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Kathua News: सवा तीन लाख की आबादी के लिए जिले में एक ही थाना
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कठुआ। जिले की आधी आबादी के लिए मात्र एक ही पुलिस थाना है जो मुख्यालय पर मौजूद है। महिलाओं और युवतियों के खिलाफ होने वाले अपराध और अन्य मामलों की शिकायत के लिए महिलाओं को लगभग 50 से 200 किलोमीटर तक का सफर तय कर पहुंचना पड़ता है।
जिले में वर्तमान में केवल एक महिला पुलिस थाना सक्रिय है, जबकि बिलावर, बसोहली, बनी, रामकोट और मल्हार जैसे दूरदराज क्षेत्रों में महिला-केंद्रित सुरक्षा की कोई अलग व्यवस्था नहीं है। जहां महिला पुलिस की तैनाती है, वहां भी शाम होते ही उनकी ड्यूटी समाप्त हो जाती है। ऐसे में सप्ताह के सातों दिन चौबीसों घंटे महिलाओं की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है, इसकी समीक्षा आवश्यक है। यह स्थिति तब और विचारणीय हो जाती है जब जिला पुलिस की कमान स्वयं एक महिला अधिकारी के हाथ में है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर कठुआ जिले में सप्ताहभर चलने वाले कार्यक्रम निश्चित रूप से महिला सशक्तीकरण और जागरूकता को बढ़ावा देंगे। वास्तविक सशक्तीकरण तभी संभव है जब महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा मिले और उनके लिए चौबीसों घंटे प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध हो। प्रशासन और पुलिस को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे ताकि महिला सशक्तीकरण केवल नारों तक सीमित न रहकर वास्तविकता में बदल सके। कुछ वर्ष पहले शहर में कॉलेज और स्कूल जाने वाली छात्राओं की सुरक्षा के लिए तैयार किए गए महिला पुलिसकर्मियों के पिंक स्कवॉड भी सड़कों से गायब हो चुके हैं।
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जिले में वर्तमान में केवल एक महिला पुलिस थाना सक्रिय है, जबकि बिलावर, बसोहली, बनी, रामकोट और मल्हार जैसे दूरदराज क्षेत्रों में महिला-केंद्रित सुरक्षा की कोई अलग व्यवस्था नहीं है। जहां महिला पुलिस की तैनाती है, वहां भी शाम होते ही उनकी ड्यूटी समाप्त हो जाती है। ऐसे में सप्ताह के सातों दिन चौबीसों घंटे महिलाओं की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है, इसकी समीक्षा आवश्यक है। यह स्थिति तब और विचारणीय हो जाती है जब जिला पुलिस की कमान स्वयं एक महिला अधिकारी के हाथ में है।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर कठुआ जिले में सप्ताहभर चलने वाले कार्यक्रम निश्चित रूप से महिला सशक्तीकरण और जागरूकता को बढ़ावा देंगे। वास्तविक सशक्तीकरण तभी संभव है जब महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा मिले और उनके लिए चौबीसों घंटे प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध हो। प्रशासन और पुलिस को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे ताकि महिला सशक्तीकरण केवल नारों तक सीमित न रहकर वास्तविकता में बदल सके। कुछ वर्ष पहले शहर में कॉलेज और स्कूल जाने वाली छात्राओं की सुरक्षा के लिए तैयार किए गए महिला पुलिसकर्मियों के पिंक स्कवॉड भी सड़कों से गायब हो चुके हैं।
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