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दो दशक का संघर्ष: झारखंड में खत्म हुए एक दर्जन माओवादी संगठन, 600 से अधिक जवान शहीद

Mon, 21 Sep 2026 06:18 PM IST
प्रतीक पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: प्रतीक पांडेय Updated Mon, 21 Sep 2026 06:18 PM IST
सार

दो दशकों में सुरक्षा अभियानों, विकास कार्यों और आत्मसमर्पण-पुनर्वास नीति के बीच झारखंड में कई माओवादी संगठनों का प्रभाव खत्म हुआ। हालांकि इस संघर्ष में 600 से अधिक जवानों और अधिकारियों के बलिदान का भी उल्लेख है।
 

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jharkhand maoist organizations surrender rehabilitation security operations
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

झारखंड में सुरक्षा बलों के निरंतर अभियानों और सरकारी नीतियों के परिणामस्वरूप दो दशकों में एक दर्जन से अधिक माओवादी संगठनों का अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो गया है। केंद्र और राज्य सरकार की इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों के साहस और आत्मसमर्पण व पुनर्वास नीति के कारण राज्य में शांति व्यवस्था बहाल हुई है। हालांकि शासन के खिलाफ हथियार उठाने वाले उग्रवादियों को खत्म करने और मुख्य धारा में लाने के लिए 600 से अधिक जवानों तथा अधिकारियों ने अपना बलिदान दिया है।
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गोला-बारूद के आपूर्ति रास्ते किए ध्वस्त
सुरक्षा बलों ने दुर्गम जंगलों में लगातार तलाशी अभियान चलाकर उग्रवादियों के गोला-बारूद के आपूर्ति रास्तों को ध्वस्त किया और राशन की आपूर्ति शृंखला तोड़ दी। इसके साथ ही सुदूर ग्रामीण इलाकों में विकास कार्य पहुंचाकर ग्रामीणों का विश्वास जीता गया। आपरेशन ग्रीन हंट, आपरेशन क्लीन और आपरेशन नव जीवन जैसे अभियानों ने माओवादी संगठनों की रीढ़ तोड़ दी। झारखंड में दो दशक से विकास योजनाओं को बाधित कर रहे और कारोबारियों से करोड़ों रुपये की लेवी वसूलने वाले माओवादी अब लगभग निष्प्रभावी हो चुके हैं।
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लेवी के खौफ से मुक्ति
कोयला कारोबार, सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल और अस्पताल निर्माण कार्य से जुड़े लोग जो पहले खौफ में थे, वे अब लेवी के भय से मुक्त हैं। जिन रास्तों पर लोग दिन में गुजरने से डरते थे और सुरक्षाकर्मी मुंह छिपाकर चलते थे, वहां अब लोग रात में भी निडर होकर आवाजाही कर रहे हैं। जंगलों में गोले-बारूद का शोर थम गया है तथा मोबाइल टावर व पुल-पुलिया उड़ाने की घटनाएं अब बंद हो गई हैं।
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पीएलजीए से शुरू हुआ था संगठनों का सफर
राज्य में उग्रवाद का सफर देश के सबसे पुराने माओवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) से शुरू हुआ था। बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रेरित होकर बने इस संगठन के बाद युवाओं ने हथियार उठाए। आगे चलकर देश का सबसे बड़ा माओवादी संगठन भाकपा माओवादी अस्तित्व में आया, जिसके नेटवर्क ने झारखंड, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और बंगाल तक पैर पसारे।

चार प्रमुख संगठन रहे सक्रिय
झारखंड में चार प्रमुख संगठन मुख्य रूप से सक्रिय रहे, जिनमें भाकपा माओवादी के अलावा पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया (पीएलएफआई), तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी) और झारखंड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) शामिल हैं। टीएसपीसी का गठन भाकपा माओवादी से अलग होकर हुआ था, जिसने चतरा, लातेहार, पलामू, हजारीबाग और रांची के कोयला क्षेत्रों में अपना वर्चस्व बनाया। वहीं जेजेएमपी की शुरुआत माओवादियों के विरोध में हुई थी, लेकिन बाद में यह भी माओवादी विचारधारा पर चलने लगा।

फूट से बने कई छोटे उग्रवादी गुट
माओवादी संगठनों में आपसी फूट के कारण कई छोटे गुट बने और खत्म हुए। रांची-खूंटी सीमा पर लकड़ी तस्करी और आपराधिक गतिविधियों में सक्रिय सम्राट गिरोह ने माओवाद की तर्ज पर दहशत फैलाने का प्रयास किया। सम्राट गिरोह से अलग होकर जयनाथ साहू के साथी दिनेश गोप ने झारखंड लिबरेशन टाइगर्स (जेएलटी) का गठन किया। जेएलटी पर प्रतिबंध लगने के बाद दिनेश गोप ने पीएलएफआई नामक संगठन बनाया, जो लंबे समय तक टेरर फंडिंग और उग्रवादी गतिविधियों में लिप्त रहा।


इसके अलावा झारखंड में झारखंड प्रस्तुति कमेटी (जेपीसी), सशस्त्र पीपुल्स मोर्चा (एसपीएम), संघर्ष जन मुक्ति मोर्चा (एसजेएमएम), झांगुर ग्रुप, पहाड़ी चीता और शांति सेना जैसे संगठन भी कुछ समय के लिए सक्रिय रहे। वर्तमान में इन सभी संगठनों के शीर्ष नेता या तो मारे जा चुके हैं या पकड़े गए हैं। कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर खेती-बारी शुरू कर दी है, जबकि बाकी जेलों में हैं।
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