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Kathua News: हुनर की डोरी से बुनी आत्मनिर्भरता की कहानी
Wed, 20 Aug 2025 02:03 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Wed, 20 Aug 2025 02:03 AM IST
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क्रोशिया से बनाए गए उत्पाद
कठुआ। बसोहली की पहाड़ियों में बसी एक साधारण सी लड़की रितिका मेहरा आज कई महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बन चुकी हैं। 26 वर्षीय रितिका ने अपने जीवन को क्रोशिया कढ़ाई के धागों से इस तरह बुना कि अब वह न केवल खुद आत्मनिर्भर है बल्कि अपने गांव की महिलाओं को भी इस हुनर से जोड़ रही हैं।
रितिका का सफर उस दिन शुरू हुआ जब उसने अपने गांव की महिलाओं को पारंपरिक क्रोशिया कढ़ाई करते देखा। यह दृश्य उसके मन में कुछ नया करने की प्रेरणा बन गया। उसने यूट्यूब से डिजाइन सीखने शुरू किए और धीरे-धीरे अपने हाथों से स्वेटर, क्रॉप्ड टॉप, बच्चों के कपड़े, हेयर पिन, झुमके, फोन चार्म, टेबल कवर और यहां तक कि ऊन से बने गुलदस्ते भी तैयार करने लगीं।
तीन साल की मेहनत के बाद रितिका ने अपनी कल्कि मिक्स एम्ब्रॉयडरी सोसाइटी की स्थापना की। इस पहल को जिला हस्तशिल्प विभाग ने भी सराहा और उसे कच्चे माल की खरीद के लिए एक लाख रुपये की सहायता दी। अब रितिका का सपना है कि गांव में अधिक से अधिक महिलाएं इस सोसाइटी से जुड़ें और अपने शौक को आजीविका में बदलें।
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चुनौतियों की चादर में उम्मीद की कढ़ाई
रितिका मानती हैं कि क्रोशिया कढ़ाई दशकों से ग्रामीण महिलाओं का हिस्सा रही है, लेकिन इसे बाजार की मांग के अनुसार ढालना जरूरी है। कुल्लू की ऊन सबसे उपयुक्त मानी जाती है, मगर उसकी उपलब्धता सीमित है। साथ ही तैयार माल को बेचने के लिए स्थायी बाजार नहीं है। अभी सिर्फ प्रदर्शनियों तक ही सीमित है।
जिले में ऐसे सामुदायिक सुविधा केंद्र बनाए जा रहे हैं जहां कारीगर सालभर अपना माल बेच सकें। यह पहल रितिका जैसे कारीगरों के लिए एक नई उम्मीद है।
अंशु शर्मा, हस्तशिल्प प्रशिक्षण अधिकारी
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रितिका का सफर उस दिन शुरू हुआ जब उसने अपने गांव की महिलाओं को पारंपरिक क्रोशिया कढ़ाई करते देखा। यह दृश्य उसके मन में कुछ नया करने की प्रेरणा बन गया। उसने यूट्यूब से डिजाइन सीखने शुरू किए और धीरे-धीरे अपने हाथों से स्वेटर, क्रॉप्ड टॉप, बच्चों के कपड़े, हेयर पिन, झुमके, फोन चार्म, टेबल कवर और यहां तक कि ऊन से बने गुलदस्ते भी तैयार करने लगीं।
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तीन साल की मेहनत के बाद रितिका ने अपनी कल्कि मिक्स एम्ब्रॉयडरी सोसाइटी की स्थापना की। इस पहल को जिला हस्तशिल्प विभाग ने भी सराहा और उसे कच्चे माल की खरीद के लिए एक लाख रुपये की सहायता दी। अब रितिका का सपना है कि गांव में अधिक से अधिक महिलाएं इस सोसाइटी से जुड़ें और अपने शौक को आजीविका में बदलें।
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चुनौतियों की चादर में उम्मीद की कढ़ाई
रितिका मानती हैं कि क्रोशिया कढ़ाई दशकों से ग्रामीण महिलाओं का हिस्सा रही है, लेकिन इसे बाजार की मांग के अनुसार ढालना जरूरी है। कुल्लू की ऊन सबसे उपयुक्त मानी जाती है, मगर उसकी उपलब्धता सीमित है। साथ ही तैयार माल को बेचने के लिए स्थायी बाजार नहीं है। अभी सिर्फ प्रदर्शनियों तक ही सीमित है।
जिले में ऐसे सामुदायिक सुविधा केंद्र बनाए जा रहे हैं जहां कारीगर सालभर अपना माल बेच सकें। यह पहल रितिका जैसे कारीगरों के लिए एक नई उम्मीद है।
अंशु शर्मा, हस्तशिल्प प्रशिक्षण अधिकारी

क्रोशिया से बनाए गए उत्पाद