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Jharkhand: मरांङ बुरू के संरक्षण को लेकर CM सोरेन से संथाल समाज के प्रतिनिधिमंडल ने की भेंट; उठाईं ये मांगें
Mon, 09 Jun 2025 07:57 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: हिमांशु प्रियदर्शी
Updated Mon, 09 Jun 2025 07:57 PM IST
सार
Ranchi News: संथाल समाज के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। उसमें उन्होंने संथाल आदिवासियों के पवित्र धार्मिक स्थल मरांङ बुरू (पारसनाथ पर्वत) के संरक्षण, प्रबंधन और उसके धार्मिक महत्व को मान्यता देने समेत कई मांगें की गई।
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CM सोरेन से संथाल समाज के प्रतिनिधिमंडल ने की भेंट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सोमवार को कांके रोड स्थित मुख्यमंत्री आवासीय कार्यालय में मरांङ बुरू बचाओ संघर्ष समिति (संथाल समाज) के 51 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की। इस अवसर पर प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। उसमें संथाल आदिवासियों के पवित्र धार्मिक स्थल मरांङ बुरू (पारसनाथ पर्वत) के संरक्षण, प्रबंधन और उसके धार्मिक महत्व को मान्यता देने की मांग की गई।
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मरांङ बुरू को धार्मिक तीर्थ स्थल घोषित करने की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को अवगत कराया कि मरांङ बुरू पर्वत को संथाल समाज प्राचीन काल से ईश्वर के रूप में पूजता आया है। इस पर्वत को धार्मिक तीर्थ स्थल का दर्जा देने की मांग लंबे समय से उठती रही है। प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, भूमि अभिलेख, कमिशनरी कोर्ट, पटना हाई कोर्ट और प्रिवी काउंसिल कोर्ट जैसे संस्थानों ने संथाल समुदाय के प्रथागत अधिकारों को मान्यता दी है। ऐसे में झारखंड सरकार से अपेक्षा की जाती है कि मरांङ बुरू को संथालों का आधिकारिक धार्मिक तीर्थ स्थल घोषित किया जाए।
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आदिवासी धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए अलग कानून की जरूरत
प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि मरांङ बुरू सहित लुगू बुरू, जाहेर थान (सरना), मांझी थान, मसना, हड़गड़ी जैसे धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए एक विशिष्ट ‘आदिवासी धार्मिक स्थल संरक्षण अधिनियम’ बनाया जाए, ताकि इन स्थलों पर बाहरी हस्तक्षेप को रोका जा सके और पारंपरिक धार्मिक अधिकार सुरक्षित रह सकें।
वन भूमि पर जैन समुदाय के अतिक्रमण का विरोध
ज्ञापन में इस बात पर भी आपत्ति जताई गई कि जैन समुदाय द्वारा पारसनाथ पर्वत पर मठ, मंदिर और धर्मशाला जैसे निर्माण अवैध तरीके से किए गए हैं। संथाल समाज का आरोप है कि इस धार्मिक स्थल पर एकतरफा निर्णय लेते हुए उसे केवल ‘सम्मेद शिखर’ के रूप में जैन धर्म का तीर्थ स्थल घोषित किया गया, जबकि यहां युगों से संथाल समाज पूजा करता आया है। इस असंवैधानिक आदेश को रद्द करने की मांग की गई है।
ग्राम सभा को दी जाए निगरानी की जिम्मेवारी
संघर्ष समिति की ओर से यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के केस संख्या 180/2011 और वन अधिकार अधिनियम 2006 की धारा 3 के तहत मरांङ बुरू पर्वत पर सामूहिक वन भूमि अधिकार संथाल आदिवासियों को प्राप्त है। अतः इस स्थल के संरक्षण, प्रबंधन, नियंत्रण और अनुश्रवण की जिम्मेवारी ग्राम सभा को सौंपी जानी चाहिए।
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राजकीय महोत्सव घोषित करने की भी मांग
संथाल समाज ने मांग रखी कि मरांङ बुरू में हर वर्ष फाल्गुन शुक्ल पक्ष तृतीय तिथि को आयोजित होने वाले युग जाहेर वाहा-बोंगा पूजा महोत्सव को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिया जाए। इससे राज्य के सांस्कृतिक वैभव को बढ़ावा मिलेगा और समुदाय को उसका धार्मिक अधिकार भी मिलेगा।
पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना को बताया असंवैधानिक
प्रतिनिधिमंडल ने भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय की उस अधिसूचना का विरोध किया, जिसके तहत बिना ग्राम सभा की सहमति के मरांङ बुरू को पारिस्थितिकी संवेदी जोन (Eco Sensitive Zone) घोषित किया गया है। इसे आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ बताया गया और रद्द करने की मांग की गई।
मुख्यमंत्री ने दिया भरोसा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना और उन्हें भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार आदिवासी समुदाय की धार्मिक आस्थाओं और पारंपरिक अधिकारों का सम्मान करते हुए सभी मांगों पर विधिसम्मत और यथोचित कार्रवाई करेगी। इस अवसर पर राज्य मंत्री फागू बेसरा, मरांङ बुरू बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष रामलाल मुर्मू और प्रसिद्ध साहित्यकार भोगला सोरेन भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।