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Udhampur News: जिले में 10 हजार से अधिक प्राकृतिक जल स्रोत लड़ रहे अस्तित्व की जंग
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- - लुप्त हुए स्रोतों को वापस स्वरूप दिलाने का प्रयास कर रहे स्वतंत्र पुरातत्वविद अनिल पाबा
- पुराण के विभिन्न वेदों में भी है प्राचीन प्रणाली से जल संरक्षण का उल्लेख
प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली की बाओलियों के इतिहास की गवा है देविका नगरी
सौरभ सागर
उधमपुर। देविकानगरी को प्राकृतिक जल स्रोत बावलियों की धरती के रूप में भी जाना जाता है। यहां पौराणिक दौर में प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से पानी की सभी जरूरतों को पूरा किया जाता था। लेकिन आज वही प्राकृतिक जलस्रोत लुप्त होने के कगार पर हैं। इस वजह से गर्मियों में जल संकट पैदा हो सकता है।
बावलियों का उल्लेख पुराण के विभिन्न वेदों में भी किया गया है। इससे न पीने के पानी की कभी किल्लत उत्पन्न होती थी और पानी को नहाने, कपड़े धोने, कृषि में इस्तेमाल करने सहित मवेशियों की प्यास बुझ जाती थी। संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल सर्वे रिपोर्ट 2023 की मानें तो 2050 तक भारत में सबसे अधिक जल संकट गहरा सकता है जबकि मौजूद समय में ही उधमपुर जिला 61 लाख गैलन प्रतिदिन पानी की किल्लत से जूझ रहा है।
लंबे समय तक रहे शुष्क मौसम और बारिश की कमी की वजह से गर्मियों में जल संकट गहराने की संभावना बनी हुई है। जल संसाधनों में भी जल स्तर में कमी आई है। जिला उधमपुर में प्रति दिन 84 लाख गैलन पानी की सप्लाई होती है जबकि 145 लाख गैलन पानी की जरूरत है। गर्मियों में यह समस्या और भी गंभीर रूप धारण कर सकता है।
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जेजेएम और अमृत-2 के तहत किए जा रहे प्रयास
पानी की किल्लत को दूर करने के लिए जिले के शहरी इलाकों में सरकार की ओर से अमृत-2 और ग्रामीण इलाकों में जल जीवन मिशन परियोजना पर काम किया जा रहा है। जिससे आने वाले दिनों में पानी की किल्लत को दूर किया जा सकता है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि अगर बारिश नहीं होती है और नदी नालों का जल स्तर सूखने लग जाएंगे तो इन परियोजनाओं का संचालन कैसे हो पाएगा।
पैसा जारी न होने से जेजेएम अधर में
मौजूदा समय में जिले में ग्रामीण क्षेत्र में जलापूर्ति के लिए जल जीवन मिशन के तहत 1660 करोड़ रुपये की लागत तैयार की गई 160 परियोजनाओं पर काम चल रहा है। लेकिन सरकार की ओर से फंड मुहैया न कराए जाने की वजह से अधिकतर काम अधर में लटके हुए हैं। जिले के उधमपुर जिला मुख्यालय सहित चिनैनी और रामनगर के शहरी इलाकों में अमृत-2 योजना के तहत काम किया जाएगा। ताकि पानी की किल्लत को दूर किया जा सके। चिनैनी में निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है।
पानी की खपत प्रतिदिन
जिला - 84 लाख गैलन
ग्रामीण - 47 लाख गैलन
शहर - 36 लाख गैलन
पानी की जरूरत प्रतिदिन
जिला - 145 लाख गैलन
ग्रामीण - 90 लाख गैलन
शहरी - 55 लाख गैलन
कमी - 61 लाख गैलन
जिला में है 10 हजार से अधिक बावलियां
वहीं, प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से जिले की विरासती बावलियों और चश्मों को फिर से उनका स्वरूप वापस दिलाने के प्रयास कर रहे स्वतंत्र पुरातत्वविद अनिल पाबा ने अपने शोधा में पाया कि सरकारी आंकड़ों की मानें तो जिले में लगभग चार हजार बावलियां हैं। जबकि जिले में कुल 10 हजार से भी अधिक ऐसी ही जल स्रोत हैं। लेकिन लगातार बढ़ते विस्थापन, शहरीकरण के कारण जल स्रोत लुप्त हो गए हैं। खासकर उनकी प्राचीन संरचना से छेड़छाड़ के कारण उनका अस्तित्व खत्म होता जा रहा है।
क्या है प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली
पाबा के मुताबिक पुराने समय में लाग बावली का निर्माण चश्मे के रूप में किया करते थे और चश्मे का पानी पीने योग्य ही रहे इसलिए उसके पास धार्मिक स्थान बना दिया जाता है। जिसमें पानी की पवित्रता बनी रहती थी। चश्मे का पानी धार्मिक स्थल सहित पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जबकि चश्मे से ओवरफ्लो होते पानी के लिए एक कुंड बनाया जाता है। जिसके पानी को कपड़े धोने या नहाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था और एक कुंड मवेशियों को पानी पिलाने के काम आता था। जबकि आखिर में बहता पानी खेती बाड़ी में इस्तेमाल हो जाता था। जिससे पानी भी व्यर्थ नहीं होता था। इसके अलावा तालाब, कुंए के माध्यम से जल संरक्षण भी प्राचीन प्रणाली का हिस्सा हैं।
स्रोतों के संरक्षण करने होंगे प्रयास
अपने सर्वे में पाया कि अगर वर्षा का जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, ड्रीप सिंचाई प्रणाली, पौधारोपण को बढ़ावा देने की जरूरत है। प्राकृतिक जल स्रोतों के 100 मीटर दायरे पर निर्माण कार्य न करने, जल स्रोतों की मरम्मत के दौरान कंक्रीट या सीमेंट का उपयोग न करने और सभी प्राकृतिक जलस्रोतों को उनके पुराने स्वरूप में तैयार कर जल संकट की समस्या को निपटा जा सकता है।
-अनिल पाबा, स्वतंत्र पुरातत्वविद।
गर्मी में जल संकट से निपटने को तैयार
अगर बारिश होती है तो गर्मियों में इस तरह का संकट नहीं पैदा होगा लेकिन फिर विभाग की ओर से पूरी तैयारी है जिले पीने के पानी की सप्लाई के लिए 6 पानी के टैंकर उपलब्ध हैं। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में जल जीवन मिशन और शहरी इलाकों में अमृत-2 परियोजना पर काम किया जा रहा है। जिससे जिले में पानी की किल्लत नहीं होगी। :संदीप गुप्ता, एक्सईएन पीएचई।
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- पुराण के विभिन्न वेदों में भी है प्राचीन प्रणाली से जल संरक्षण का उल्लेख
प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली की बाओलियों के इतिहास की गवा है देविका नगरी
सौरभ सागर
उधमपुर। देविकानगरी को प्राकृतिक जल स्रोत बावलियों की धरती के रूप में भी जाना जाता है। यहां पौराणिक दौर में प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से पानी की सभी जरूरतों को पूरा किया जाता था। लेकिन आज वही प्राकृतिक जलस्रोत लुप्त होने के कगार पर हैं। इस वजह से गर्मियों में जल संकट पैदा हो सकता है।
बावलियों का उल्लेख पुराण के विभिन्न वेदों में भी किया गया है। इससे न पीने के पानी की कभी किल्लत उत्पन्न होती थी और पानी को नहाने, कपड़े धोने, कृषि में इस्तेमाल करने सहित मवेशियों की प्यास बुझ जाती थी। संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल सर्वे रिपोर्ट 2023 की मानें तो 2050 तक भारत में सबसे अधिक जल संकट गहरा सकता है जबकि मौजूद समय में ही उधमपुर जिला 61 लाख गैलन प्रतिदिन पानी की किल्लत से जूझ रहा है।
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लंबे समय तक रहे शुष्क मौसम और बारिश की कमी की वजह से गर्मियों में जल संकट गहराने की संभावना बनी हुई है। जल संसाधनों में भी जल स्तर में कमी आई है। जिला उधमपुर में प्रति दिन 84 लाख गैलन पानी की सप्लाई होती है जबकि 145 लाख गैलन पानी की जरूरत है। गर्मियों में यह समस्या और भी गंभीर रूप धारण कर सकता है।
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जेजेएम और अमृत-2 के तहत किए जा रहे प्रयास
पानी की किल्लत को दूर करने के लिए जिले के शहरी इलाकों में सरकार की ओर से अमृत-2 और ग्रामीण इलाकों में जल जीवन मिशन परियोजना पर काम किया जा रहा है। जिससे आने वाले दिनों में पानी की किल्लत को दूर किया जा सकता है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि अगर बारिश नहीं होती है और नदी नालों का जल स्तर सूखने लग जाएंगे तो इन परियोजनाओं का संचालन कैसे हो पाएगा।
पैसा जारी न होने से जेजेएम अधर में
मौजूदा समय में जिले में ग्रामीण क्षेत्र में जलापूर्ति के लिए जल जीवन मिशन के तहत 1660 करोड़ रुपये की लागत तैयार की गई 160 परियोजनाओं पर काम चल रहा है। लेकिन सरकार की ओर से फंड मुहैया न कराए जाने की वजह से अधिकतर काम अधर में लटके हुए हैं। जिले के उधमपुर जिला मुख्यालय सहित चिनैनी और रामनगर के शहरी इलाकों में अमृत-2 योजना के तहत काम किया जाएगा। ताकि पानी की किल्लत को दूर किया जा सके। चिनैनी में निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है।
पानी की खपत प्रतिदिन
जिला - 84 लाख गैलन
ग्रामीण - 47 लाख गैलन
शहर - 36 लाख गैलन
पानी की जरूरत प्रतिदिन
जिला - 145 लाख गैलन
ग्रामीण - 90 लाख गैलन
शहरी - 55 लाख गैलन
कमी - 61 लाख गैलन
जिला में है 10 हजार से अधिक बावलियां
वहीं, प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से जिले की विरासती बावलियों और चश्मों को फिर से उनका स्वरूप वापस दिलाने के प्रयास कर रहे स्वतंत्र पुरातत्वविद अनिल पाबा ने अपने शोधा में पाया कि सरकारी आंकड़ों की मानें तो जिले में लगभग चार हजार बावलियां हैं। जबकि जिले में कुल 10 हजार से भी अधिक ऐसी ही जल स्रोत हैं। लेकिन लगातार बढ़ते विस्थापन, शहरीकरण के कारण जल स्रोत लुप्त हो गए हैं। खासकर उनकी प्राचीन संरचना से छेड़छाड़ के कारण उनका अस्तित्व खत्म होता जा रहा है।
क्या है प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली
पाबा के मुताबिक पुराने समय में लाग बावली का निर्माण चश्मे के रूप में किया करते थे और चश्मे का पानी पीने योग्य ही रहे इसलिए उसके पास धार्मिक स्थान बना दिया जाता है। जिसमें पानी की पवित्रता बनी रहती थी। चश्मे का पानी धार्मिक स्थल सहित पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जबकि चश्मे से ओवरफ्लो होते पानी के लिए एक कुंड बनाया जाता है। जिसके पानी को कपड़े धोने या नहाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था और एक कुंड मवेशियों को पानी पिलाने के काम आता था। जबकि आखिर में बहता पानी खेती बाड़ी में इस्तेमाल हो जाता था। जिससे पानी भी व्यर्थ नहीं होता था। इसके अलावा तालाब, कुंए के माध्यम से जल संरक्षण भी प्राचीन प्रणाली का हिस्सा हैं।
स्रोतों के संरक्षण करने होंगे प्रयास
अपने सर्वे में पाया कि अगर वर्षा का जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, ड्रीप सिंचाई प्रणाली, पौधारोपण को बढ़ावा देने की जरूरत है। प्राकृतिक जल स्रोतों के 100 मीटर दायरे पर निर्माण कार्य न करने, जल स्रोतों की मरम्मत के दौरान कंक्रीट या सीमेंट का उपयोग न करने और सभी प्राकृतिक जलस्रोतों को उनके पुराने स्वरूप में तैयार कर जल संकट की समस्या को निपटा जा सकता है।
-अनिल पाबा, स्वतंत्र पुरातत्वविद।
गर्मी में जल संकट से निपटने को तैयार
अगर बारिश होती है तो गर्मियों में इस तरह का संकट नहीं पैदा होगा लेकिन फिर विभाग की ओर से पूरी तैयारी है जिले पीने के पानी की सप्लाई के लिए 6 पानी के टैंकर उपलब्ध हैं। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में जल जीवन मिशन और शहरी इलाकों में अमृत-2 परियोजना पर काम किया जा रहा है। जिससे जिले में पानी की किल्लत नहीं होगी। :संदीप गुप्ता, एक्सईएन पीएचई।