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Kathua News: आपदा ने फिर बढ़ाई चुनौती, धंसने लगा ऐतिहासिक थीन किले का हिस्सा

Sat, 18 Apr 2026 02:53 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ Updated Sat, 18 Apr 2026 02:53 AM IST
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jammu kashmir news
थीन किले का निरीक्षण करने पहुंची टीम
विश्व विरासत दिवस विशेष
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जीर्णेाद्धार के लिए अब श्री माता वैष्णाे देवी विश्व विद्यालय का स्कूल ऑफ वास्तुकार विभाग पुरातत्व विभाग के साथ मिलकर करेगा काम

साहिल खजूरिया
कठुआ। आपदा ने वर्तमान ही नहीं इतिहास को भी नुकसान पहुंचाया है। रावी नदी के तट पर कभी शक्ति और सामरिक महत्व के प्रतीक रहे थीन किले का एक हिस्सा अब धंसने लगा है। पुरातत्व विभाग इसे संरक्षित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। इसमें श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय के वास्तुकला एवं भूदृश्य डिजाइन विद्यालय की मदद ली जाएगी।
जम्मू-कश्मीर पुरातत्व विभाग की टीम ने हाल में किले की स्थिति का विशेषज्ञों के साथ दौरा भी किया है। इस साल विश्व विरासत दिवस की थीम आपदाओं और संघर्षों से खतरे में विरासत पर आधारित है। ऐसे में थीन किले को अधिक नुकसान से बचाकर विरासत को बचाने की कवायद शुरू की जा रही है। बीते दो साल से पुरातत्व विभाग इसके संरक्षण का प्रयास कर रहा था। इसके तहत यहां ट्रैकिंग का रास्ता और पुरानी वास्तुकला के अनुसार किले की दीवारों को फिर से तैयार किया गया। अगस्त 2025 में आई भारी बारिश से किले को नुकसान पहुंचा है।
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कोट
थीन किले के जीर्णोद्धार को लेकर श्री माता वैष्णो देवी विश्व विद्यालय के वास्तुकला एवं भूदृश्य डिजाइन विद्यालय की टीम के साथ मौके पर जाकर जायजा लिया है। बीते साल हुई बारिश के बाद किले का एक हिस्सा धंसने लगा है। पूरे ढांचे को नुकसान होने से पहले विरासत को बचाने के लिए काम करने की योजना है।
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- डाॅ. संगीता वर्मा, सहायक निदेशक, पुरातत्व और संग्रहालय विभाग जम्मू
शक्ति और सामरिक महत्व का प्रतीक था थीन का यह किला
शोधकर्ताओं के अनुसार एक समय पर रावी दरिया के किनारे तैयार किया गया थीन किला शक्ति और सामरिक महत्व का प्रतीक था। आज के समय में यह अपनी शान खो चुका है और खंडहरों में तब्दील होता जा रहा है। यह किला जम्मू के पहाड़ी राज्यों की राजनीति, संघर्ष और सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतीक है।


लखनपुर राज्य की सीमा पर स्थित थीन किला सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। यहां से भड्डू, बसोहली और नूरपुर राज्यों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। 18वीं सदी में नूरपुर के राजा पृथ्वी सिंह ने इसे अपने अधिकार में लिया। बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने नूरपुर को अपने साम्राज्य में मिला लिया। रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। राजा बीर सिंह के पुत्र जसवंत सिंह ने अंग्रेजों का प्रस्ताव ठुकरा दिया। उनके मंत्री राम सिंह पठानिया ने गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण देकर थीन और शाहपुर किलों को दोबारा जीत लिया। वे देवी के भक्त थे और प्रतिदिन पूजा करते थे। बाद में उन्हें जसरोटा किले से पकड़कर अंग्रेजों को सौंप दिया गया। आज थीन किला खंडहर में बदल चुका है। केवल कुछ स्तंभ और बुर्ज इसकी भव्यता की कहानी कहते हैं। इसके निकट रावी नदी पर शाहपुर कंडी बांध का निर्माण कार्य जारी है। इससे बिजली उत्पादन, सिंचाई और मत्स्य पालन के लिए पानी उपलब्ध कराया जाएगा। झील बनकर तैयार हो गई है जिसका किले से भी विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
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