{"_id":"601edc998ebc3e4a3d01f6c2","slug":"friends-will-increase-with-sweet-speech-enemies-will-decrease-udhampur-news-jmu2285664142","type":"story","status":"publish","title_hn":"मधुर वाणी से दोस्त बढ़ेंगे, दुश्मन होंगे कम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मधुर वाणी से दोस्त बढ़ेंगे, दुश्मन होंगे कम
विज्ञापन
उधमपुर। रठियान में जारी श्रीमद्भागवत सप्ताह में शनिवार को संत सुभाष शास्त्री ने संगत को जीने की कला के बारे में बताया। इसके साथ वाणी के प्रयोग और उसके महत्व से भी अवगत करवाया।
उन्होंने बताया कि वाणी के दुरुपयोग से समाज में अनेक झगड़े यहां तक कि हत्याएं तक हो जाती हैं। जैसे वाणी के द्वारा तीर से चुभने वाले वचन अपमानजनक, अहितकारी, द्वेष जनित, क्रोध, हिंसा, इत्यादि वाले शब्द बोल देते हैं, जिससे दूसरे के मन में अशांति और दुख का जन्म होता है। इस प्रकार बिना किसी कारण ही हम एक शत्रु पैदा कर लेते हैं। इसलिए सदा वाणी का उपयोग मधुरता से करें, जिसके फलस्वरूप मित्र बढ़ते जाएंगे।
उन्होंने समझाया कि संसार में हर मानव चिंतित दिखता है, क्योंकि उसे संतोष नहीं है। मानव के हृदय में सदैव इच्छाएं जन्म लेती हैं। इनमें से जो भी आपको प्राप्त होगा, वह एक न एक दिन बिछुड़ ही जाएगा और फिर आपको उसके बिछुड़ने का कष्ट होगा। इसलिए हमें चाहिए कि जो कुछ भी प्रभु ने हमें दिया है उसमें संतोष कर लें, तो शांति से रह सकते हैं। यदि असंतोष करना ही है तो भजन में करें, क्योंकि भजन जितना हो उतना ही कम। जैसे परमार्थ जितना भी हो, उतना ही थोड़ा। तथा भगवान के प्रति प्रेम जितना हो, उतना ही थोड़ा।
विज्ञापन
अंत में शास्त्री ने संगत को समझाया कि इस जगत के बंधन से मुक्त होने के लिए निरसंकल्प होना इतना सहज भी नहीं है तो फिर क्या करें। उपाय यह है कि जगत के संकल्पों को छोड़कर भागवत संकल्प करें। ऐसा संकल्प करते हुए मुख से प्रभु के नाम का उच्चारण और हृदय, मन व आंखों में प्रभु की छवि को धारण करना चाहिए। ऐसा साधक सहजता से प्रभु के अनुग्रह का अधिकारी बन जाता है, इससे बढ़कर मानव को और क्या चाहिए।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि वाणी के दुरुपयोग से समाज में अनेक झगड़े यहां तक कि हत्याएं तक हो जाती हैं। जैसे वाणी के द्वारा तीर से चुभने वाले वचन अपमानजनक, अहितकारी, द्वेष जनित, क्रोध, हिंसा, इत्यादि वाले शब्द बोल देते हैं, जिससे दूसरे के मन में अशांति और दुख का जन्म होता है। इस प्रकार बिना किसी कारण ही हम एक शत्रु पैदा कर लेते हैं। इसलिए सदा वाणी का उपयोग मधुरता से करें, जिसके फलस्वरूप मित्र बढ़ते जाएंगे।
विज्ञापन
उन्होंने समझाया कि संसार में हर मानव चिंतित दिखता है, क्योंकि उसे संतोष नहीं है। मानव के हृदय में सदैव इच्छाएं जन्म लेती हैं। इनमें से जो भी आपको प्राप्त होगा, वह एक न एक दिन बिछुड़ ही जाएगा और फिर आपको उसके बिछुड़ने का कष्ट होगा। इसलिए हमें चाहिए कि जो कुछ भी प्रभु ने हमें दिया है उसमें संतोष कर लें, तो शांति से रह सकते हैं। यदि असंतोष करना ही है तो भजन में करें, क्योंकि भजन जितना हो उतना ही कम। जैसे परमार्थ जितना भी हो, उतना ही थोड़ा। तथा भगवान के प्रति प्रेम जितना हो, उतना ही थोड़ा।
विज्ञापन
अंत में शास्त्री ने संगत को समझाया कि इस जगत के बंधन से मुक्त होने के लिए निरसंकल्प होना इतना सहज भी नहीं है तो फिर क्या करें। उपाय यह है कि जगत के संकल्पों को छोड़कर भागवत संकल्प करें। ऐसा संकल्प करते हुए मुख से प्रभु के नाम का उच्चारण और हृदय, मन व आंखों में प्रभु की छवि को धारण करना चाहिए। ऐसा साधक सहजता से प्रभु के अनुग्रह का अधिकारी बन जाता है, इससे बढ़कर मानव को और क्या चाहिए।