फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jharkhand ›   Ranchi News ›   350 year janmashtami tradition thakurbari temple barwadih dumbi chatra krishna cradle ginger sonth turmeric

350 साल पुरानी परंपरा: जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को पालने में झुलाने उमड़ती है भीड़, लगता है ये खास भोग

Fri, 04 Sep 2026 09:58 AM IST
आशुतोष प्रताप सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: आशुतोष प्रताप सिंह Updated Fri, 04 Sep 2026 09:58 AM IST
सार

झारखंड के चतरा जिले के पत्थलगड़ा प्रखंड के बरवाडीह-दुम्बी गांव स्थित ठाकुरबाड़ी मंदिर में करीब 350 वर्षों से जन्माष्टमी की अनूठी परंपरा निभाई जा रही है। 17वीं शताब्दी में तिवारी परिवार से शुरू हुई इस परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को मध्यरात्रि में पालने में झुलाया जाता है।

विज्ञापन
350 year janmashtami tradition thakurbari temple barwadih dumbi chatra krishna cradle ginger sonth turmeric
जन्माष्टमी पर कृष्ण को पालने में झुलाने उमड़ते हैं भक्त - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

झारखंड की धरती अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और खनिज संपदा के साथ-साथ सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और आस्था के लिए भी खास पहचान रखती है। चतरा जिले के पत्थलगड़ा प्रखंड के बरवाडीह-दुम्बी गांव स्थित ठाकुरबाड़ी मंदिर ऐसी ही एक अनूठी परंपरा को करीब साढ़े तीन सौ वर्षों से संजोए हुए है। यहां जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को पालने में झुलाने की परंपरा निभाई जाती है। इस खास रस्म में शामिल होने के लिए जन्माष्टमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और भगवान को पालने में झुलाने के लिए घंटों अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

विज्ञापन

17वीं शताब्दी में शुरू हुई थी परंपरा

बताया जाता है कि ठाकुरबाड़ी में जन्माष्टमी मनाने की यह परंपरा 17वीं शताब्दी में तिवारी परिवार ने शुरू की थी। इसी दौर में परिवार की ओर से ठाकुरबाड़ी मंदिर का निर्माण कराया गया था। मंदिर में राधा-कृष्ण, सीता-राम समेत अलग-अलग देवी-देवताओं की अष्टधातु से निर्मित प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं। समय के साथ पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन तिवारी परिवार और स्थानीय लोगों की आस्था आज भी इस परंपरा से उसी मजबूती के साथ जुड़ी हुई है। करीब 350 वर्षों से जन्माष्टमी का उत्सव यहां पारंपरिक तरीके से मनाया जा रहा है।

विज्ञापन

काशी से मंगाए जाते हैं भगवान के नए वस्त्र

जन्माष्टमी के अवसर पर ठाकुरबाड़ी मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है। मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण, राधा रानी और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। भगवान के लिए नए वस्त्र बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी यानी बनारस से मंगाए जाते हैं। वस्त्र मंदिर पहुंचने के बाद पुजारी विधि-विधान से प्रतिमाओं की साफ-सफाई करते हैं और इसके बाद उन्हें नए वस्त्र धारण कराते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

आधी रात को शुरू होती है पालना झुलाने की रस्म

जन्माष्टमी की रात होते-होते ठाकुरबाड़ी मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगती है। मध्यरात्रि में तिवारी समाज के लोग और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में एकत्र होते हैं। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के बाद भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को पालने में विराजमान कराया जाता है। इसके बाद जैसे ही पालना झुलाने की रस्म शुरू होती है, श्रद्धालुओं में भगवान को झुलाने के लिए उत्साह देखने को मिलता है। लोग अपनी बारी का इंतजार करते हैं और भगवान के बाल स्वरूप को पालने में झुलाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

रातभर गूंजते हैं सोहर और पारंपरिक गीत

जन्माष्टमी की रात ठाकुरबाड़ी का पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। महिलाओं की टोली रातभर सोहर और भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़े पारंपरिक गीत गाती है। भजन और लोकगीतों के बीच मंदिर परिसर में आधी रात तक उत्सव का माहौल बना रहता है। इस परंपरा का सिलसिला अगले दिन भी जारी रहता है। अगले दिन भगवान श्रीकृष्ण को जगाने की विशेष रस्म निभाई जाती है। जागरण के बाद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया जाता है।

अदरक की सोंठ और हल्दी के लड्डू का लगता है भोग

ठाकुरबाड़ी में जन्माष्टमी की सबसे खास परंपराओं में भगवान श्रीकृष्ण को लगाया जाने वाला विशेष भोग भी शामिल है। जन्माष्टमी के दिन भगवान को अदरक की सोंठ और हल्दी के लड्डू का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा दूध, दही, मक्खन, चना और अलग-अलग तरह के पुए-पकवान भी भगवान को अर्पित किए जाते हैं। इन पारंपरिक पकवानों को लेकर भी श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है।

हर घर में तैयार होता है भगवान का भोग

इस ठाकुरबाड़ी की भोग परंपरा की एक खास बात यह है कि पूरा भोग किसी एक घर में तैयार नहीं किया जाता। तिवारी समाज के लोग अपने-अपने घरों में अलग-अलग पकवान तैयार करते हैं। इसके बाद सभी पकवानों को दौरा में सजाकर ठाकुरबाड़ी मंदिर लाया जाता है। सभी परिवारों की ओर से लाए गए भोग को भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है और पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया जाता है।

दूर-दराज से पहुंचते हैं श्रद्धालु

करीब साढ़े तीन शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र बनी हुई है। जन्माष्टमी के अवसर पर सिर्फ तिवारी समाज के लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों और दूर-दराज के इलाकों से भी श्रद्धालु ठाकुरबाड़ी पहुंचते हैं। भगवान के बाल स्वरूप को पालने में झुलाने की परंपरा में शामिल होकर श्रद्धालु खुद को इस धार्मिक परंपरा से जोड़ते हैं और भगवान से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

बदलते समय में भी कायम है परंपरा

समय बदलने के बावजूद बरवाडीह-दुम्बी की ठाकुरबाड़ी में जन्माष्टमी मनाने का पारंपरिक स्वरूप आज भी बरकरार है। पूजा की विधि, भगवान को पालने में झुलाने की रस्म, महिलाओं के सोहर, पारंपरिक भोग और अगले दिन भगवान को जगाने की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जा रही है। यही वजह है कि बरवाडीह-दुम्बी की यह ठाकुरबाड़ी अब सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि करीब 350 वर्षों से चली आ रही आस्था, संस्कृति और धार्मिक परंपरा की जीवंत विरासत बन चुकी है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed