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Udhampur News: अल्ट्रासाउंड मशीनें पांच, डॉक्टर सिर्फ एक, मरीजों को मिल रही महीनों की तारीख
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उधमपुर। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला देखना हो तो गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज अस्पताल उधमपुर की बदहाली को देखा जा सकता है। यहां मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके पांच-पांच आधुनिक अल्ट्रासाउंड मशीनें तो लाकर रख दी गई हैं, लेकिन विडंबना यह है कि पूरे अस्पताल में उन्हें संचालित करने के लिए महज एक रेडियोलॉजिस्ट तैनात है।
स्टाफ की भारी कमी का खमियाजा उन गरीब और बेबस मरीजों को भुगतना पड़ रहा है जो दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से इलाज की उम्मीद लेकर यहां आते हैं। अस्पताल में पर्याप्त मशीनें होने के बावजूद स्टाफ न होने से वर्तमान में केवल दो ही मशीनें किसी तरह चलाई जा रही हैं, जिसके कारण मरीजों को जांच के लिए कई दिनों और कुछ गंभीर मामलों में तो महीनों तक का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
अस्पताल के भीतर की हकीकत बेहद चौंकाने वाली है क्योंकि यहां हर दिन करीब 800 मरीजों की ओपीडी होती है, जिनमें से डॉक्टरों द्वारा लगभग 150 जरूरतमंद मरीजों को अल्ट्रासाउंड जांच के लिए रेफर किया जाता है। सीमित संसाधनों और स्टाफ की किल्लत के चलते रोजाना केवल 70 से 80 मरीजों का ही अल्ट्रासाउंड हो पाना संभव है। इसमें भी पहले से लंबित पड़े मामलों और इमरजेंसी में आने वाले गंभीर मरीजों को ही प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में जिन सामान्य मरीजों को तत्काल जांच की आवश्यकता होती है, वे अस्पताल के चक्कर काट-काटकर थक जाते हैं और आखिर में मजबूर होकर उन्हें निजी डायग्नोस्टिक केंद्रों का रुख करना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले उन परिवारों को हो रही है जो सुबह-सुबह लाइन में लगते हैं और शाम को बिना जांच कराए खाली हाथ घर लौटने पर मजबूर हो जाते हैं।
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इस पूरी अव्यवस्था का सबसे काला पहलू यह है कि जीएमसी अस्पताल में जो अल्ट्रासाउंड जांच महज 100 रुपये के मामूली सरकारी शुल्क पर उपलब्ध है, उसी जांच के लिए अस्पताल से 20-20 दिन लंबी तारीख मिलने के कारण मरीजों को प्राइवेट क्लीनिकों में 500 से लेकर 3000 रुपये तक की भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है।
अस्पताल पहुंचे पीड़ित मरीज जगन्नाथ और बिट्टू ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि सरकारी अस्पताल में लंबा इंतजार मिलने के कारण उन्हें अपनी जेब से हजारों रुपये फूंककर निजी केंद्रों में टेस्ट कराना पड़ा, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर असहनीय अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। स्थानीय निवासियों और तीमारदारों ने स्वास्थ्य विभाग से पुरजोर मांग की है कि जीएमसी में तत्काल पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति की जाए ताकि मरीजों का लंबा इंतजार खत्म हो और उन्हें निजी सेंटरों की इस खुली लूट से राहत मिल सके।
प्रस्ताव उच्चाधिकारियों को भेजा है : मेडिकल सुपरिटेंडेंट
जीएमसी के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. संजीव गुप्त से बात की गई तो उन्होंने सीधे तौर पर स्वीकार किया कि स्टाफ की भारी कमी के कारण ही अस्पताल की सभी अल्ट्रासाउंड मशीनों को संचालित करना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। उन्होंने बताया कि अस्पताल प्रशासन की ओर से पर्याप्त स्टाफ की व्यवस्था के लिए उच्चाधिकारियों को औपचारिक प्रस्ताव भेजा जा चुका है। जैसे ही विभाग द्वारा आवश्यक स्टाफ उपलब्ध करा दिया जाता है, वैसे ही अस्पताल की सभी पांचों मशीनों को सुचारू रूप से शुरू कर दिया जाएगा, जिससे यहां आने वाले मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी और उन्हें भटकना नहीं पड़ेगा।
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स्टाफ की भारी कमी का खमियाजा उन गरीब और बेबस मरीजों को भुगतना पड़ रहा है जो दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से इलाज की उम्मीद लेकर यहां आते हैं। अस्पताल में पर्याप्त मशीनें होने के बावजूद स्टाफ न होने से वर्तमान में केवल दो ही मशीनें किसी तरह चलाई जा रही हैं, जिसके कारण मरीजों को जांच के लिए कई दिनों और कुछ गंभीर मामलों में तो महीनों तक का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
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अस्पताल के भीतर की हकीकत बेहद चौंकाने वाली है क्योंकि यहां हर दिन करीब 800 मरीजों की ओपीडी होती है, जिनमें से डॉक्टरों द्वारा लगभग 150 जरूरतमंद मरीजों को अल्ट्रासाउंड जांच के लिए रेफर किया जाता है। सीमित संसाधनों और स्टाफ की किल्लत के चलते रोजाना केवल 70 से 80 मरीजों का ही अल्ट्रासाउंड हो पाना संभव है। इसमें भी पहले से लंबित पड़े मामलों और इमरजेंसी में आने वाले गंभीर मरीजों को ही प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में जिन सामान्य मरीजों को तत्काल जांच की आवश्यकता होती है, वे अस्पताल के चक्कर काट-काटकर थक जाते हैं और आखिर में मजबूर होकर उन्हें निजी डायग्नोस्टिक केंद्रों का रुख करना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले उन परिवारों को हो रही है जो सुबह-सुबह लाइन में लगते हैं और शाम को बिना जांच कराए खाली हाथ घर लौटने पर मजबूर हो जाते हैं।
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इस पूरी अव्यवस्था का सबसे काला पहलू यह है कि जीएमसी अस्पताल में जो अल्ट्रासाउंड जांच महज 100 रुपये के मामूली सरकारी शुल्क पर उपलब्ध है, उसी जांच के लिए अस्पताल से 20-20 दिन लंबी तारीख मिलने के कारण मरीजों को प्राइवेट क्लीनिकों में 500 से लेकर 3000 रुपये तक की भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है।
अस्पताल पहुंचे पीड़ित मरीज जगन्नाथ और बिट्टू ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि सरकारी अस्पताल में लंबा इंतजार मिलने के कारण उन्हें अपनी जेब से हजारों रुपये फूंककर निजी केंद्रों में टेस्ट कराना पड़ा, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर असहनीय अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। स्थानीय निवासियों और तीमारदारों ने स्वास्थ्य विभाग से पुरजोर मांग की है कि जीएमसी में तत्काल पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति की जाए ताकि मरीजों का लंबा इंतजार खत्म हो और उन्हें निजी सेंटरों की इस खुली लूट से राहत मिल सके।
प्रस्ताव उच्चाधिकारियों को भेजा है : मेडिकल सुपरिटेंडेंट
जीएमसी के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. संजीव गुप्त से बात की गई तो उन्होंने सीधे तौर पर स्वीकार किया कि स्टाफ की भारी कमी के कारण ही अस्पताल की सभी अल्ट्रासाउंड मशीनों को संचालित करना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। उन्होंने बताया कि अस्पताल प्रशासन की ओर से पर्याप्त स्टाफ की व्यवस्था के लिए उच्चाधिकारियों को औपचारिक प्रस्ताव भेजा जा चुका है। जैसे ही विभाग द्वारा आवश्यक स्टाफ उपलब्ध करा दिया जाता है, वैसे ही अस्पताल की सभी पांचों मशीनों को सुचारू रूप से शुरू कर दिया जाएगा, जिससे यहां आने वाले मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी और उन्हें भटकना नहीं पड़ेगा।