कारगिल गाथा: घायल कैप्टन करियप्पा ने किया दुश्मन का सफाया
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भारतीय क्षेत्र से पाक सेना हटाने और सीजफायर समझौते पर हस्ताक्षर करने के बावजूद पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबे से बाज नहीं आया। एलओसी के इस पार से लौटने की औपचारिक घोषणा करने के बाद भी घुसपैठियों के घात लगाकर हमले जारी रहे।
ऊपरी तौर पर देखने पर युद्ध खत्म हो चुका था। बाकायदा आपरेशन विजय की सफलता घोषित की जा चुकी थी, लेकिन कारगिल और सटे इलाकों की दुरूह भौगोलिक परिस्थितियों में छिपे बैठे घुसपैठिए अब भी लौटने को तैयार नहीं थे।
अपने इलाके को खाली करवा कर सुरक्षित घोषित करने के लिए भारतीय सेना का अभियान जारी था। इस बीच एलओसी के बिल्कुल नजदीक एरिया कोनिकल को दुश्मन के कब्जे से छुड़ाने की योजना बनाई गई।
एरिया कोनिकल को कब्जाने के दौरान दुश्मन ने दो बार हमला किया
ये जिम्मेदारी पांच पैरा के कैप्टन बालेयदा मुथन्ना करियप्पा को दी गई। कैप्टन करियप्पा की टुकड़ी के सामने चोटी तक पहुंचने की चुनौती थी। इस पर चढ़ना न सिर्फ मुश्किल था, बल्कि इसमें जान का खतरा भी बना हुआ था।
कैप्टन करियप्पा ने चढ़ाई शुरू कर दी। उन्हें गर्दन पर गंभीर चोट आई। घायल होने के बावजूद वह अपने लक्ष्य तक पहुंचे और मोर्चे बनाकर बैठे दो दुश्मनों को ढेर कर दिया। एरिया कोनिकल को कब्जाने के दौरान दुश्मन ने दो बार हमला किया, जिसे कैप्टन करियप्पा ने बहादुरी से नाकाम करते हुए लक्ष्य हासिल कर लिया।
कैप्टन करियप्पा के नेतृत्व में टुकड़ी ने बिना बड़े नुकसान के ही दुश्मन को ढेर कर अपना टारगेट हासिल कर लिया। कैप्टन करियप्पा को वीर चक्र का सम्मान दिया गया।