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बसोहली से लुप्त हो रहा औषधि विज्ञान

Fri, 14 Nov 2014 02:08 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,कठुआ/बसोहली
ब्यूरो/अमर उजाला,कठुआ/बसोहली Updated Fri, 14 Nov 2014 02:08 AM IST
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natural medicine evaporate from Bsohli

कलानगरी के रूप में विख्यात बसोहली ने हिमालयीय कला को नए आयाम पर पहुंचाया है। अब बसोहली की दैनिक खपत का सामान भी पड़ोसी राज्यों से आता है।

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पहले इसकी पहचान औषधीय क्षेत्र के रूप में थी। अनुभवी वैद्यों से उपचार और परामर्श के लिए लोग यहां पहुंचते थे। और जटिल रोेगों के इलाज के लिए विख्यात वैद्यों के पास मरीजों का तांता लगा रहता था।
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वर्तमान में बसोहली में यह परंपरा पिछड़ रही है। परगना में एक दशक से प्रस्तावित हर्बल गार्डन के धीमे प्रयासों से लोगों में रोष है। अब तक कछुआ चाल से मात्र भूमि अधिग्रहण और भूमि के समतलीकरण का कार्य हुआ है।
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इस कला को बचाए रखने के लिए औषधीय पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण समय की मांग रहा है लेकिन ऐसा न होने से यह कला विलुप्त होती जा रही है। बसोहली के घरों मे वैद्य और वैद्यशालाओं का प्रचलन भी धुंधलाता जा रहा है।

स्थानीय प्रचलित कथाओं के अनुसार राजा कृपाल सिंह के समय में शिव प्रसाद द्वारा औषधि विज्ञान पर आधारित चरक और बैैकुंठ प्रसाद द्वारा शल्य चिकित्सा पर आधारित सुश्रुत लिखकर स्थानीय वैद्यों को दिया।


इस परंपरा से जुड़े रहे परिवारों ने औषधीय पौधों को लगवाकर इसका विस्तार किया और जटिल रोगाें के निशुल्क उपचार का सिलसिला शुरू किया।

पाधा परिवार बसोहली में इस परंपरा से जुड़कर औषधि और जीवन रक्षक दवाओं को तैयार करने में जुटा रहा है। इसकी जानकारी देते हुए शिव कुमार पाधा ने बताया कि कसबे के कुंज लाल पाधा पाचन के लिए मशहूर रुचिकरण चूर्ण, बसंत माल्ती और सर्पमुखी अंजन के लिए और वालिया परिवार जलने पर इस्तेमाल में लाए जाने वाले मल्हम के लिए विख्यात रहा है।

सोनी परिवार नेत्र रोेगों, चौहान परिवार सर्पदंश के इलाज, मखोत्रा परिवार बिच्छू के दंश पर इलाज, सराफ परिवार मिश्री के साथ अनुपम इसबगोल घोल देने के लिए विख्यात रहा है। इसी तरह से कसबे के कई परिवार इस परंपरा को बिना किसी शुल्क के लोगों की सेवा करते रहे हैं।

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