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प्रदूषण मापने के लिए स्थापित होगा नया संयंत्र

Wed, 26 Apr 2017 01:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, कठुआ
अमर उजाला ब्यूरो, कठुआ Updated Wed, 26 Apr 2017 01:44 AM IST
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New plant to be installed to measure pollution
Industry - फोटो : File Photo

सांबा और कठुआ की आबोहवा में प्रदूषण के सबसे छोटे कण यानी कि पीएम- 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) जांचने की तैयारी कर ली गई है। आने वाले कुछ ही दिनों के भीतर यह संयंत्र सांबा और कठुआ के औद्योगिक क्षेत्रों में स्थापित कर दिए जाएंगे। यह ऐसे कण हैं जिसका साइज 2.5 माइक्रोग्राम से भी कम होता है। ये कण आसानी से नाक और मुंह के जरिये शरीर के अंदर तक पहुंच कर लोगों को बीमार बना सकते हैं।

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इससे पहले रेस्पाइरेटरी सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (आरएसपीएम) के कठुआ में आ रहे आंकड़ों के अनुसार 10 माइक्रोग्राम से कम वाले पॉल्यूटेड कण यानी पीएम-10 का लेवल भी लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले पांच साल में ही शहर और आसपास की आबोहवा में पीएम 10 की मात्रा 150 माइक्रोग्राम को भी पार कर गई है। जबकि मानक के अनुसार सामान्य दिनों में आरएसपीएम की मात्रा 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होनी चाहिए।
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इससे साफ है कि कठुआ के औद्योगिक क्षेत्रों से लगातार हवा में जहर घुल रहा है जो आने वाले समय पर अपना प्रभाव शहर और नजदीक के ग्रामीण इलाकों पर डालेगा। जानकारों की मानें तो कठुआ के आसपास औद्योगिक क्षेत्र से रात के समय निकलने वाला जहरीला धुंआ नाइट्रोजन डाईआक्साइड को भी बढ़ा रहा है। ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कठुआ में भी पीएम 2.5 को मापने के लिए संयंत्र लगाने की तैयारी लगभग पूरी कर ली है।
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हवा में पीएम 2.5 की मात्रा को जांचकर इसे रोकने के लिए प्रबंध भी सुनिश्चित किए जा सकेंगे। कठुआ में पीएम 10 के घनत्व को बढ़ता देख पीएम 2.5 की जांच भी जरूरी हो गई है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारियों की मानें तो लगातार हवा में प्रदूषण की मात्रा को जांचा जा रहा है और बाकायदा सीमेंट इकाईयों की आनलाइन मोनिटरिंग भी की जा रही है।

क्या है आरएसपीएम
रेस्पाइरेटरी सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (आरएसपीएम) कार्बनिक और अकार्बनिक तत्वों का मिश्रण है। हालांकि यह बंद और खुले दोनों तरह के वातावरण में मिलते हैं, लेकिन इन कणों के मिलने की संभावना बंद स्थानों में ज्यादा होती है। प्लास्टिक का सामान, सिंथेटिक फाइबर, दरी, दरवाजों के पर्दों, घरेलू सामानों आदि में इनके होने की संभावना अधिक रहती हैं।

स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
सामान्यतया हमारी नाक आरएसपीएम के कणों को ब्लॉक नहीं कर पाती है। नाक 4 से 5 माइक्रान के आरएसपीएम कणों को नाक में प्रवेश करने से रोकने में सक्षम होती है। धूल के कणों के साथ मिश्रित होकर यह कण नाक में प्रवेश कर जाते हैं।


आरएसपीएम फेफड़ों में अंदर तक प्रवेश कर जाते हैं और इससे सीधे फेफड़े प्रभावित होते हैं। इससे अस्थाई रूप से दिमाग की क्षमता भी प्रभावित होती है। सोचने और समझने की क्षमता कम हो जाती है। इन कणों के कारण ब्रोंकाइटिस, दमा, अवसाद,  सीओपीडी, फेफड़ों की बीमारियां, डायबिटीज, गुर्दे की बीमारियां आदि हो सकती हैं।

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