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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   'there is no solution of kashmir's dispute'

'कश्मीर विवाद से जुड़ी कई बातें जिन्हें बिल्कुल नहीं जानते होंगे'

Sat, 05 Apr 2014 09:20 AM IST
Updated Sat, 05 Apr 2014 09:20 AM IST
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'there is no solution of kashmir's dispute'

कोई भी व्यक्ति, जो पाकिस्तान जा चुका हो, उसने भारत-प्रशासित कश्मीर के बारे में बहुत सारी खबरें सुन रखी होंगी। 15 साल तक पाकिस्तान में घूमने के बाद मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का पक्ष क्या है।

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लेकिन नियंत्रण रेखा के पार भारत प्रशासित कश्मीर की अपनी पहली यात्रा के बाद मुझे अपना निष्कर्ष निकालने का मौका मिला कि आखिर भारत प्रशासित कश्मीर में क्या चल रहा है।
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आगे बढने से पहले इसका थोडा इतिहास जान लेते हैं। साल 1947 में जब ब्रितानी शासकों ने इस उपमहाद्वीप को छोडा था तब कश्मीर का मामला हल नहीं हुआ था।

मुस्लिम बहुल आबादी वाले कश्मीर के हिंदू राजा ने पाकिस्तान और भारत में से किसी में भी शामिल नहीं होने का निर्णय लिया।

इस विवाद ने युद्धों को जन्म दिया और आज पाकिस्तान के पास कश्मीर का एक-तिहाई जबकि भारत के पास मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी समेत दो तिहाई हिस्सा है।

समय घावों को नहीं भर पाया है। अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए भारत ने 4,00,000 सुरक्षाकर्मियों को भारत प्रशासित कश्मीर में तैनात कर रखा है।

हालांकि कश्मीर से संबंधित सभी आंकडे विवादों में हैं, लेकिन यह कहना संभवतः सही होगा कि कश्मीरियों और भारत के बीच संघर्ष में अब तक 1,00,000 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
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लेकिन यह इतिहास है - आज वहां क्या हो रहा है? यदि आप पाकिस्तानी पक्ष को सुनेंगे तो लगेगा कि भारत पाकिस्तान में मिलने या शायद आजाद होने की कश्मीरी लोगों की इच्छाओं का दमन कर रहा है।

भारतीय नजरिया

'there is no solution of kashmir's dispute'

अगर भारतीय पक्ष को सुनेंगे तो लगेगा कि वो अपने इलाके को जिहादी चरमपंथियों से बचा रहा है, जो पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र की तरफ से भेजे जाते हैं।

मैं भारतीय पर्यटकों से भरे एक विमान से कश्मीर पहुंचा। कश्मीरी व्यवसायी उनका गर्मजोशी से स्वागत करते हैं।

अगर वे प्रमुख पर्यटन स्थलों से दूर जाते हैं तो गश्त लगा रहे भारतीय सेना के जवान उन्हें सुरक्षा का एहसास दिलाते हैं। लेकिन उनकी यात्रा का अधिकांश हिस्सा यहां के राजनीतिक उथल-पुथल से अछूता ही रहता है।

जो थोडी बहुत असुविधा उन्हें होती है, वो यह कि कश्मीर में उनमें से बहुतों के मोबाइल फोन काम नहीं करते।

भारत सरकार जानना चाहती है कि आखिर कश्मीर के लोग क्या बातें कर रहे हैं।

यही कारण है कि कश्मीर के हालात के बारे में पर्यटकों और कश्मीरियों के नजरिए में काफी फर्क होता है।

तीन अचम्भे

'there is no solution of kashmir's dispute'

राजनीतिक हिंसा और भारतीय खुफिया एजेंसियों के साथ कश्मीरियों ने जीना सीख लिया है। अगर श्रीनगर के किसी कैफे में राजनीति पर चर्चा कर रहे हैं और बगल वाली टेबल पर कोई अजनबी बैठा है तो आप चुप हो जाएंगे।

अगर आप से कोई विदेशी पत्रकार पूछता है कि घाटी में कितने लोग पाकिस्तान के साथ विलय का समर्थन करते हैं तो अनौपचारिक रूप से आपका जवाब होता है 25 प्रतिशत, लेकिन औपचारिक रूप से आप इस आंकडे को दुरुस्त कर के 10 प्रतिशत कर देंगे।

भारतीय सेना की कश्मीर में उपस्थिति एक लंबे अरसे से बनी रही है और उसे इतने बडे पैमाने पर संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं कि इसने कश्मीरी समाज पर अपनी पकड बहुत मजबूत बना ली है।

ऐसी अटकलें हैं कि कश्मीर घाटी में अब चरमपंथियों की संख्या सिर्फ 100 रह गई है और वे एक ऐसी सेना के खिलाफ लड रहे हैं जो ना केवल सारी बातचीत की निगरानी करती है, बल्कि उनके पास वेतनभोगी मुखबिरों का ऐसा व्यापक नेटवर्क है जिससे कश्मीर के कोने-कोने की खबर मिल जाती है।

तो भारत प्रशासित कश्मीर में किन चीजों ने मुझे हैरत में डाला? यहाँ मैं उन तीन चीजों का जिक्र करना चाहूँगा जिन्होंने मुझे हैरान किया।

पहली बात, मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि यहां उग्रवाद कितनी तेजी से कम हुआ है। 20 वर्षों से पाकिस्तानी टेलीविजन शायद इस बात को बढा कर दिखाता रहा है कि यहां भारतीय सेना और अलगाववादियों के बीच भारी संघर्ष जारी है।

आजादी और सहिष्णुता

'there is no solution of kashmir's dispute'

यहां आज भी छिटपुट संघर्ष जारी है, लेकिन इसकी भयावहता इतनी कम है कि सूरज ढलने के बाद भी श्रीनगर में चहलकदमी करना संभव है।

अब श्रीनगर की अपेक्षा पेशावर या इस्लामाबाद में ज्यादा चेकप्वाइंट हैं।

दूसरी बात यह कि भारत सरकार घाटी के लोगों का विश्वास जीतने में खास तौर से नाकाम रही है। यहां तक कि भारत समर्थक नेशनल कांफ्रेंस को भी भारतीय शासन स्वैच्छिक की बजाए एक अनिवार्य सच्चाई लगती है।

दिल्ली या इस्लामाबाद का समर्थन करने वाली राजनीतिक विचारधारा से आने वालों को छोड घाटी के कुछ लोग ही हैं जो उत्साह के साथ आजादी की बात न करते हों।

श्रीनगर में ज्यादातर छात्र इस बात पर दृढ हैं कि भारतीय शासन दमनकारी है और जरूरी हुआ तो वे पूरी जिंदगी प्रतिरोध करते रहना चाहते हैं।

और तीसरा अचम्भा? मैंने अक्सर पढा है कि कश्मीर में असाधारण रूप से सहिष्णु राजनीतिक संस्कृति है। लेकिन यहां हिंसा के स्तर और विभाजन को देखते हुए यह दावा अकल्पनीय लगता है।

मुझे कोई ऐसी जगह नहीं दिखी जहां भिन्न राजनीतिक विचारधारा और धार्मिक विश्वास वाले लोगों में इतनी सहिष्णुता हो।

आप कश्मीर में कट्टर अलगाववादी के मुंह से कश्मीर के भारतीय सेना प्रमुख के बारे में अच्छे व्यक्ति होने की बात सुन सकते हैं।

जीने की कला

'there is no solution of kashmir's dispute'

ज्यादातर कश्मीरी एक दूसरे से असहमत नजर आते हैं। लेकिन वे ज्यादातर समय बहुत सौम्य और सहिष्णु तरीके से अपनी बात रखते हैं।

यह एक ऐसा नजरिया है जो कुछ हद तक अस्तित्व बनाए रखने की कला है। हर कोई जानता है कि निकट भविष्य में भारत कश्मीर मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करने जा रहा है।

ब्रिटेन जैसी उत्तर साम्राज्यवादी ताकतें जहां स्कॉटिश लोगों को आजादी देने की इच्छुक नजर आती हैं, वहीं उभरती हुई ताकतें अपने इलाके को गंवाना नहीं चाहतीं।

यदि इस बात की जरा सी भी गुंजाइश हो कि कश्मीरी आजादी को चुनना पसंद करेंगे तो उन्हें इस मुद्दे पर कभी भी अपना मत नहीं देने दिया जाएगा।

जब भी कश्मीर मुद्दे पर पश्चिमी राजनयिकों से बात होती है तो वे अपनी भौंहें चढा लेते हैं और इसकी जटिलता को लेकर मजाक करने लगते हैं। मुझे हमेशा ही यह चिढाने वाला व्यवहार लगता रहा है।

कश्मीर अभी भी दुनिया के महत्वपूर्ण विवादों में से एक है, जिसने लाखों जिंदगियों को प्रभावित किया है। लेकिन इस विवाद के बारे में एक ऐसी चीज है जिसपर कोई मतभेद नहीं है और वो ये कि फिलहाल इस समस्या का कोई अंत नहीं दिखता।

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