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पति, ससुरालियों की जमानत अर्जी रद्द
Jammu
Updated Wed, 28 May 2014 05:36 AM IST
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जम्मू। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश जम्मू आरएस जैन ने दहेज मांगने के मामले में आरोपी पति अनवर खुर्शीद, ससुर चौधरी फारूक आलम, सास हमीदा बी, मासी रशीदा बीबी और अंकल तारीक इकबाल की प्री अरेस्ट जमानत की अर्जी को रद्द कर दिया।
पुलिस केस के अनुसार शिकायतकर्ता महिला ने सीजेएम के समक्ष शिकायत पेश की। शिकायत को सीजेएम ने छन्नी हिम्मत पुलिस थाने में जांच के लिए भेज दिया। इसमें बताया गया कि शिकायतकर्ता का निकाह 15 दिसंबर, 2013 को हुआ। निकाह के बाद से ही उसे तंग किया जाता रहा। कम दहेज लाने पर उसे प्रताड़ित भी किया जाता रहा। उसका पिता एक सामान्य दुकानदार है। आरोपियों की मांग पूरी करने के लिए उसने उधार में रुपये भी लिए। इस बीच और दहेज की मांग तर्कहीन है और उसके पिता के पास इस डिमांड को पूरा करने के लिए रुपये भी नहीं हैं। आरोपियों ने शिकायतकर्ता को शारीरिक प्रताड़ना देना भी शुरू कर दिया। शिकायतकर्ता को इस बीच गर्भ ठहर गया। ढाई महीने का बच्चा उसके पेट में है। इसके बावजूद आरोपियों ने उसे मार्च 2014 में लातों और घूसों से पीटा। उसके पेट में भी लाते मारी गईं, जिसके कारण वह बेेहोश हो गई और एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हुई। उसकी जिंदगी पर खतरा पैदा हो गया और लगातार खून बहने लगा। इस बीच, आरोपियों ने एक पेपर पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया और कहा कि इलाज के लिए इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करना जरूरी है। बाद में उसे पता चला कि उससे पेपर पर गर्भपात कराने के लिए हस्ताक्षर लिए गए। लातों और घूसोें के कारण पेट में बच्चे की मौत हो गई थी। उसकी हत्या करनेे के भी शिकायतकर्ता ने आरोप लगाए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद प्रधान न्यायालय ने पाया कि याची ने इस बात पर जोर दिया है कि गर्भपात कराने के लिए शिकायतकर्ता की भी मर्जी थी। डाक्टरों ने भी उसकी जान बचाने के लिए गर्भपात कराने की सलाह दी थी, जबकि लातों और घूसों के कारण गर्भपात कराने की नौबत आई थी। मामला काफी गंभीर है और आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती है। जेएनएफ
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पुलिस केस के अनुसार शिकायतकर्ता महिला ने सीजेएम के समक्ष शिकायत पेश की। शिकायत को सीजेएम ने छन्नी हिम्मत पुलिस थाने में जांच के लिए भेज दिया। इसमें बताया गया कि शिकायतकर्ता का निकाह 15 दिसंबर, 2013 को हुआ। निकाह के बाद से ही उसे तंग किया जाता रहा। कम दहेज लाने पर उसे प्रताड़ित भी किया जाता रहा। उसका पिता एक सामान्य दुकानदार है। आरोपियों की मांग पूरी करने के लिए उसने उधार में रुपये भी लिए। इस बीच और दहेज की मांग तर्कहीन है और उसके पिता के पास इस डिमांड को पूरा करने के लिए रुपये भी नहीं हैं। आरोपियों ने शिकायतकर्ता को शारीरिक प्रताड़ना देना भी शुरू कर दिया। शिकायतकर्ता को इस बीच गर्भ ठहर गया। ढाई महीने का बच्चा उसके पेट में है। इसके बावजूद आरोपियों ने उसे मार्च 2014 में लातों और घूसों से पीटा। उसके पेट में भी लाते मारी गईं, जिसके कारण वह बेेहोश हो गई और एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हुई। उसकी जिंदगी पर खतरा पैदा हो गया और लगातार खून बहने लगा। इस बीच, आरोपियों ने एक पेपर पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया और कहा कि इलाज के लिए इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करना जरूरी है। बाद में उसे पता चला कि उससे पेपर पर गर्भपात कराने के लिए हस्ताक्षर लिए गए। लातों और घूसोें के कारण पेट में बच्चे की मौत हो गई थी। उसकी हत्या करनेे के भी शिकायतकर्ता ने आरोप लगाए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद प्रधान न्यायालय ने पाया कि याची ने इस बात पर जोर दिया है कि गर्भपात कराने के लिए शिकायतकर्ता की भी मर्जी थी। डाक्टरों ने भी उसकी जान बचाने के लिए गर्भपात कराने की सलाह दी थी, जबकि लातों और घूसों के कारण गर्भपात कराने की नौबत आई थी। मामला काफी गंभीर है और आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती है। जेएनएफ
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