फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jharkhand ›   jharkhand-high-court-rejects-bail-raj-kumar-bhagat-pakur-sp-maoist-attack-case

पाकुड़ एसपी हत्याकांड: राज कुमार भगत को झारखंड हाईकोर्ट से झटका, गंभीर साक्ष्यों के चलते जमानत खारिज

Sat, 03 Oct 2026 07:15 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी Updated Sat, 03 Oct 2026 07:15 PM IST
सार

झारखंड हाईकोर्ट ने 2013 में पाकुड़ के तत्कालीन एसपी समेत पांच पुलिसकर्मियों की हत्या से जुड़े माओवादी हमले के मामले में आरोपी राज कुमार भगत उर्फ राजकुमार भगत की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने केस डायरी में आरोपी के खिलाफ गंभीर और विशिष्ट साक्ष्य होने का हवाला दिया।

विज्ञापन
jharkhand-high-court-rejects-bail-raj-kumar-bhagat-pakur-sp-maoist-attack-case
झारखंड उच्च न्यायालय - फोटो : ANI

विस्तार

झारखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 में हुए घातक माओवादी हमले से जुड़े एक मामले में अभियुक्त राज कुमार भगत उर्फ राजकुमार भगत की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की पीठ ने निचली अदालत के निर्णय को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
विज्ञापन


अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ केस डायरी में गंभीर और विशिष्ट साक्ष्य उपलब्ध हैं, जिसके कारण उसे राहत प्रदान नहीं की जा सकती। यह मामला पाकुड़ के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक समेत पांच पुलिसकर्मियों की हत्या और पुलिस दल पर हुए जानलेवा हमले से संबंधित है।
विज्ञापन


प्राथमिकी में 28 से 30 अज्ञात माओवादियों का उल्लेख
यह पूरा विवाद दुमका जिले के काठीकुंड थाना से जुड़ा हुआ है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 2 जुलाई, 2013 को पाकुड़ के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में जा रहे पुलिस दल पर प्रतिबंधित संगठन एमसीसी के सदस्यों ने अचानक घात लगाकर हमला किया था। इस भीषण घटना में पुलिस अधीक्षक सहित पांच पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस मामले में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के अलावा आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम (यूएपीए) और शस्त्र अधिनियम की धाराएं लगाई गई थीं। प्रारंभिक प्राथमिकी में चार लोगों को नामजद किया गया था, जबकि 28 से 30 अज्ञात माओवादियों का उल्लेख किया गया था। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद आरोपी राज कुमार भगत को हिरासत में लिया गया था और वह 7 नवंबर, 2022 से लगातार न्यायिक हिरासत में है।

बचाव पक्ष के तर्क और जमानत का आधार
अपीलकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि प्राथमिकी में आरोपी का नाम शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि उसके खिलाफ अपराध की योजना बनाने, आर्थिक सहायता देने या घटना को अंजाम देने से संबंधित कोई ठोस सामग्री मौजूद नहीं है। आरोपी के पास से कोई आपत्तिजनक बरामदगी नहीं हुई है।

इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी या वित्तीय लेन-देन के माध्यम से भी उसे प्रतिबंधित संगठन से जोड़ने वाला कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया है। बचाव पक्ष ने लंबे समय से जेल में रहने का तर्क देते हुए कहा कि मामले के 46 गवाहों में से अब तक केवल 12 गवाहों का बयान दर्ज हो पाया है। आरोपी ने सह-आरोपियों को मिली जमानत के आधार पर समानता का लाभ देने का आग्रह भी किया।

उच्च न्यायालय के निर्णय का आधार
उच्च न्यायालय ने केस डायरी के पैराग्राफ 150 और 151 में दर्ज स्वतंत्र गवाहों के बयानों का उल्लेख किया। गवाहों के अनुसार, आरोपी ने 29 जून, 2013 को दुमका के जामनी में हुई एक बैठक में हिस्सा लिया था, जिसमें बड़ी घटना की साजिश रची गई थी। यह बैठक 2 जुलाई की घटना से ठीक तीन दिन पहले आयोजित की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सह-आरोपियों को जमानत मिलने से समानता का आधार स्वतः निर्मित नहीं होता, क्योंकि उनकी परिस्थितियां और हिरासत की अवधि भिन्न थीं।

ये भी पढ़ें- झारखंड: हेमंत सोरेन पर आरोप तय, क्या अब बढ़ेगा सीएम पद से इस्तीफे का दबाव? भाजपा की मांग पर झामुमो का पलटवार


यूएपीए के कड़े प्रावधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
अदालत ने यूएपीए की धारा 43डी(5) का हवाला देते हुए कहा कि जमानत पर विचार करते समय यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया आरोप सही प्रतीत होते हैं या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के एनआईए बनाम जहूर अहमद शाह वाटली तथा गुरविंदर सिंह प्रकरणों के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि गंभीर आपराधिक मामलों में 'जेल अपवाद, जमानत नियम' की कसौटी लागू नहीं होती।

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैधानिक प्रतिबंधों के बीच संतुलन साधना जरूरी है। लगभग तीन वर्ष दस महीने की लंबी हिरासत और मुकदमे में देरी अकेले जमानत का आधार नहीं बन सकती। पूर्व में भी याचिका खारिज होने और कोई नया तथ्य न होने के कारण उच्च न्यायालय ने आपराधिक अपील को निरस्त कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed