है, जहां सामान्य से 52 फीसदी कम बारिश हुई है। इसके अलावा चतरा में 36 फीसदी, देवघर में 29 फीसदी, गुमला में 26 फीसदी, गोड्डा में 24 फीसदी, कोडरमा में 22 फीसदी तथा हजारीबाग और पलामू में 20-20 फीसदी कम वर्षा रिकॉर्ड हुई है। इन आठ जिलों को रेड जोन में रखा गया है। इसके विपरीत पश्चिमी सिंहभूम जिले में सामान्य से 47 फीसदी और राजधानी रांची में 18 फीसदी अधिक वर्षा दर्ज की गई है। राज्य के 14 जिलों में बारिश सामान्य के करीब रही है।
बीते दस वर्षों का मानसूनी पैटर्न
झारखंड में पिछले दस वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि मानसूनी बारिश का वितरण लगातार असमान रहा है। पिछले एक दशक में आठ बार राज्य को सामान्य से कम बारिश का सामना करना पड़ा है। लगातार सूखे जैसे हालात वाले वर्षों 2018, 2022 और 2023 के बाद वर्ष 2026 में जाकर वर्षा का आंकड़ा सामान्य के करीब पहुंचा है।
वर्ष 2026 में राज्य की सामान्य औसत बारिश 1022.0 मिलीमीटर के मुकाबले 1005.7 मिलीमीटर दर्ज की गई, जो दो फीसदी कम है। इससे पहले वर्ष 2025 में 1199.4 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जो सामान्य से 17 फीसदी अधिक थी। वहीं वर्ष 2024 में 1011.6 मिलीमीटर यानी एक फीसदी कम वर्षा हुई थी। वर्ष 2023 में 755.7 मिलीमीटर (26 फीसदी कम) और 2022 में 817.6 मिलीमीटर (20 फीसदी कम) वर्षा हुई थी। इसके अतिरिक्त वर्ष 2021 में 1041.5 मिलीमीटर (दो फीसदी अधिक), वर्ष 2020 में 898.3 मिलीमीटर (15 फीसदी कम), वर्ष 2019 में 858.9 मिलीमीटर (19 फीसदी कम), वर्ष 2018 में 785.0 मिलीमीटर (28 फीसदी कम) तथा वर्ष 2017 में 988.2 मिलीमीटर (नौ फीसदी कम) बारिश दर्ज की गई थी। वर्ष 2016 में 1097.0 मिलीमीटर वर्षा हुई थी, जो 0.5 फीसदी अधिक थी।
जलाशयों का जलस्तर और खेती पर प्रभाव
असमान मानसूनी बारिश का सीधा प्रभाव राज्य की जल उपलब्धता और कृषि गतिविधियों पर दिखाई दे रहा है। झारखंड के छह प्रमुख जलाशयों में वर्तमान में उनकी कुल क्षमता का केवल 61.33 फीसदी पानी ही उपलब्ध है। यह पिछले दस वर्षों के सामान्य औसत जलस्तर की तुलना में 23.59 फीसदी कम है। इन मुख्य जलाशयों की कुल लाइव भंडारण क्षमता 2.012 बिलियन घनमीटर है, जबकि वर्तमान समय में इनमें केवल 1.234 बिलियन घनमीटर जल ही संचित हो पाया है।
जलस्तर में कमी और कुछ जिलों में सूखे जैसी स्थिति के बावजूद राज्य में खरीफ फसलों की बोआई पर मिला-जुला असर पड़ा है। खरीफ विपणन सत्र 2026-27 के दौरान फसलों का कुल आच्छादन तय लक्ष्य के मुकाबले 80.93 फीसदी दर्ज किया गया है। राज्य सरकार ने इस वर्ष 2,853.955 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में खरीफ फसलें लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। इसके मुकाबले 2,309.6 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों की बोआई और रोपाई पूरी हो चुकी है। कम बारिश वाले जिलों में किसानों की चिंता बढ़ गई है।